एक साल से भी अधिक समय से जातीय हिंसा के कारण चर्चा में चल रहा मणिपुर बुधवार को सियासी कारणों से सुर्खियों में रहा. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाले जनता दल (यूनाइटेड) के मणिपुर प्रदेश अध्यक्ष बीरेन सिंह ने राज्यपाल को पत्र लिखकर सूबे की सरकार से समर्थन वापस लेने का ऐलान कर दिया. मणिपुर विधानसभा में जेडीयू का फिलहाल एक ही विधायक है और उसके भी ट्रेजरी बेंच की जगह विपक्ष में बैठने की खबर ने इम्फाल से पटना और दिल्ली तक हलचल मचा दी. बिहार चुनाव से पहले इस फैसले के मायने तलाशे जाने लगे तो नीतीश कुमार के फिर से पलटी मारने के कयासों ने भी जोर पकड़ लिया.
पटना से दिल्ली तक सियासी अनिश्चितता के बादल गहराए तो एक्शन में आए जेडीयू नेतृत्व ने आनन-फानन में बयान जारी कर बीरेन सिंह को अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित करने का ऐलान करते हुए स्पष्ट किया कि हम बीजेपी के साथ खड़े हैं. बीरेन सिंह की ओर से राज्यपाल को भेजे गए पत्र से लेकर जेडीयू की ओर से उनके निष्कासन तक, मणिपुर के घटनाक्रम को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं. सवाल ये भी है कि मणिपुर में समर्थन वापसी का पत्र भेजने वाले प्रदेश अध्यक्ष को कुछ ही घंटों के भीतर जेडीयू को क्यों निष्कासित करना पड़ा? इसे चार पॉइंट में समझा जा सकता है.
1- जेडीयू का फोकस बिहार की राजनीति
जेडीयू मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों के साथ ही केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली और अन्य राज्यों में भी मौजूदगी दर्ज कराती रही है लेकिन पार्टी का फोकस एरिया बिहार की राजनीति ही रही है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. जेडीयू की कमान किसी दूसरे नेता के हाथ में होने पर भी पार्टी के फैसलों को सीएम नीतीश से जोड़कर देखा जाता रहा है. ऐसा कहा जाता है कि जेडीयू में नीतीश कुमार की सहमति के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता. मणिपुर में समर्थन वापसी के फैसले को भी सीएम नीतीश से जोड़कर देखा जाना लगा था और कयास तो उनके फिर से पाला बदलने, एनडीए से एग्जिट करने तक के लगाए जाने लगे थे.
2- हाल के घटनाक्रम और मांझी के बयान
केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी के बयानों को लेकर बिहार एनडीए पहले से ही असहज था. हालांकि, मांझी अब अपने बयानों पर सफाई दे रहे हैं, जीवनभर पीएम मोदी के समर्थन की प्रतिबद्धता दोहरा रहे हैं लेकिन सियासी गलियारों में इस बात पर चर्चा थमी नहीं है कि क्या बिहार एनडीए में सब ठीक है? ऐसे में मणिपुर के घटनाक्रम से बिहार में गठबंधन कर रही जेडीयू के रुख पर भी सवाल उठने लगे थे. एनडीए में फूट के कयासों को और हवा मिली तो इसका नुकसान कहीं चुनावों में न उठाना पड़ जाए, इन सब बातों को देखते हुए जेडीयू नेतृत्व ने बीरेन सिंह को ही पार्टी से बाहर निकालने का फैसला ठीक समझा.
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3- बिहार चुनाव की मजबूरी
बिहार में सत्ताधारी गठबंधन की अगुवाई संख्याबल में कम होने के बावजूद जेडीयू ही कर रही है. सूबे में इसी साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनावी साल में जेडीयू नहीं चाहती कि किसी दूसरे राज्य के समीकरणों का बिहार में गठबंधन पर नकारात्मक प्रभाव पड़े. विपक्षी दल भी एनडीए में फूट को मुद्दा बना सकते हैं और मणिपुर का घटनाक्रम ये नैरेटिव स्थापित करने के लिए हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता था. यह भी वजह रही होगी कि जेडीयू ने प्रदेश अध्यक्ष को ही बाहर का रास्ता दिखआ देना सही समझा होगा.
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4- विश्वास बहाली का प्रयास
नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने के कारण बीजेपी और जेडीयू के रिश्ते उतने सहज नहीं रहे जितना 2014 चुनाव के पहले प्रधानमंत्री पद के लिए गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के ऐलान से पहले तक थे. पीएम कैंडिडेट के तौर पर नरेंद्र मोदी के नाम का ऐलान किए जाने के बाद नीतीश कुमार की पार्टी ने पुराने सहयोगी बीजेपी से नाता तोड़ने, एनडीए छोड़ने का ऐलान किया था और तब से अब तक नीतीश कुमार दो बार राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के साथ जा चुके हैं, दो ही बार बीजेपी के साथ आ चुके हैं.
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पिछले 10 साल में चार बार पाला बदलने के कारण विश्वास का संकट ही वजह बताया जा रहा है कि सीएम नीतीश, पीएम मोदी या बीजेपी के अन्य वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी वाले हर मंच से आरजेडी संग जाने को गलती बताते हुए अब कहीं नहीं जाने की बात कहते नजर आ रहे हैं. मणिपुर में समर्थन वापसी का फैसला नीतीश के कहीं नहीं जाने वाले बयान पर चोट की तरह देखा जा रहा था और अब प्रदेश अध्यक्ष को हटाने का कदम बीजेपी और जेडीयू के बीच विश्वास बहाली की दिशा में प्रयास की तरह भी देखा जा रहा है.
बिकेश तिवारी