Stray Dogs Supreme Court Hearing LIVE: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की बेंच के साथ आवारा कुत्तों के मुद्दे पर सुनवाई फिर से की. इस दौरान उन याचिकाओं पर जोर दिया गय, जो आवारा जानवरों से होने वाले खतरों और उन्हें कंट्रोल करने में नागरिक अधिकारियों की कथित लापरवाही को उजागर करती हैं.
इससे पहले बुधवार को, बेंच ने नगर निकायों द्वारा नियमों का पालन न करने पर कड़ी आपत्ति जताई थी. कोर्ट ने इस पर गौर किया कि भारत में मौतें सिर्फ कुत्तों के काटने से नहीं, बल्कि सड़कों पर आवारा जानवरों के कारण होने वाली हादसों से भी होती हैं. यह देखते हुए कि कोई भी जानवर के 'काटने या न काटने के मूड' का अनुमान नहीं लगा सकता. बेंच ने इस सिद्धांत पर जोर दिया कि रोकथाम इलाज से बेहतर है. कोर्ट ने बुधवार को सिर्फ़ कुत्तों पर केंद्रित दलीलों पर सवाल उठाते हुए सवाल उठाया था, "दूसरे जानवरों की ज़िंदगी का क्या? मुर्गियों और बकरियों का क्या? क्या उनकी ज़िंदगी नहीं होती?"
पिछले साल नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंड, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और रेलवे स्टेशनों सहित संवेदनशील सार्वजनिक जगहों से आवारा कुत्तों को हटाने का आदेश दिया था और निर्देश दिया था कि इन जानवरों को तय शेल्टर में ट्रांसफर किया जाए.
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में आज क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को सितंबर 2025 में लद्दाख में हुई हिंसा में कथित भूमिका के लिए हिरासत में लिए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर भी सुनवाई होनी है. वांगचुक की पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में उनकी हिरासत के खिलाफ याचिका दायर की है. पिछले कई दिनों से राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहने वाले अरावली मुद्दे पर भी आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है.
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आवारा कुत्तों के मामले में दिन की सुनवाई खत्म कर दी, जिसमें जस्टिस संदीप मेहता ने आगे की चर्चा की दिशा बताई.
जस्टिस मेहता ने आज की सुनवाई को खत्म करने का ऐलान करते हुए कहा कि कोर्ट शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई फिर से शुरू करेगा और सभी वकीलों से 29 दिसंबर को पब्लिश टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट पढ़कर तैयार होकर आने को कहा, जिसका टाइटल "On the roof of the world, feral dogs hunt down Ladakh's rare species" है.
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आवारा कुत्तों के मामले की सुनवाई के दौरान जानवरों के व्यवहार पर खुलकर टिप्पणियां कीं, जो बेंच के मुताबिक उनके पर्सनल अनुभव पर आधारित थीं. कोर्ट ने कहा कि कुत्ते इंसानों में डर को महसूस कर सकते हैं और जब उन्हें डर का पता चलता है, तो उनके हमला करने की संभावना ज़्यादा होती है. जब यह बात कही गई, तो कोर्टरूम में मौजूद कुछ कुत्ते प्रेमियों ने सहमति में सिर हिलाया, जिसके बाद बेंच को दखल देना पड़ा और उनसे प्रतिक्रिया न देने को कहा.
कोर्ट ने कहा, "कुत्ता हमेशा उस इंसान को सूंघ सकता है, जो कुत्तों से डरता है. जब उसे यह महसूस होता है, तो वह हमेशा हमला करेगा. हम पर्सनल अनुभव से यह बात कह रहे हैं."
याचिकाकर्ताओं में से एक के वकील ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि फीडिंग ज़ोन खुद ही परेशानी का सोर्स बन गए हैं, क्योंकि ऐसे इलाकों में कुत्तों के ज़्यादा होने से स्थानीय लोगों को दिक्कतें होती हैं. वकील ने कुछ पालतू कुत्तों के मालिकों द्वारा नियमों के उल्लंघन का मुद्दा भी उठाया और आरोप लगाया कि कुत्तों को अक्सर पब्लिक जगहों पर बिना पट्टे के रखा जाता है, जिससे सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं.
ज़िम्मेदारी के मुद्दे पर बहस करते हुए वकील ने कहा, "राज्य आवारा कुत्तों का मालिक नहीं है और उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ वैक्सीनेशन और नसबंदी तक सीमित है."
