जब कश्मीर के राजा हरिसिंह को भारत विलय के लिए तैयार करने में आजाद भारत की पहली सरकार अक्तूबर 1947 तक भी सफल नहीं हो पाई, तब सरदार पटेल ने पंडित नेहरू से सलाह कर तत्कालीन संघ प्रमुख गुरु गोलवलकर को श्रीनगर जाकर राजा हरिसिंह को मिलने को कहा. उन्हें भरोसा था कि गुरु गोलवलकर इस असम्भव से काम को कर सकते हैं, राजा हरि सिंह उनका काफी सम्मान करते हैं, जबकि पंडित नेहरू को पसंद नहीं करते हैं. ‘श्री गुरुजी समग्र दर्शन’ (सुरुचि प्रकाशन) के वोल्यूम 4 से जानकारी मिलती है कि 17 अक्तूबर 1947 को गुरु गोलवलकर अकेले श्रीनगर नहीं गए, बल्कि उनके साथ कुछ-कुछ प्रचारक/अधिकारी माधवराव मुले, आभाजी थाटे, वसंत राव ओक और बैरिस्टर नरेंद्रजीत सिंह भी थे. 18 की सुबह राजा हरि सिंह से उनकी मुलाकात हुई.
इन सभी नामों में आपको एक नाम मिलेगा वसंत राव ओक का, और यही नाम आपको गोवा की आजादी के आंदोलन में गोली खाने वाले आंदोलनकारियों की सूची में भी मिलता है और 1966 में दिल्ली में हुए संसद घेराव वाले गोरक्षा आंदोलन में भी. जब बाबरी मस्जिद के ढांचे को टूटने के बाद माहौल खराब हुआ तो दिल्ली के प्रतिष्ठित लोगों के बीच संघ की भूमिका रखने वाले भी यही थे.
ऐसे ही नहीं उन्हें ‘दिल्लीश्वर’ कहा जाता है. चूंकि संघ की शुरूआत नागपुर से हुई तो ज्यादातर शुरूआती संघ के प्रचारक नागपुर या विदर्भ क्षेत्र के ही थे. 13 मई 1914 को उनका जन्म वर्धा (महाराष्ट्र) के नाचणगांव में हुआ था. उनके भाई मनोहर राव तक नागपुर में रहते थे, ऐसे में अपनी आगे की पढ़ाई के लिए वे भी भाई के पास नागपुर आ गए. उन दिनों बाबा साहब आप्टे गरीब विद्यार्थियों को कौशल प्रशिक्षण के लिए टाइपिंग केन्द्र चलाते थे. जब वसंत राव यहां आने लगे तो संघ के लोगों से भी परिचय बढ़ने लगा. धीरे धीरे ड़ॉ हेडगेवार से भी मिलने लगे तो उनके प्रशंसक बन गए.
उन दिनों डॉ हेडगेवार विद्यार्थियों को दूसरे प्रदेशों के बड़े शहरों जैसे काशी, कलकत्ता, प्रयाग, लखनऊ आदि में पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे. इसमें उनके रुकने, एडमीशन, शुल्क आदि में भी जितना सम्भव हो सहायता करते थे. लेकिन पढ़ाई के साथ साथ उनको वहां संघ के कार्य के विस्तार के लिए काम करना होता था. सभी वही स्वयंसेवक थे, जो संघ के लिए अपना जीवन देना चाहते थे. ऐसे में उन सभी को भी नहीं पता था कि एक दिन जब इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें पहली शाखा लगाने वाले के तौर पर उनका नाम भी दर्ज हो जाएगा.
ऐसे ही विद्यार्थियों में भाऊराव देवरस भी थे, जो पहले लखनऊ फिर काशी पढ़ने भेजे गए थे. ऐसे में जिस क्षेत्र या शहर में पहले कभी गए ना हों, जहां के लोग परिचित ना हों, कभी कभी तो भाषा भी अलग होती थी, वहां जाकर बिना पैसे (या बहुत कम पैसे) के एक नया संगठन खड़ा करना, अपनी पढ़ाई करना और फिर अपने खर्च भी निकालना, आसान काम तो था नहीं. और यही बात डॉ हेडगेवार कहते थे और वही आज संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं, कि संघ कुछ देता नहीं है बल्कि जो कुछ आपके पास है वो भी ले लेता है.
