कांग्रेस के नए अध्यक्ष की तलाश शुरू हो गई है, जिसके लिए बाकायदा चुनाव की घोषणा भी हो गई है. सोनिया गांधी अस्वस्थ रहती हैं और राहुल गांधी अध्यक्ष बनने के लिए तैयार नहीं हैं. ऐसी स्थिति में एक बार फिर से गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष बनने की संभावना दिख रही है. आजादी से बाद से अभी तक 18 नेता कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके हैं, जिनमें 5 अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार से रहे, जबकि 13 अध्यक्ष का गांधी परिवार से दूर-दूर तक नाता नहीं रहा. ऐसे में कांग्रेस अध्यक्षों और उनका कार्यकाल कैसा रहा. खासकर गांधी परिवार के बाहर के कांग्रेस अध्यक्षों का, आइए जानते हैं.
बता दें कि 1885 में बनी कांग्रेस पार्टी के अब तक 88 अध्यक्ष रह चुके हैं, जिनमें से 18 अध्यक्ष तो आजादी के बाद बने. इस तरह कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर भले ही नेहरू-गांधी परिवार के पांच सदस्य काबिज रहे हों, लेकिन 40 साल तक उनके हाथों में ही पार्टी की कमान रही. 35 सालों तक पार्टी अध्यक्ष गांधी-परिवार से बाहर के नेता बनते रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सक्सेस रेट देखें तो 1952 से लेकर अभी तक कुल 17 लोकसभा चुनाव हुए हैं. इनमें से कांग्रेस 4 बार गांधी परिवार के पास अध्यक्ष की कमान होते हुए पार्टी हारी तो 3 बार गैर-गांधी अध्यक्ष के रहने पर हार का सामना करना पड़ा.
नेहरू-इंदिरा का कार्यकाल
पंडित जवाहर लाल नेहरू 17 साल तक प्रधानमंत्री रहने के बावजूद आजादी के बाद कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर सिर्फ तीन साल रहे, लेकिन इंदिरा गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष के साथ ही प्रधानमंत्री होने की परिपाटी स्थापित की. 1951 से लेकर 1954 तक जवाहर लाल नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष रहे. उनके बाद 1959 में इंदिरा गांधी अध्यक्ष बनीं. फिर 1978 से 1984 तक इंदिरा दोबारा अध्यक्ष रहीं. इंदिरा गांधी की मौत के बाद 1985 से 1991 तक राजीव गांधी अध्यक्ष बने. जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के रहते हुए कांग्रेस को हर बार जीत मिली.
राजीव गांधी के अध्यक्ष रहते दो बार लोकसभा चुनाव हुए, जिनमें से 1989 में कांग्रेस हारी तो 1991 में जीती थी. हालांकि, 1991 के चुनाव के दौरान ही राजीव की हत्या कर दी गई थी. राजीव गांधी की मौत के 7 साल बाद 1998 में सोनिया गांधी अध्यक्ष बनीं, जो 2017 तक इस पद पर रहीं. सोनिया के रहते 1999 और 2014 के चुनाव के वक्त कांग्रेस को हार मिली तो 2004 और 2009 में जीत. इसके बाद राहुल गांधी दिसंबर 2017 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद इस्तीफा दे दिया. अगस्त 2019 से सोनिया गांधी दोबारा कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष बनी.
गांधी परिवार से बाहर के कांग्रेस अध्यक्ष
यूं तो आजादी के पहले और उसके बाद भी कांग्रेस पार्टी के कई अध्यक्ष नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के रहे हैं. आजादी के समय जे बी कृपलानी के हाथों में पार्टी की कमान रही, जिसके बाद पी. सीतारमैया, पुरुषोत्तम दास टंडन और यू एन धेबार अध्यक्ष रहे. इसके अलावा नीलम संजीव रेड्डी, के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, जगजीवन राम, शंकर दयाल शर्मा, देवकांत बरुआ, के. ब्रह्मानंद रेड्डी, पी. वी. नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी ने भी कांग्रेस की कमान संभाली.
कांग्रेस पार्टी में आखिरी अध्यक्ष सीताराम केसरी थे, जो गांधी परिवार से नहीं आते थे. सीताराम केसरी के बाद से 24 साल हो गए, तब से कांग्रेस की कमान गांधी परिवार के हाथ में ही है. गांधी परिवार में सोनिया गांधी सबसे ज्यादा लंबे समय तक पार्टी की अध्यक्ष रही हैं. कांग्रेस अध्यक्ष का कार्यकाल पहले एक साल का हुआ करता था तो इंदिरा राज में तीन साल का हुआ और फिलहाल पांच साल कर दिया गया है. ऐसे में कांग्रेस की कमान गांधी परिवार से बाहर के जिन 13 नेताओं ने संभाली, उनके कार्यकाल में पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहा?
कृपलानी-सीतारमैय्या-टंडन
देश की आजादी के दौरान जेबी कृपलानी कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं. उन्हें साल 1947 में मेरठ में कांग्रेस के अधिवेशन में यह जिम्मेदारी मिली थी. उन्हें महात्मा गांधी के भरोसेमंद व्यक्तियों में माना जाता था. इसके बाद पट्टाभि सीतारमैय्या साल 1948 में जयपुर अधिवेशन में पार्टी प्रमुख के रूप में चुने गए थे. साल 1949 में दोबारा फिर से उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष चुना गया. इसके बाद पुरुषोत्तम दास टंडन 1950 में काग्रेस के अध्यक्ष बने. नासिक अधिवेशन में उन्हें चुना गया था. हालांकि, तीनों ही नेताओं के अध्यक्ष रहते हुए आम चुनाव नहीं हो सके थे, क्योंकि उस समय तक अंतरिम सरकार चल रही थी.
