नदियों में प्लास्टिक कचरे का मामला, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से चार हफ्ते में मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में गंगा नदी और अन्य नदियों में प्लास्टिक फेंकने की बढ़ती घटनाओं पर अपनी चिंता जाहिर की और केंद्र से कदम उठाने को कहा. कोर्ट ने कहा कि नदियों की सफाई में जबतक जनता के सपोर्ट से कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता है, तब तक सभी कोशिशें व्यर्थ ही रहेंगी.

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नदियों की सफाई पर एससी ने केंद्र से मांगा जवाब नदियों की सफाई पर एससी ने केंद्र से मांगा जवाब

संजय शर्मा / कनु सारदा

  • नई दिल्ली,
  • 06 अगस्त 2024,
  • अपडेटेड 4:46 PM IST

नदियों को प्रदूषण से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा दखल देते हुए कहा कि नदियों को प्लास्टिक कचरे से मुक्ति नहीं मिली तो नदियों की सफाई के प्रयास भ्रामक ही रहेंगे. नदियों को प्लास्टिक कचरे से मुक्त करना होगा. कोर्ट ने कहा कि जब तक नदियों को प्लास्टिक से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक सफाई के प्रयास व्यर्थ हैं.

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पर्यावरण की अनियंत्रित क्षति पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए केंद्र से 4 सप्ताह में जवाबी हलफनामा मांगा है. जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस एस वी एन भट्टी की बेंच ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि इस मामले में विचार-विमर्श के दौरान यह बात सामने आई कि जिन क्षेत्रों को ऐसे प्रदूषणकारी उत्पादों से मुक्त रखा जाना है, वहां प्लास्टिक का व्यापक उपयोग हो रहा है.

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जनता के सहयोग से ठोस कदम उठाने की जरूरत

बेंच ने कहा, "जब तक जिम्मेदार प्राधिकारियों द्वारा जनता के सहयोग से ठोस कोशिश नहीं किए जाते, चाहे कितनी भी कोशिश क्यों न की जाए, तब तक देश में गंगा नदी/अन्य सभी नदियों और जल निकायों के जल की गुणवत्ता में सुधार अधूरा ही रहेगा."

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अतिक्रमणों पर बिहार सरकार से मांगा जवाब

प्लास्टिक डंपिंग से पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंच रही है और देश में नदियों के किनारों और जल निकायों में जलीय जीवन पर भी इसका असर पड़ रहा है. इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने गंगा के किनारों पर अवैध अतिक्रमणों पर जोर दिया, खासकर बिहार में, और इन मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगा है.

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अवैध निर्माणों के खिलाफ हो रही कानूनी जांच

यह निर्देश बिहार सरकार को गंगा के बाढ़ के मैदानों, खासकर पटना के आसपास से अवैध निर्माणों को हटाने के लिए पहले के आदेश के बाद आया है. यह कानूनी जांच पटना के रहने वाले अशोक कुमार सिन्हा की याचिका के बाद हो रही है, जिन्होंने संवेदनशील बाढ़ के मैदानों पर अवैध निर्माणों के बारे में उनकी चिंताओं को राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा खारिज किए जाने के खिलाफ अपील की थी.

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