डॉ. हेडगेवार का आशीर्वाद लेकर वसंत राव 1936 में कक्षा 12 उत्तीर्ण कर शाखा खोलने के लिए दिल्ली आ गए. उनके रहने की व्यवस्था ‘हिन्दू महासभा भवन’ में की गई थी. संघ जब दिल्ली में था ही नहीं, तो कार्यालय कहां से होता. शायद ही किसी और प्रचारक को उस वक्त हिंदू महासभा का कार्यालय और किसी शहर में मिला होगा, ना जाने कितने प्रचारकों ने समुद्र तट, रेलवे स्टेशन जैसी जगहों पर अपनी शुरूआती रातें काटी हैं. यहां रहकर वसंतराव ने एम.ए. तक की पढ़ाई की और दिल्ली प्रांत में शाखाओं का प्रचार किया. आज का दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, अलवर और पश्चिमी उत्तर प्रदेश उस समय दिल्ली प्रांत में ही था. वसंतराव के परिश्रम से क्षेत्र में शाखाओं का अच्छा तंत्र खड़ा हो गया.
दिल्ली आते ही डॉ हेडगेवार हो गए नाराज
लेकिन 1936 में जब वसंत राव ओक नागपुर से दिल्ली भेजे गए थे तो उनके आने का उद्देश्य और समाचार किसी अखबार में छप गया. डॉ. हेडगेवार जी ने तुरन्त 11 दिसंबर, 1936 को वसंत राव ओक को एक पत्र लिखा. “'आपके दिल्ली पहुंचने का और आप वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य करने वाले हो, ऐसा समाचार किसी की भी गलती से क्यों न हो, वार्तापत्र में प्रकाशित हुई यह बात संगठन की दृष्टि से ठीक नहीं हुई”. …अपने कार्यारम्भ का प्रचार न करते हुए लोगों के सामने दृश्यरूप में कार्य आता तो स्वयमेव ही उसका प्रचार होता और यह संगठन को हितकारक होता. यह बात वहां के लोगों को समझाना, फिर ऐसा न हो इसकी चिंता कीजिए'’.
इस बात से उनको शुरूआत में ही सबक मिल गया था, कि संघ का कार्य बिना प्रचार के करना होता है. बाद में ऐसा हुआ भी कि कई बार वो नहीं भी चाहते थे, तब भी उनके बारे में कुछ ना कुछ छप रहा होता था. लेकिन तब तक वो संघ के रंग में पूरी तरह रंग चुके थे, अब बस लक्ष्य याद रहता था, दुनिया या मीडिया में क्या हो रहा है, उसकी तरफ उनका ध्यान नहीं जाता था. धीरे धीरे उन्होंने अपने काम के जरिए संघ में सबको अपना प्रशंसक बना लिया था.
‘मिशन कश्मीर’ के बाद ओक का ‘मिशन गांधी’
तभी तो जब अक्तूबर 1947 में सरदार पटेल के कहने पर राजा हरि सिंह से मिलने गुरु गोलवलकर श्रीनगर गए तो वसंत राव ओक को भी अपने साथ लेकर गए थे. लेकिन उससे ठीक एक महीने पहले गांधीजी के साथ उनकी मुलाकात भी वसंत राव ओक के प्रयासों से हुई थी और बाद में गांधीजी खुद भंगी कोलोनी (वाल्मीकि बस्ती) में संघ कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करने आए थे. दरअसल हिंदू महासभा का मुख्यालय मंदिर मार्ग पर था और वहां से थोड़ी दूरी पर ही बिरला मंदिर था.
जल्द ही वे पास के मैदान में रोजाना खेलने वाले 20-22 साल के युवकों के साथ घुलमिल गए. दिल्ली में आरएसएस की पहली शाखा वाल्मीकि बस्ती के पास शुरू की गई थी, जो मंदिर मार्ग और वर्तमान पंचकुइयां रोड के चौराहे पर स्थित है. 1940 और 1945 के बीच किसी समय आरएसएस का शहर कार्यालय भी कार्य करने लगा. उसी मैदान में सुबह आरएसएस की शाखा लगती थी, आरएसएस स्वयंसेवक दिन भर वहां खेलों का अभ्यास करते थे, और गांधीजी जब वहां होते थे तो शाम की प्रार्थना सभाएं करते थे. महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में संघ के बहुत से स्वयंसेवकों ने भाग लिया था. इनमें से कई स्वयंसेवकों को गिरफ्तार भी किया गया. उसके बाद गांधीजी भी गिरफ्तारी के चार साल बाद छूटे और तभी केबिनेट मिशन वार्ताओं के लिए दिल्ली आए.
