'हिंदी थोपना स्वीकार नहीं, लेकिन अंध विरोध भी नहीं...', बोले पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू

समय-समय पर देशभर में भाषा को लेकर विवाद चलता रहता है. कई राज्य केंद्र पर हिंदू थोपने का आरोप लगाते रहते हैं. हिंदी भाषा को लेकर पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने अपनी राय रखी है. उन्होंने कहा है कि हिंदी थोपना स्वीकार नहीं, लेकिन अंध विरोध भी नहीं होनी चाहिए.

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पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा कि मातृभाषा गर्व से बोलें (Photo: ITG) पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा कि मातृभाषा गर्व से बोलें (Photo: ITG)

अपूर्वा जयचंद्रन

  • हैदराबाद,
  • 12 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:59 PM IST

एक सभा को संबोधित करते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने देश में लंबे समय से चल रहे भाषा विवाद पर अपनी राय सामने रखी. उन्होंने लोगों से भाषा (लैंग्वेज) के मुद्दे पर बैलेंस्ड अप्रोच रखने की अपील की है. उन्होंने साफ कहा कि हिंदी का आंख मूंद करके विरोध नहीं होना चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी दोहराया कि हिंदी को किसी भी व्यक्ति पर थोपना उचित नहीं है और वे खुद कभी इसका समर्थन नहीं करेंगे.

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पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करना चाहता है या नेशनल लेवल पर अपनी पहचान बनाना चाहते है तो उसके लिए हिंदी सीखना उपयोगी हो सकता है.

उनके अनुसार, हिंदी देश के कई हिस्सों में व्यापक रूप से बोली और समझी जाती है, इसलिए यह बातचीत और नए अवसरों को बनाने में मदद करेगा.

उन्होंने इंग्लिश के इम्पोर्टेंस को भी माना. नायडू ने कहा कि भले ही इंग्लिश इंटरनेशनल लैंग्वेज है, लेकिन यह इंटरनेशनल पर बातचीत करने में स्थापित करने वाला लैंग्वेज है. इसलिए स्टूडेंट्स के लिए इंग्लिश सीखना भी जरूरी है, क्योंकि यह दुनिया में हर स्तर पर बातचीत और करियर के अवसरों में मदद करती है.

यह भी पढ़ें: 'क्या रेफरी की तरह हर झगड़ा सुलझाउंगा...', भाषा विवाद पर बोले आदित्य ठाकरे, कहा- दोनों पक्षों की हिंसा का हो विरोध

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हालांकि उन्होंने मातृभाषा (मातृभाषा) को सबसे उच्चा बताया. उनका कहना था कि हर व्यक्ति को पहले अपनी मातृभाषा में दक्षता हासिल करनी चाहिए. घर में, दादा-दादी के साथ, पड़ोसियों से और धार्मिक स्थलों पर अपनी मातृभाषा में ही संवाद करना चाहिए. यही किसी भाषा को संरक्षित रखने का सबसे प्रभावी तरीका है.

नायडू ने युवाओं से कहा कि अपनी मातृभाषा बोलने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए. भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं है, बल्कि कल्चर और पहचान का हिस्सा भी है. इसलिए मातृभाषा पर गर्व करें, लेकिन साथ ही हिंदी और अंग्रेजी जैसी अन्य भाषाओं को भी सीखें ताकि फ्यूचर में अवसरों की कमी न हो.

उन्होंने यह संदेश दिया कि भाषा के मुद्दे को टकराव का विषय बनाने के बजाय इसे सीखने और आगे बढ़ने के रास्ते के रूप में देखा जाना चाहिए.

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