'हमारे खिलाफ सबूत नहीं, जमानत दी जाए,' SC से प्रिंस हत्याकांड में आरोपी को जमानत देने की मांग

2017 में ग्रुरुग्राम के निजी स्कूल में 7 साल के मासूम प्रिंस की गला रेतकर हत्या की गई थी. उसका शव बाथरूम में मिला था. इस घटना के बारे में जानकर हर कोई दंग रह गया था, क्योंकि आरोप 11वीं में पढ़ने वाले छात्र पर लगा था. कहा गया था कि मासूम प्रिंस की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई, ताकि परीक्षा के बाद होने वाली पैरेंट्स-टीचर्स मीटिंग रद्द हो जाए.

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प्रिंस हत्याकांड में आरोपी की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है. प्रिंस हत्याकांड में आरोपी की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही है.

कनु सारदा

  • नई दिल्ली,
  • 20 अक्टूबर 2022,
  • अपडेटेड 12:45 PM IST

गुरुग्राम के प्रिंस हत्याकांड के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है. इस दौरान आरोपी छात्र के वकील ने जमानत देने की मांग की है. इसके साथ ही कोर्ट को बताया है कि सीबीआई जांच में अब तक ऐसा कोई सुबूत हाथ नहीं लगा है जो आरोपी के खिलाफ हो. वहीं, कोर्ट ने भी जांच पर ऐतराज जताया है.

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बता दें कि 2017 में ग्रुरुग्राम के निजी स्कूल में 7 साल के मासूम प्रिंस की गला रेतकर हत्या की गई थी. उसका शव बाथरूम में मिला था. इस घटना के बारे में जानकर हर कोई दंग रह गया था, क्योंकि आरोप 11वीं में पढ़ने वाले छात्र पर लगा था. कहा गया था कि मासूम प्रिंस की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई, ताकि परीक्षा के बाद होने वाली पैरेंट्स-टीचर्स मीटिंग रद्द हो जाए. सोमवार को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने अपने पुराने आदेश को जारी रखा और हत्या के मामले में नाबालिग आरोपी को बालिग मानकर सुनवाई करने का फैसला सुनाया है. 

किशोर न्याय अधिनियम के तहत जमानत का हकदार

गुरुवार को आरोपी छात्र की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले में सुनवाई की. आरोपी की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने पक्ष रखा. उन्होंने बेंच के सामने कहा कि वह किशोर न्याय अधिनियम के तहत जमानत के हकदार हैं. भले ही आरोपी पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाए. मनन ने बेंच को मामले की पूरी जानकारी दी और बताया कि घटना कैसे हुई?

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मेरे खिलाफ सल्फास सर्च करना सबूत बताया जा रहा

मनन ने कहा- मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं है. मैं इस मामले में 5 साल से पीड़ित हूं. मेरे खिलाफ अब तक कोई सबूत नहीं मिला है. मैं (आरोपी) पढ़ाई में अच्छा नहीं था, लेकिन मुझे पियानो बजाना पसंद है और सीबीआई का आरोप है कि चूंकि मैं परीक्षा से बचना चाहता था, इसलिए मैंने उस बच्चे को मार डाला. मैंने अपने लैपटॉप पर सर्च किया है कि सल्फास का क्या उपयोग है. इसके अलावा, मेरे लैपटॉप पर कुछ तस्वीरें हैं, इस तरह के सबूत मेरे खिलाफ बताए जा रहे हैं.

कोर्ट बोला- जांच एजेंसी के दस्तावेज पढ़ने योग्य नहीं

इस पर बेंच ने जांच एजेंसी को फटकार लगाई और कहा- जांच एजेंसी द्वारा हमारे सामने दाखिल किए गए दस्तावेज बिल्कुल भी पढ़ने योग्य नहीं हैं. कम से कम उन दस्तावेज को फाइल करें, जिसे आप स्वयं पढ़ सकते हैं. मनन ने एक सीनियर लड़की का बयान पढ़ा, जिसमें उसने गवाही दी कि याचिकाकर्ता बाहर आया और वह सीधे अपनी क्लास में चला गया.

मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी

मनन ने कहा कि मुझे समझ में नहीं आता कि ये चीजें सीबीआई द्वारा दिखाए गए सीसीटीवी फुटेज का हिस्सा क्यों नहीं हैं. ये सब हेरफेर है और कुछ नहीं. सिर्फ इस धारणा पर कि मैंने (आरोपी) पोर्न देखी, मैंने सल्फास के बारे में सर्च किया, इसके लिए मुझे दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इस लड़के (प्रिंस) से मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी.