वसंतराव के संपर्क का दायरा बहुत बड़ा था. 1942 के आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका रही. गांधी जी, सरदार पटेल, लालबहादुर शास्त्री, पुरुषोत्तमदास टंडन से लेकर हिन्दू महासभा, सनातन धर्म और आर्य समाज के बड़े नेताओं से उनके मधुर संबंध थे. कांग्रेस वालों को भी उन पर इतना विश्वास था कि मंदिर मार्ग पर स्थित वाल्मीकि मंदिर में होने वाली गांधी जी की प्रार्थना सभा की सुरक्षा स्वयंसेवकों को ही दी गयी थी. 10 सितम्बर, 1947 को कांग्रेस के सब बड़े नेताओं की हत्या कर लालकिले पर पाकिस्तानी झंडा फहराने का षड्यन्त्र मुस्लिम लीग ने किया था. पर दिल्ली के स्वयंसेवकों ने इसकी सूचना शासन तक पहुंचा दी, जिससे यह षड्यन्त्र विफल हो गया.
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गांधीजी 9 सितंबर, 1947 को कलकत्ता से दिल्ली पहुंचे. 12 सितंबर को उन्होंने जामा मस्जिद का दौरा किया. दोपहर को मुस्लिम लीग के एक प्रमुख नेता उनसे मिलने आये. उसी दिन गुरुजी एम एस गोलवलकर ने उनसे मुलाकात की. मंगलवार, 16 सितंबर 1947, सुबह-सुबह गांधीजी की जमीनी स्तर के संघ कार्यकर्ताओं से मिलने की इच्छा संघ पदाधिकारियों को बताई गई. विजयजी आरएसएस के विभाग प्रचारक थे, वसंत राव ओक प्रांत प्रचारक थे और दामलेजी सह-विभाग-प्रचारक थे.
वाल्मीकि बस्ती स्थित संघ स्थान में लगभग 1000 (हिंदुस्तान अखबार ने ने 17 सितंबर, 1947 के अंक में 500 की संख्या बताई थी) आरएसएस के स्वयंसेवक एकत्रित हुए. गांधीजी ने वर्षों पहले वर्धा में आरएसएस शिविर में अपनी यात्रा का जिक्र करते हुए अपने भाषण की शुरुआत की. कहा, “मैंने वर्षों पहले वर्धा स्थित आरएसएस शिविर का दौरा किया था। उस समय संस्थापक श्री हेडगेवार जीवित थे। स्वर्गीय श्री जमनालाल बजाज जी मुझे शिविर में ले गए थे और मैं उनके कठोर अनुशासन, छुआछूत के पूर्ण अभाव और सादगी से प्रभावित हुआ. तब से संघ का विस्तार हुआ है. मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि कोई भी संगठन जो सेवा और आत्म-बलिदान के आदर्श से प्रेरित हो, वह निश्चित रूप से मजबूत होगा.”गांधीजी का पूरा भाषण कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी के 89वें अंक के पृष्ठ 193 से 195 पर दर्ज है.
फिर तो गुरूजी को गांधीजी की हत्या की खबर ही तीन महीने बाद मिली, उन्होंने फौरन एक तार नेहरू, पटेल के साथ साथ गांधीजी के बेटे देवदास गांधी को भी भेजा था. लेकिन इस मुलाकात में गुरु गोलवलकर की समझ में ये आ चुका था कि वसंत राव ओक ने देश की राजधानी में और आसपास के क्षेत्रों में संघ का कार्य विस्तार अच्छे से किया है. ये अलग बात है कि वसंत राव की सांगठनिक क्षमता का अंदाजा उन्हें पहले से ही हो गया था. तभी तो एक साल पहले ही उन्हें आसाम व उत्तर पूर्व के अन्य राज्यो में संघ की नींव रखने के लिए चुना था. अक्टूबर 1946 में, ओक ने दादाराव परमार्थ और कृष्ण परांजपे के साथ मिलकर गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ और शिलांग में आरएसएस की पहली शाखाएं (दैनिक बैठकें) स्थापित कीं, जो असम प्रांत का हिस्सा थीं.
गृहस्थ आश्रम में क्यों गए वापस?
उन दिनों वसंतराव का दिल्ली में इतना प्रभाव था कि उनके मित्र उन्हें ‘दिल्लीश्वर’ कहने लगे. संघ पर लगे पहले प्रतिबंध की समाप्ति के बाद उनके कुछ विषयों पर संघ के वरिष्ठ लोगों से मतभेद हो गए. अतः गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर वे दिल्ली में ही व्यापार करने लगे, नागपुर नहीं गए, दिल्ली से इतना नाता जो जुड़ गया था. पर संघ से उनका प्रेम सदा बना रहा और उन्हें जो भी कार्य दिया गया, उसे उन्होंने पूर्ण मनोयोग से किया.
