किसान आंदोलन से निपटने का सरकार का मास्टर प्लान, 10 प्वाइंट में समझें

आंदोलन कर रहे किसानों से सरकार की बात नहीं बन पा रही है. लिहाजा, सरकार अब धीरे-धीरे ऐसे कदम उठा रही है जिससे इस आंदोलन से निपटा जा सके. इसके लिए सरकार कई मोर्चों पर काम कर रही है.

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किसान और सरकार की नहीं बन पा रही बात (फाइल फोटो-पीटीआई) किसान और सरकार की नहीं बन पा रही बात (फाइल फोटो-पीटीआई)

हिमांशु मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 15 दिसंबर 2020,
  • अपडेटेड 12:07 PM IST
  • सरकार और किसान संगठनों के बीच नहीं बन पा रही है बात
  • सरकार ने किसान आंदोलन से पार पाने के लिए निकाले कई रास्ते

आंदोलन कर रहे किसानों से सरकार की बात नहीं बन पा रही है. लिहाजा, सरकार अब धीरे-धीरे ऐसे कदम उठा रही है जिससे इस आंदोलन से निपटा जा सके. इसके लिए सरकार कई मोर्चों पर काम कर रही है. नीचे दिए गए 10 प्वाइंट में समझें आंदोलन से पार पाने का क्या है सरकार का मास्टर प्लान.

1- सरकार छोटे-छोटे किसान संगठनों से चर्चा कर रही है और आंदोलन से निपटने का काम कर रही है. कृषि मंत्री इन संगठनों से मुलाकात कर रहे हैं. ये संगठन कृषि कानूनों के पक्ष में बयान दे रहे हैं जिससे चर्चा बदलने की कोशिश की जा रही है.

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2- वरिष्ठ मंत्री और बीजेपी नेता लगातार टुकड़े-टुकड़े गैंग और माओवादी ताकतों, खालिस्तानी ताकतों के बारे में बात कर रहे हैं. एक किसान संगठन ने दिल्ली और महाराष्ट्र हिंसा के आरोप में पकड़े गए लोगों की रिहाई की मांग कर सरकार को और बल दे दिया. विदशों में हुए प्रदर्शनों में खालिस्तानी तत्वों की मौजूदगी ने इन आरोपों को हवा दी है कि इस आंदोलन को अलगाववादी ताकतों का समर्थन है.

3- भारतीय किसान यूनियन के कुछ गुटों से सरकार ने अलग से बातचीत की है. बीकेयू भानु गुट से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बात की और नोएडा का रास्ता खुलवाया गया जिसे लेकर इन संगठनों में आपस में ही मतभेद हो गए. 

4- अलगाववादी ताकतों को लेकर सरकार के प्रचार के बाद कई किसान संगठनों ने बीकेयू के उग्राहां गुट से खुद को अलग किया जिसने मानवाधिकार दिवस पर रिहाई की मांग की थी. इसका असर ये हुआ कि बीकेयू उग्राहां ने किसान संगठनों के 14 दिसंबर के अनशन से ही खुद को अलग कर लिया.

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5- कृषि मंत्री और अन्य मंत्री कई बार कह चुके हैं कि सरकार आंदोलनकारी किसानों से चर्चा के लिए तैयार है. कृषि मंत्री ने क्लॉज-बाइ-क्लॉज चर्चा की फिर पेशकश की. इस तरह सरकार यह संदेश देना चाहती है कि वह अड़ी हुई नहीं है. इसके अलावा संशोधन की पेशकश कर सरकार पीछे हटने का संदेश भी दे चुकी है.

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6- सरकार विपक्षी दलों की दोहरी भूमिका उजागर कर रही है जिन्होंने किसी समय कृषि सुधारों का समर्थन किया था. किसान आंदोलन में राजनीतिक दलों के झंडे दिखने से सरकार कह रही है कि इस आंदोलन का राजनीतिकरण हो गया है और किसान संगठन विपक्षी दलों के हाथों में खेल रहे हैं.

7- बीजेपी के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री सात सौ से अधिक जिलों में प्रेस कॉन्फ्रेंस, किसान रैली और चौपालों के माध्यम से कृषि कानूनों के फायदे गिना रहे हैं. यह जनमत अपने पक्ष में करने का प्रयास होगा ताकि किसान आंदोलन को देश भर में फैलने से रोका जा सके.

8- बीजेपी के हरियाणा के सांसदों और विधायकों ने कृषि मंत्री और जल संसाधन मंत्री से मांग की है कि सतलुज यमुना नहर के मुद्दा का समाधान किया जाए. यह पंजाब के किसानों के साथ आए हरियाणा के किसानों को भावनात्मक रूप से कमजोर करने का प्रयास है क्योंकि इसे हरियाणा के हक से जोड़कर देखा जाता है. 

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9- हरियाणा सरकार जल्द ही स्थानीय निकाय के चुनावों का ऐलान कर सकती है ताकि किसान और प्रभावशाली नेताओं का ध्यान आंदोलन से भटके. राज्य में अगले दो महीनों में चुनाव कराने का प्रस्ताव है. हरियाणा सरकार तृतीय व चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों के लिए भर्ती अभियान चलाने का ऐलान कर सकती है ताकि आंदोलन में जुटे युवाओं को आंदोलन से दूर किया जा सके.

10- सभी बीजेपी मुख्यमंत्रियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने-अपने राज्यों में किसान आंदोलन को न बढ़ने दें. सभी बीजेपी सीएम मीडिया के माध्यम से किसानों के मन में उठी आशंकाओं को दूर करेंगे. इसके लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा है.

मतलब साफ है कि मोदी सरकार किसान संगठनों की कृषि संबंधित तीनों कानूनों को वापस करने की मांग पर विचार भी नहीं कर रही है बल्कि धीरे धीरे किसान आंदोलन की धार को कुंद कर रही है. साथ ही साथ ये प्रचार भी कर रही है कि इस किसान आंदोलन के पीछे मोदी सरकार के खिलाफ बड़ा राजनैतिक षड्यंत्र है.


 

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