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चाकू ड्राइवर के पास बरामद हुआ

मनन ने आगे कहा- सीबीआई को टॉयलेट के अंदर से याचिकाकर्ता का फिंगर प्रिंट मिला है. ये जांच के हालात हैं. बेंच ने पूछा- कोई बरामदगी नहीं हुई? इस पर मनन ने कहा- मेरे पास से कुछ भी बरामद नहीं हुआ है. सीबीआई के वकील ने कहा कि वॉशरूम से चाकू की बरामदगी की गई है. मनन ने कहा- लेकिन वो चीजें ड्राइवर अशोक के पास से बरामद हुई हैं और उसने अपने बयान में कबूल किया है. मनन ने बताया कि वह कैसे जमानत के हकदार हैं. उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया और बताया कि कैसे जमानत दी जा सकती है. मनन का कहना था कि जेजे एक्ट की धारा 12 में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है.

ये मुकदमा अब तक खत्म हो जाना चाहिए...

बेंच ने कहा- लेकिन हम इस कोर्ट के पिछले आदेश को कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं. मनन मिश्रा ने कहा- ये आदेश 2020 में पारित हुआ. तब से लंबित है. बेंच ने कहा- ये मुकदमा अब तक खत्म हो जाना चाहिए था, लेकिन यह खेदजनक स्थिति है कि इस मामले में सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है. यदि अपराध जघन्य है तो कानून उसके अनुसार कार्रवाई निर्धारित करता है. 

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मनन ने कहा- यहां तक ​​कि 2015 में अधिनियम में संशोधन के बाद पुनर्वास की धारा पर जोर दिया गया था. ये मामला सिर्फ झूठे आरोप का है और कुछ नहीं. बेंच ने साफ किया कि हम एक लिमिटेड पॉइंट पर हैं और मामले को रद्द करने पर नहीं. 2019 में भी यही आदेश पारित किया गया था. यह दो बार हो चुका है, अब हमारे लिए इस पर नए सिरे से विचार करना मुश्किल होगा.

ASG बनर्जी ने कहा- बेंच ने जो स्टैंड लिया है, उससे मैं सहमत हूं. इस पर बेंच ने कहा- फिलहाल हम इस बात पर कायम हैं कि भले ही उस पर जमानत के लिए वयस्क के तौर पर मुकदमा चलाया जाए. ASG बोले- अधिनियम की धारा 12 में कहा गया है कि ये आवेदन उसके द्वारा किया जाना है. बेंच ने पूछा- जमानत के नाम पर हम एक बच्चे के साथ क्या कर रहे हैं? ASG ने कहा- धारा 12 के होने का एक कारण है. वह अब एक वयस्क है और वह अभी ये आवेदन नहीं कर सकता.

बेंच ने कहा- लेकिन ये अकेले उसे जमानत देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकता. एएसजी ने जेजे अधिनियम की धारा 12 पढ़ी. बेंच ने कहा- ये एक काल्पनिक स्थिति है, मान लीजिए कि वह अभी 21 साल का है, मान लीजिए कि अगर जेजे बोर्ड ने एक स्टैंड लिया था कि उसे किशोर के रूप में पेश किया जाना चाहिए तो आपका क्या स्टैंड होगा? बेंच ने कहा- हमें कोई फॉल्ट फाइंडिंग सेशन नहीं मिल रहा है. हम यहां इस मुद्दे को हल करने के लिए हैं.

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129 गवाह, इसलिए मुकदमे में देरी हुई

एएसजी ने कहा- मुकदमे में देरी इसलिए हुई क्योंकि हमारे पास 129 गवाह हैं. बेंच ने कहा- ऐसा नहीं है. हम किशोर न्याय अधिनियम के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं. एएसजी ने बताया कि मेरे पास अपने सबमिशन का समर्थन करने के लिए उच्च न्यायालय का निर्णय है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले में कहा गया है कि जमानत देने के लिए अपराधों की प्रकृति पर विचार करने की आवश्यकता है. बेंच ने पूछा- वो कौन सी बात है जो आप दिखाना चाहते हैं.

कोर्ट ने कहा- ये बहुत गंभीर केस

बेंच ने कहा- ये एक बहुत ही गंभीर मसला है, जहां एक बच्चे की जान चली जाती है और माता-पिता अपने बच्चे को खो देते हैं और दूसरी तरफ एक युवा लड़के ने मुकदमा शुरू नहीं होने पर भी 5 साल हिरासत में बिताए हैं. सीबीआई के वकील ने कहा कि इस मामले को तीन जजों के पास वापस भेजा जाए क्योंकि इससे पहले तीन जजों ने आदेश पारित किया था. निर्णय एक दूसरे के विपरीत हैं. अब तक धारा 12 की प्रयोज्यता पहले से ही मानी जाती है.

 

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