यू एन ढेबार
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस की कमान छोड़ी तो यू एन ढेबार अध्यक्ष चुने गए. ढेबार 1955 में पहली बार अध्यक्ष बने और पांच साल 1959 तक रहे. अमृतसर, इंदौर, गुवाहाटी और नागपुर के अधिवेशनों में अध्यक्ष चुना गया था. इस दौरान साल 1957 में लोकसभा चुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस 48 फीसदी वोटों के साथ 371 सीटें जीतने में कामयाब रही. इस तरह ढेबार पहले नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के अध्यक्ष थे, जिनके कार्यकाल में चुनाव हुए थे.
नीलम संजीव रेड्डी
ढेबार के बाद नीलम संजीव रेड्डी 1960 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 1963 तक पद पर रहे. नीलम रेड्डी के अध्यक्ष रहते हुए 1962 में लोकसभा चुनाव हुए थे, जिनमें कांग्रेस 45 फीसदी वोटों के साथ 361 सीटें जीतने में सफल रही थी. साल 1977 से 1982 तक भारत के छठे राष्ट्रपति रहे.
के. कामराज
भारतीय राजनीति में किंगमेकर कहे जाने वाले के. कामराज 1964 में कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे और 1967 तक अपने पद पर रहे. कहा जाता है कि के. कामराज ही थे, जिन्होंने नेहरू की मौत के बाद लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. के. कामराज के कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए 1967 में लोकसभा चुनाव हुए थे. इस चुनाव में कांग्रेस 41 फीसदी वोटों के साथ 283 सीटें जीतने में कामयाब रही थी.
एस. निजलिंगप्पा
कर्नाटक के एकीकरण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले और राज्य के पहले मुख्यमंत्री एस. सिद्धवनल्ली निजलिंगप्पा 1968 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. यह वही समय था जब कांग्रेस का विभाजन हुआ, तो उन्होंने ही इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाले गुट के खिलाफ संगठन के मोर्चे का समर्थन किया था. हालांकि, वो लगातार दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे, लेकिन उनके कार्यकाल में एक बार भी लोकसभा चुनाव नहीं हो सके.
जगजीवन राम
कांग्रेस का दलित चेहरा और कद्दावर नेता जगजीवन राम साल 1970 में कांग्रेस अध्यक्ष बने और 1971 में भी दोबारा फिर से चुने गए. इस दौरान साल 1971 में लोकसभा चुनाव हुए, जिनमें कांग्रेस पार्टी 44 फीसदी वोटों के साथ 352 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. इस तरह से जगजीवन राम का कार्यकाल सफल रहा था और उन्हें इंदिरा गांधी का वफादार और पार्टी के लिए संकट मोचन के तौर पर भी जातना जाता था.
शंकर दयाल शर्मा
जगजीवन राम के बाद कांग्रेस की कमान शंकर दयाल शर्मा ने 1972 में संभाली. चार साल तक कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे. गांधी परिवार के करीबी नेताओं में उन्हें गिना जाता था और बाद में राष्ट्रपति भी बने. इंदिरा से लेकर सोनिया तक के करीबी रहे.
देवकांत बरुआ
देवकांत बरुआ साल 1975 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 1977 तक रहे. इस तरह आपातकाल के समय कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वो कार्यरत थे. देवकांत बरुआ को 'इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया' टिप्पणी के लिए जाना जाता है. आपातकाल के बाद 1977 में लोकसभा चुनाव उनके कार्यकाल में हुए थे, जिसमें पार्टी को करारी मात खानी पड़ी थी. कांग्रेस 35 फीसदी वोटों के साथ 153 सीटें ही जीतने में कामयाब रही. वह गांधी परिवार के वफादार थे, लेकिन बाद में कांग्रेस के विभाजन के बाद इंदिरा विरोधी गुट में शामिल हो गए थे. ऐसे में कांग्रेस की कमान उनसे लेकर कासु ब्रह्मनंद रेड्डी को सौंप दी, जो 1978 तक रहे. इसके कांग्रेस की कमान इंदिरा और राजीव गांधी के हाथों में लंबे समय तक रही.
पीवी नरसिम्हा राव
राजीव गांधी की हत्या के बाद पीवी नरसिम्हा राव साल 1992 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 1996 तक रहे. इस दौरान पार्टी के अध्यक्ष रहने के साथ-साथ देश के प्रधानमंत्री पद पर भी रहे. राजीव गांधी का निधन हो जाने और कांग्रेस की सरकार बनने पर नरसिम्हा राव पीएम बने थे. नरसिम्हा राव के कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए 1996 में लोकसभा चुनाव हुए, जिसमें कांग्रेस को करारी मात खानी पड़ी. इस चुनाव में कांग्रेस 28 फीसदी वोटों के साथ 140 सीटें जीतने में कामयाब रही.
सीताराम केसरी
नरसिम्हा राव के बाद सीताराम केसरी साल 1996 में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाए गए थे और 1998 तक वो इस पद रहे. इस दौरान साल 1998 में लोकसभा चुनाव भी हुए थे, जिनमें कांग्रेस को करारी मात खानी पड़ी थी. कांग्रेस 26 फीसदी वोटों के साथ 141 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. हालांकि, इसी के बाद कांग्रेस की कमान उनसे छीन ली गई थी और सोनिया गांधी को सौंप दी गई थी.
इसके बाद से कांग्रेस में कोई भी व्यक्ति गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष नहीं बन सका. कांग्रेस सोनिया के अगुवाई में जरूर सत्ता में आई, लेकिन दस साल के बाद ऐसा बाहर हुई है कि आज अपने इतिहास में सबसे बुरे दौर में खड़ी हुई है.
कुबूल अहमद