दुर्ग के बाल सुधार गृह में किशोरों के बीच मारपीट, एक की मौत

दुर्ग के बाल संप्रेषण गृह में किशोरों के दो गुटों के बीच जमकर मारपीट हुई, जिसमें 16 वर्षीय पार्थ साहू नामक किशोर की मौके पर ही मौत हो गयी. मारपीट की इस घटना में शामिल सभी बच्चे नाबालिक है.

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संप्रेषण गृह संप्रेषण गृह

सुनील नामदेव

  • दुर्ग,
  • 02 नवंबर 2017,
  • अपडेटेड 6:17 PM IST

दुर्ग के बाल संप्रेषण गृह में किशोरों के दो गुटों के बीच जमकर मारपीट हुई, जिसमें 16 वर्षीय पार्थ साहू नामक किशोर की मौके पर ही मौत हो गयी. मारपीट की इस घटना में शामिल सभी बच्चे नाबालिक है. किसी न किसी आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद इनको बाल सुधार गृह में रखा गया है. ये किशोर कई बार आपस में मारपीट की वारदात को अंजाम दे चुके है, लेकिन कभी भी इतनी बड़ी घटना नहीं हुई.

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बताया जा रहा है कि विभागीय कर्मचारियों की लापरवाही के कारण यह घटना हुई है. जिस समय ये किशोर लड़ाई-झगड़ा कर रहे थे, उस वक्त सम्प्रेषण गृह में न तो कोई जिम्मेदार कर्मचारी था और न ही कोई अधिकारी. नतीजतन घंटे भर तक झगड़े होते रहे, लेकिन किसी ने भी इन उत्पाती किशोरों को रोकने की कोशिश नहीं की. घटना को अंजाम देने के बाद एक गुट विशेष के 10 बच्चे फरार हो गए. हालांकि पुलिस का दावा है कि ये सभी कुछ देर बाद वापस सम्प्रेषण गृह पहुंच गए थे. पुलिस के आने के डर से ये बच्चे भागे थे.

उधर, घटना के बाद पुलिस ने इन किशोरों के खिलाफ हत्या का प्रकरण दर्ज किया है. प्रशासन ने घटना की मजिस्ट्रियल जांच के आदेश दिए हैं. बताया तो यह भी जा रहा है कि घटना में शामिल दोनों गुटों के किशोर नशे धुत में थे. अब सवाल यह है कि आखिर इन किशोरों के पास नशे का सामान कैसे पंहुचा? बताया जा रहा है कि रात से ही बच्चे आपस में झगड़ रहे थे. इस दौरान पार्थ साहू को मारने के लिए आपस में दोनों गुटों के बीच झड़प भी हुई थी.

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इस घटना के दूसरे दिन एक गुट के किशोरों ने पार्थ के सिर पर डंडा दे मारा, जिससे वो लहूलुहान हो गया. उसे अस्पताल में दाखिल कराया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इस सुधार गृह में 42 ऐसे बच्चे रखे गए है, जो किसी न किसी मामले में दोषी ठहराए गए हैं. दरअसल, कम उम्र होने के चलते इनको सुधार गृह में रखकर अच्छे नागरिक बनाने की कोशिशें होती है, लेकिन इस संप्रेषण गृह में सिर्फ चार कर्मियों की नियुक्ति से देखरेख नहीं हो पाती. स्टाफ की कमी के चलते चौबीसों घंटे किशोरों की निगरानी नहीं हो रही है. लिहाजा वे सुधरने की बजाय और बिगड़ रहे हैं.

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