असम और चुनावी राजनीति में प्रवेश की कहानी आलोक मेहता ने लिखी
वसंत राव ओक ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बाद में दिल्ली व पूर्वोत्तर में जनसंघ के प्रसार में भी सहायता की. 1957 में उन्होंने दिल्ली में चांदनी चौक से लोकसभा का चुनाव जनसंघ के टिकट पर लड़ा; पर कुछ मतों के अंतर से वे हार गये. वरिष्ठ पत्रकार आलोक मेहता ने 2023 में संडे गार्जियन के एक लेख में ओक के बारे में लिखा था कि, “मेघालय, त्रिपुरा और नागालैंड में चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद मुझे वसंतराव ओक की याद आई, जिनसे मेरी मुलाकात 1972 में ‘हिंदुस्तान समाचार’ नामक समाचार एजेंसी में मेरे कार्यालय में हुई थी. मैं उस समय एजेंसी का युवा संवाददाता था और मुख्य संपादक बालेश्वर अग्रवाल ने मेरा उनसे परिचय कराया था. ओक प्रबंधन मंडल में भी थे और एक अनुभवी सामाजिक-राजनीतिक नेता थे. उन्होंने मुझे 1960 के दशक में उत्तर पूर्व में अपने कठिन परिश्रम के अनुभव और बाद में 1957 में दिल्ली के चांदनी चौक से कांग्रेस नेता राधा रमन के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ने के अपने अनुभव के बारे में बताया.“
आलोक मेहता ने आगे लिखा, “अपनी हार से वे व्याकुल नहीं थे, क्योंकि उनका मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनका सहयोगी भारतीय जनसंघ था. वसंतराव ओक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शुरुआती प्रचारकों और नेताओं में से एक थे. अक्टूबर 1946 में, ओक ने दादाराव परमार्थ और कृष्ण परांजपे के साथ मिलकर असम प्रांत के गुवाहाटी, डिब्रूगढ़ और शिलांग में आरएसएस की पहली शाखाएं और दैनिक बैठकें स्थापित कीं. ओक ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बालेश्वर जी ने मुझे अपनी निष्ठा के बारे में बताया और यह भी बताया कि कैसे संघ ने पूर्वोत्तर में भारतीय संस्कृति के लिए काम किया और धर्म के नाम पर पश्चिमी देशों के भारत-विरोधी तत्वों से इसे बचाया.” 1966 के गोरक्षा आंदोलन में भी ओक ने काफी सक्रियता से भाग लिया. बाबरी ढांचे के विध्वंस के बाद कांग्रेस और साम्यवादियों ने संघ के विरुद्ध बहुत बवाल मचाया. ऐसे में वसंत राव ने दिल्ली के प्रतिष्ठित लोगों से मिलकर उनके सामने पूरा विषय ठीक से रखा. इससे वातावरण बदल गया.
गोवा आंदोलन में खाई गोली, सावरकर ने दी थी ‘वसंतराय’ की उपाधि
इससे पहले गोवा आंदोलन में एक जत्थे का नेतृत्व करते हुए उनके पैर में एक गोली लगी, जो जीवन भर वहीं फंसी रही. 1857 के स्वाधीनता संग्राम की शताब्दी पर दिल्ली के विशाल कार्यक्रम में वीर सावरकर का प्रेरक उद्बोधन हुआ. उन्होंने वसंतराव के संगठन कौशल की प्रशंसा कर उन्हें ‘वसंतराय’ की उपाधि दी. 1946 में उन्होंने ‘भारत प्रकाशन’ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. विभाजन के बाद पंजाब से आये विस्थापितों की सहायतार्थ ‘हिन्दू सहायता समिति’ का गठन किया था. वसंतराव के भाषण काफी प्रभावी होते थे. मराठीभाषी होते हुये भी उन्हें हिन्दी से बहुत प्रेम था. 1955 में ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ उन्हीं की प्रेरणा से प्रारम्भ हुआ. इसके लिए शास्त्री जी और टंडन जी ने भी सहयोग दिया. इसकी ओर से प्रतिवर्ष लालकिले पर एक राष्ट्रीय कवि सम्मेलन कराया जाता था, जो अब शासकीय कार्यक्रम बन गया है. 1969 के ऑर्गनाइजर के 26 जनवरी के अंक में वसंत राव ओक ने गांधीजी की वाल्मीकि बस्ती वाली शाखा में आगमन को लेकर एक विशेष लेख भी लिखा था. भारत छोड़ों आंदोलन में भाग लेने वाले इस संघ प्रचारक ने गोलोक जाने के लिए भी सन 2000 में 9 अगस्त का दिन ही चुना था.
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विष्णु शर्मा