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सड़कें और आने-जाने के रास्ते साफ़ और सुरक्षित रखे जाने चाहिए. किसी व्यक्ति के अपनी गली और घर तक पहुंचने के अधिकार से समझौता नहीं किया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को याचिकाकर्ता विजय गोयल के वकील की दलीलें सुनीं, जिन्होंने तर्क दिया कि आवारा कुत्तों का मुद्दा 'कुत्ते प्रेमियों' के बारे में नहीं है, बल्कि निवासियों के अपने घरों और सड़कों तक सुरक्षित रूप से पहुंचने के अधिकार के बारे में है.
वकील ने कहा कि कुत्ते अपने इलाके को लेकर बहुत पज़ेसिव होते हैं, और उनका इलाका आमतौर पर हर 200 से 300 मीटर पर बदलता रहता है. उन्होंने चेतावनी दी कि जब कुत्तों के इलाके से दूर खाने की जगहें बनाई जाती हैं, तो जानवर अक्सर खाने की तलाश में दूसरे कुत्तों के इलाकों में चले जाते हैं, जिससे हिंसक टकराव का खतरा बढ़ जाता है. उन्होंने कहा कि इससे उन इलाकों में रहने वाले निवासियों को कुत्तों के काटने का खतरा बढ़ जाता है.
एडवोकेट ने कहा कि संस्थागत इलाकों से कुत्तों को हमेशा के लिए हटाने के मौजूदा आदेश को रिहायशी इलाकों में भी लागू किया जाना चाहिए. वकील ने आगे कहा, "ज़ाहिर है, कुत्ते को सलाह नहीं दी जा सकती लेकिन कुत्ते के मालिक को सलाह दी जा सकती है. हम इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते कि ABC नियम कुत्तों की आबादी को बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि धीरे-धीरे कम करने के इरादे से बनाए गए हैं."
(इनपुट- अनीषा माथुर)
एडवोकेट नकुल दीवान ने सुप्रीम कोर्ट को ट्रैप, न्यूटर और रिलीज़ मॉडल का सुझाव दिया. उन्होंने कहा, "कुत्तों के स्वभाव को देखते हुए यह ज़रूरी है कि उन्हें उसी जगह वापस छोड़ा जाए, जहां से उन्हें पकड़ा गया था." दीवान ने यह भी कहा कि बेंगलुरु में कुत्तों की माइक्रो-चिपिंग शुरू हो गई है और यह महंगा नहीं है."
सीनियर एडवोकेट नकुल दीवान ने आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाने की बात कही. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 'कम्युनिटी कुत्तों' की बढ़ती तादाद पर रोक लगाने की ज़रूरत है. दीवान ने कहा, "यह ऐसी समस्या नहीं है, जिसे एक दिन में खत्म किया जा सके. हमें कम्युनिटी कुत्तों की बढ़ती संख्या को कम करने की ज़रूरत है. हम ऐसी स्थिति भी नहीं चाहते, जहां हमारे पास कानून हो, लेकिन उसे लागू न करने की वजह से हमें कोई सख्त कदम उठाना पड़े."
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आवारा कुत्तों के मामले में आगे की दलीलें सुनीं, जिसमें वरिष्ठ वकील सीयू सिंह ने तर्क दिया कि यह मुद्दा कुत्तों से आगे बढ़कर सभी आवारा जानवरों तक फैला है और इसके लिए एक संतुलित नजरिए की जरूरत है.
एडवोकेट ने कोर्ट को बताया कि किसी इलाके से कुत्तों को अचानक हटाने से अक्सर अनचाहे नतीजे निकलते हैं, जिसमें चूहों और बंदरों की आबादी में तेज़ी से बढ़ोतरी शामिल है. उन्होंने कहा कि चूहे, जो कई बीमारियां फैलाते हैं, कुत्तों की मौजूदगी से कंट्रोल में रहते हैं, और चेतावनी दी कि अचानक दखल देने से यह संतुलन बिगड़ सकता है.
गुरुवार को सुनवाई फिर से शुरू करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के मामले में एक तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि कुत्ते और बिल्लियां स्वाभाविक दुश्मन हैं और बिल्लियां चूहों को कंट्रोल करने में मदद करती हैं.
