CJI के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर मनमोहन के साइन नहीं, सिब्बल ने ये दी सफाई

जब कपिल सिब्बल से इस बाबत सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हमने जानबूझ उन्हें इस मामले से दूर रखा है. आपको बता दें कि कांग्रेस के अनुसार इसपर 71 सांसदों के साइन हैं. इनमें से 7 सांसद रिटायर हो चुके हैं.

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महाभियोग पर मनमोहन सिंह का साइन नहीं (File Pic) महाभियोग पर मनमोहन सिंह का साइन नहीं (File Pic)

बालकृष्ण

  • नई दिल्ली,
  • 20 अप्रैल 2018,
  • अपडेटेड 6:33 PM IST

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्ष की 7 पार्टियां महाभियोग प्रस्ताव लाई है. कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी पार्टियों ने इस प्रस्ताव को राज्यसभा सभापति वेंकैया नायडू को सौंप दिया है. हालांकि, इस प्रस्ताव पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साइन नहीं किए हैं. गौरतलब है कि मनमोहन सिंह अभी भी राज्यसभा सांसद हैं.

जब कपिल सिब्बल से इस बाबत सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि हमने जानबूझ उन्हें इस मामले से दूर रखा है. आपको बता दें कि कांग्रेस के अनुसार इसपर 71 सांसदों के साइन हैं. इनमें से 7 सांसद रिटायर हो चुके हैं.

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सलमान खुर्शीद के भी सुर अलग!

आपको बता दें कि मनमोहन सिंह के अलावा कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने भी इस मुद्दे पर पार्टी से अलग सुर अलापा है. सलमान खुर्शीद ने कहा कि चाहे जज लोया का मामला हो या कोई अन्य, सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही अंतिम होता है. अगर शीर्ष कोर्ट के फैसले को लेकर किसी को कोई आपत्ति है तो पुनर्विचार याचिका, उपचारात्मक याचिका दाखिल करने की छूट होती है. यह अलग बात है कि इनका दायरा बहुत सीमित होता है.

पेशे से वकील सलमान खुर्शीद ने कहा कि वकील का काला गाउन और सफेद बैंड पहनने वाले किसी भी आदमी के लिए कोर्ट के फैसले पर सोच समझ कर सवाल उठाने चाहिए. यह संवेदनशील मामला है. उन्होंने कहा कि शीर्ष कोर्ट के फैसले पर राजनीति करने को उचित नहीं कहा जा सकता है.

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1. मुख्य न्यायाधीश के पद के अनुरुप आचरण ना होना, प्रसाद ऐजुकेशन ट्रस्ट में फायदा उठाने का आरोप. इसमें मुख्य न्यायाधीश का नाम आने के बाद सघन जांच की जरूरत.

2. प्रसाद ऐजुकेशन ट्रस्ट का सामना जब CJI के सामने आया तो उन्होंने CJI ने न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को किनारे किया.

3. बैक डेटिंग का आरोप.

4. जमीन का अधिग्रहण करना, फर्जी एफिडेविट लगाना और सुप्रीम कोर्ट जज बनने के बाद 2013 में जमीन को सरेंडर करना.

5. कई संवेदनशील मामलों को चुनिंदा बेंच को देना.

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