आज मकर संक्रांति के पर्व से प्रयागराज में कुंभ का आगाज हो चुका है. मकर संक्रांति के पहले शाही स्नान को देखकर दुनियाभर के लोगों की आंखें थमी रह गईं. लेकिन शाही स्नान के अलावा इस मेले में सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र नागा साधु होते हैं. नागा साधुओं का जीवन सभी साधुओं की तुलना में सबसे ज्यादा कठिन होता है. इनका संबंध शैव परंपरा की स्थापना से माना जाता है. आइए जानें, कैसे बनते हैं नागा साधु और कैसा होता है इनका जीवन.
13 अखाड़ों में से बनाए जाते हैं नागा साधु-
कुंभ में शामिल होने वाले 13 अखाड़ों में से सबसे ज्यादा नागा साधु जूना अखाड़े से बनाए जाते हैं. नागा साधु बनाने से पहले उन्हें कई परीक्षाओं का सामना करना पड़ता है. उनकी और उनके पूरे परिवार की जांच की जाती है. उन्हें कई सालों तक अपने गुरुओं की सेवा करनी पड़ती है. साथ ही अपनी इच्छाओं को त्यागना पड़ता है.
महापुरुष के बाद ऐसे बनते हैं अवधूत-
महापुरुष के बाद ही नागाओं की अवधूत बनने की प्रक्रिया शुरू होती है. उन्हें स्वयं का श्राद्ध करके अपना पिंडदान करना पड़ता है. इस दौरान साधु बनने वाले लोगों को पूरे 24 घंटे तक बिना कपड़ों के अखाड़े के ध्वज के नीचे खड़ा रहना पड़ता है. परीक्षाओं में सफल होने के बाद ही उन्हें नागा साधु बनाया जाता है.
किन स्थानों पर बनाए जाते हैं नागा साधु-
कुंभ का आयोजन हरिद्वार में गंगा, उज्जैन की शिप्रा, नासिक की गोदावरी और इलाहाबाद में जहां गंगा, यमुना और सरस्वती का मिलन होता है, आदि चार पवित्र स्थानों पर होता है. इसलिए नागा साधु बनने की प्रक्रिया भी इन्हीं चार जगहों पर होती है. मान्यता है कि इन्हीं चार जगहों पर अमृत की बूंदें गिरी थीं. तब से आज तक कुंभ का आयोजन इन्हीं चार जगहों पर किया जाता है.
नागा साधुओं का जीवन बहुत रहस्मयी होता है. कुंभ के बाद वह कहीं गायब हो जाते हैं. कहा जाता है कि नागा साधु जंगल के रास्ते से देर रात में यात्रा करते हैं. इसलिए ये किसी को नजर नहीं आते हैं.
नागा साधु समय-समय पर अपनी जगह बदलते रहते हैं. इस कारण इनकी सही स्थिति का पता लगाना बहुत मुश्किल होता है. ये लोग गुप्त स्थान पर रहकर ही तपस्या करते हैं.