सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज किया, जानिए क्या था दावा

अयोध्या मामले में निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट अक्टूबर में दस्तावेज सौंपे थे. निर्मोही अखाड़े की लिखित दलील में था कि विवादित भूमि का आंतरिक और बाहरी अहाता भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में मान्य है.

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aajtak.in
  • नई दिल्ली,
  • 09 नवंबर 2019,
  • अपडेटेड 1:06 PM IST

  • अयोध्या मामले में 5 जजों की संवैधानिक बेंच का फैसला
  • 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की थी

सुप्रीम कोर्ट का अयोध्या मामले में फैसला आ गया है. कोर्ट ने निर्मोही अखाड़े का दावा खारिज कर दिया है. अयोध्या मामले में पांच जजों की संवैधानिक बेंच फैसला सुना रही है.  इसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस रंजन गोगोई कर रहे हैं. इस बेंच में जस्टिस एसए बोबडे जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस एस अब्दुल नजीर और डीवाई चंद्रचूड़ शामिल हैं.

अयोध्या मामले में निर्मोही अखाड़े ने सुप्रीम कोर्ट अक्टूबर में दस्तावेज सौंपे थे. निर्मोही अखाड़े की लिखित दलील में कहा था कि विवादित भूमि का आंतरिक और बाहरी अहाता भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में मान्य है. हम रामलला के सेवायत हैं. ये हमारे अधिकार में सदियों से रहा है.

निर्मोही अखाड़े ने अपनी दलील में कहा था कि हमें ही रामलला के मंदिर के पुनर्निर्माण, रखरखाव और सेवा का अधिकार मिलना चाहिए. चूंकि वक्फ बोर्ड का विवादित भूमि पर लंबे समय से अधिकार रहा है, इसकी तस्दीक हिंदुओं समेत सभी पक्षकार कोर्ट में भी कर चुके हैं. ऐसे में कोर्ट निर्देश दे कि वक्फ बोर्ड हाई कोर्ट के आदेश वाली अपने हिस्से की जमीन लीज पर हमें दे, ताकि हम मंदिर बना सकें. निर्मोही अखाड़े की दलील के मुताबिक कोर्ट चाहे तो यूपी सरकार को निर्देश देकर अयोध्या के अधिग्रहित भूमि के बाहरी इलाके में वक्फ बोर्ड को मस्जिद के लिए समुचित जगह दिला दे.

निर्मोही अखाड़े की पहली अपील

अयोध्या विवाद की असल शुरुआत 23 दिसंबर 1949 को, जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में पाई गईं. हिंदुओं का कहना था कि भगवान राम प्रकट हुए हैं, जबकि मुसलमानों का दावा है कि किसी ने रात में चुपचाप मूर्तियां वहां रख दीं. यूपी सरकार ने मूर्तियां हटाने का आदेश दिया, लेकिन हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के डर से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई गई. सरकार ने इसे विवादित स्थल मानकर मस्जिद पर ताला लगवा दिया.

अयोध्या मामले में साल 1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में दो अर्जी दाखिल की गई. इसमें एक में राम लला की पूजा की इजाजत और दूसरे में विवादित ढांचे में भगवान राम की मूर्ति रखे रहने की इजाजत मांगी गई. इसके बाद 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने तीसरी अर्जी दाखिल की, जिसमें निर्मोही अखाड़ा चाहता है कि उसे राम जन्मभूमि का प्रबंधन और पूजन का अधिकार मिले. इसके बाद साल 1961 में यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड ने अर्जी दाखिल कर विवादित जगह के पजेशन और मूर्तियां हटाने की मांग की. इसके बाद से यह मामला कोर्ट में उलझा हुआ है.

14 अखाड़ों में से एक है

निर्मोही अखाड़ा, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद द्वारा मान्यता प्राप्त 14 अखाड़ों में से एक है. इसका संबंध वैष्णव संप्रदाय से है. इस अखाड़े ने 1959 में बाबरी मस्जिद की विवादित भूमि पर अपना मालिकाना हक जताते हुए एक मुकदमा दायर किया किया था, तभी से यह चर्चा में आया.

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