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "क्या इसका कुत्तों को हटाने से कोई लेना-देना था? हल्के-फुल्के अंदाज़ में कहें तो, कुत्ते और बिल्लियां दुश्मन हैं. बिल्लियां चूहों को मारती हैं, इसलिए हमें ज़्यादा बिल्लियों और कम कुत्तों को बढ़ावा देना चाहिए. यही समाधान होगा. हमें बताएं कि आप हॉस्पिटल के गलियारों में कितने कुत्ते घूमते हुए देखना चाहते हैं?"
कोर्ट सीनियर एडवोकेट सीयू सिंह की दलीलों का जवाब दे रहा था, जिन्होंने संस्थागत इलाकों से कुत्तों को अचानक हटाने के खिलाफ चेतावनी दी थी. उन्होंने कहा कि ऐसे कामों से अक्सर "वैक्यूम इफ़ेक्ट" होता है, जिससे चूहों की आबादी बढ़ जाती है और दूसरे अनचाहे नतीजे होते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश में बदलाव की मांग करने वाले एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने तर्क दिया है कि सभी आवारा कुत्तों को पकड़ना इसका समाधान नहीं है और उन्होंने इंसान-जानवर के बीच टकराव को सुलझाने के लिए एक वैज्ञानिक, विश्व स्तर पर स्वीकार्य तरीके की मांग की. उन्होंने कोर्ट से CSVR मॉडल अपनाने की अपील की. पकड़ो, नसबंदी करो, टीका लगाओ और छोड़ दो. इससे आवारा कुत्तों की आबादी को मैनेज करने में मदद मिलेगी और कुत्ते के काटने की घटनाओं में धीरे-धीरे कमी आएगी.
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को नागरिक अधिकारियों द्वारा नियमों और कोर्ट के निर्देशों को लागू करने में कमियों को उजागर करते हुए कहा कि देश में मौतें सिर्फ़ कुत्तों के काटने तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि आवारा जानवरों से जुड़े सड़क हादसों से भी होती हैं.
बेंच ने कहा, "सड़कें कुत्तों और आवारा जानवरों से साफ़ होनी चाहिए. यह सिर्फ़ कुत्तों के काटने की बात नहीं है, बल्कि सड़कों पर आवारा जानवरों का घूमना भी खतरनाक साबित हो रहा है और हादसों का कारण बन रहा है. सुबह किस कुत्ते का मूड कैसा होगा, यह कोई नहीं जानता. नागरिक निकायों को नियमों, मॉड्यूल और निर्देशों को सख्ती से लागू करना होगा."
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को आवारा कुत्तों के मुद्दे पर कई याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखी, जिसमें सिर्फ़ कुत्तों पर केंद्रित दलीलों पर सवाल उठाते हुए पूछा, "दूसरे जानवरों की ज़िंदगी का क्या? मुर्गियों और बकरियों का क्या? क्या उनकी ज़िंदगी नहीं होती?"
सुनवाई के दौरान, एक याचिकाकर्ता कोर्ट के सामने खड़ा हुआ और एक 90 साल के शख्स की तस्वीर दिखाने की कोशिश की, जिस पर कथित तौर पर आवारा कुत्तों ने हमला किया था और बाद में चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई थी. याचिकाकर्ता ने कहा, "देखिए, जब आवारा कुत्ते हमला करते हैं, तो ऐसा होता है." कोर्ट ने इस कोशिश को रोकते हुए कहा, "यह तस्वीर दिखाने की कोई ज़रूरत नहीं है."
पीड़ितों की ओर से बहस करते हुए वकील ने कोर्ट से कहा, "लोग आवारा कुत्तों की वजह से परेशान हैं. मानवाधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए." अंतरराष्ट्रीय तरीकों का ज़िक्र करते हुए वकील ने कहा कि जापान और USA में 'ड्रैम्बॉक्स' किल शेल्टर हैं, जहां छोड़े गए कुत्तों को शेल्टर होम में ले जाया जाता है और अगर उन्हें कोई गोद नहीं लेता तो उन्हें इच्छामृत्यु दे दी जाती है. उन्होंने आगे कहा कि यही वजह है कि जापान में आवारा कुत्तों की समस्या नहीं है और 1950 से रेबीज़ से कोई मौत नहीं हुई है.
एक पशु अधिकार कार्यकर्ता ने पहले कहा था, "हम सभी आवारा कुत्तों को पाउंड में रखने की बात कर रहे हैं। अगर कुत्ते गायब हो गए तो हम कचरे और बंदरों का क्या करेंगे?"