PAK में पीड़ित अहमदिया मुस्लिम, कांग्रेस-अकाली दल की मांग- मिले नागरिकता

दलजीत चीमा ने अपील की है कि धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हुए अहमदिया मुसलमानों को भी नागरिकता संशोधन अधिनियम का हिस्सा बनाया जाए. अकाली दल पंजाब में भारतीय जनता पार्टी का सहयोगी है लेकिन वह सीधे-सीधे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का साथ ना दे कर कांग्रेस की भाषा बोल रहा है.

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CAA के खिलाफ देशभर में हो रहे हैं प्रदर्शन (फाइल फोटो-PTI) CAA के खिलाफ देशभर में हो रहे हैं प्रदर्शन (फाइल फोटो-PTI)

मनजीत सहगल

  • चंडीगढ़,
  • 07 जनवरी 2020,
  • अपडेटेड 12:06 AM IST

  • पाकिस्तान में धार्मिक प्रताड़ना का शिकार अहमदिया मुस्लिम समुदाय
  • अकाली दल और कांग्रेस ने अहमदिया मुसलमानों के लिए मांगी नागरिकता
  • कुरान पढ़ने, ईद मनाने और रिश्तेदारों को दफनाने पर होती है जेल
भारतीय राजनीतिक दलों के बीच नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लेकर बसह छिड़ी हुई है. भारत में रह रहे अहमदिया संप्रदाय के मुसलमानों को नागरिकता देने की मांग जोर पकड़ती जा रही है. यह मांग पंजाब की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों- कांग्रेस और शिरोमणी अकाली दल की तरफ से की गई है.

अकाली दल के प्रवक्ता और महासचिव डॉक्टर दलजीत सिंह चीमा के मुताबिक उनकी पार्टी ने नागरिकता संशोधन कानून पास करने के लिए केंद्र सरकार की सराहना तो की है.

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दलजीत चीमा ने अपील की है कि धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हुए अहमदिया मुसलमानों को भी इस कानून का हिस्सा बनाया जाए. मजे की बात यह है कि अकाली दल पंजाब में भारतीय जनता पार्टी का सहयोगी है लेकिन वह सीधे-सीधे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का साथ ना दे कर कांग्रेस की भाषा बोल रहा है.

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पहले ही साफ कर चुके हैं कि केंद्र की संविधान की गरिमा का मजाक उड़ा रहा है.  कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, 'मेरी सरकार नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करेगी क्योंकि यह भारतीय जनता पार्टी के समाज को बांटने वाले एजेंडे से प्रेरित है.'

उधर कैप्टन अमरिंदर सिंह के धुर राजनीतिक विरोधी और कांग्रेस के सांसद प्रताप सिंह बाजवा और अहमदिया समुदाय के हेडक्वार्टर कहे जाने वाले कादियां क्षेत्र के विधायक फतेहजंग बाजवा ने केंद्र सरकार को बाकायदा पत्र लिखकर पाकिस्तान छोड़कर भारत में शरण लेने वाले अहमदिया समुदाय को नागरिकता देने की अपील की है.

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130 वर्ष से धार्मिक प्रताड़ना के शिकार हैं अहमदिया मुसलमान

पिछले 130 सालों धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होते आए अहमदिया मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोग भारत सरकार की तरफ उम्मीद भरी निगाहों से देख रहे हैं. भारत में इस वक्त 1.5 लाख से ज्यादा अहमदिया मुस्लिम रहते हैं, जिनमें सेइस संप्रदाय की स्थापना 1835 को लुधियाना में की गई थी और इसके संस्थापक कादिया के रहने वाले थे. 2014 से पहले कितने अहमदिया मुसलमान पाकिस्तान छोड़ कर भारत में शरण लेने  पर मजबूर हुए इसकी जानकारी नहीं है.

अल्पसंख्यकों के लिए सबसे खतरनाक देश है पाकिस्तान

पाकिस्तान अल्पसंख्यक समुदाय के लिए विश्व का छठा सबसे खतरनाक देश है. हिंदू, सिख, इसाई, धर्म के लोगों के अलावा अहमदिया समुदाय के लोग इस देश में . पाकिस्तान इन मुसलमानों को मुसलमान ही नहीं मानता. उनको कुरान पढ़ने, नमाज अदा करने, अजान, ईद मनाने और यहां तक कि अपने मृत रिश्तेदारों को दफनाने तक की इजाजत नहीं है.

कुरान पढ़ने और मस्जिदों में जाने पर प्रतिबंध

प्रताड़ना के चलते अहमदिया समुदाय के लोग अब धीरे-धीरे पाकिस्तान से कूच कर रहे हैं. बीते कुछ सालों में पाकिस्तान ने इस समुदाय विशेष की धार्मिक आजादी खत्म करने के लिए बाकायदा कानून बनाए हैं. 1984 को तत्कालीन पाकिस्तान सरकार ने बकायदा एक अध्यादेश जारी करके अहमदिया मुसलमानों पर कुरान शरीफ पढ़ने और  उनके मस्जिदों में प्रवेश करने पर पाबंदी लगा दी थी .

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अहमदिया मुसलमानों को मुसलमान नहीं मानता पाकिस्तान

पाकिस्तान ने 7 सितंबर 1974 को अपने संविधान में दूसरा संशोधन करके अहमदिया संप्रदाय के लोगों को गैर मुस्लिम करार दे दिया था. अब तक अहमदिया मुसलमानों पर कई फिदायीन हमले हो चुके हैं जिनको . इसका सबसे बड़ा उदाहरण 28 मई 2010 का लाहौर नरसंहार है जिसमें 94 अहमदिया मारे गए थे और 120 घायल हुए थे. यह नरसंहार अहमदिया मुसलमानों की दो मस्जिदों पर तहरीक ए पाकिस्तान  द्वारा किए गए फिदायीन हमलों के जरिए किए गए थे.

1974 में सैकड़ों लोगों की गई थी जान

इससे पहले 1953 के लाहौर दंगे और 1974 के अहमदिया विरोधी दंगों में भी सैंकड़ों अहमदिया लोगों की जान ली गई. यह सभी दंगे सुन्नी मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले जिहादी संगठनों ने करवाए थे. सूत्रों की माने तो पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमान अब भारत के . ऐसा इसलिए भी क्योंकि एक तो भारत में फिलहाल उनको नागरिकता मिलने के आसार कम है और दूसरे नागरिकता कानून में संशोधन केवल धार्मिक आधार पर प्रताड़ित गैर-मुस्लिम समुदायों को नागरिकता देने के लिए किया गया है.

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