लेह के पास छोटे से गांव आंगलिंग में महज 400 घर हैं. यहां पीढ़ियों से भारतीय सेना की सेवा करने वाले तिब्बती रहते हैं. ऐसे ही एक सेना के वेटरन येशी तेनजिन हैं. उनके बेटे तेनजिन लॉन्डेन ने हाल में पैंगोंग सो झील के दक्षिणी किनारे पर स्थित ब्लैक टॉप पर हुए ऑपरेशन में हिस्सा लिया. ये ऑपरेशन चीनी सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की किसी संभावित हिमाकत को रोकने के लिए भारतीय सेना की ओर से अग्रिम तौर पर किया गया.
तेनज़िन लॉन्डेन ने खुलासा किया कि कैसे भारतीय सेना को विस्फोट में एक सूबेदार की जान जाने के बाद ऑपरेशन को रद्द करना पड़ा. यह पहला ब्यौरा है जो 29 से 31 अगस्त के बीच हाइट्स पर कब्जे की भारतीय सेना की कोशिश को लेकर सामने आया है. येशी ने बताया कि कि उनका बेटा लॉन्डेन जून की शुरुआत से चुशुल में तैनात है.
येशी ने कहा, "यह घटना 30 अगस्त की रात को हुई थी जब भारतीय सेना ने ब्लैक टॉप पर कब्जा करने के लिए ऑपरेशन शुरू किया. विस्फोट के बाद, मेरा बेटा घायल हो गया और एक सूबेदार की जान चली गई, फिर ऑपरेशन रद्द करना पड़ा. अगले दिन भारतीय सेना फिर गई और ब्लैक टॉप के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया. मुझे लगता है कि हम वहां आधे रास्ते पर हैं और पोजीशन्स को होल्ड कर रहे हैं."
येशी ने कहा, “भारतीय सेना की ओर से की गई कार्रवाई आसान नहीं थी क्योंकि उन्हें चीनियों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा था, लेकिन सैनिक उनकी पोजीशन्स तक पहुंचे.
येशी भारतीय सेना में 22 वर्ष तक सर्विस के बाद 2007 में रिटायर हुए और अपनी पत्नी के साथ रहते हैं. उनकी बेटी मंगलौर में एक पैरामेडिक की पढ़ाई कर रही है. येशी का कहना है कि उनकी भी पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर चुशुल समेत LAC में तैनाती रही लेकिन उन्होंने इस क्षेत्र में कभी कोई कार्रवाई नहीं देखी.
येशी कहते हैं, “मुझे गर्व है कि मेरा बेटा (लॉन्डेन) बैटलफील्ड में घायल हुआ. मुझे खुशी है कि वो ठीक है और गंभीर रूप से घायल या उसके किसी अंग को नुकसान नहीं हुआ.”
भारत में रहने वाले तिब्बती एक सीक्रेट स्पेशल फ्रंटियर फोर्स (SSF) का हिस्सा रहे हैं, जिसे 1962 के युद्ध के बाद बनाया गया था. उसके बाद से यह यूनिट 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध, 1999 में करगिल संघर्ष और कई अन्य अहम मिशन्स के दौरान ऑपरेशन्स का हिस्सा रही है.
29 अगस्त के बाद से, भारतीय सेना ने पैंगोंग झील के दक्षिणी तट पर कई ऊंचाइयों पर कब्जा करने में कामयाबी हासिल की है. रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इन ऊंचाइयों से, भारतीय सेना चीनी सैन्य ठिकानों पर नजर रख सकती है.
आंगलिंग गांव में येशी जैसे कई आर्मी वेटरन्स के घर हैं. लद्दाख में तिब्बतियों की आबादी 7,500 के आसपास है. इनमें से करीब 1,500 या तो आर्मी वेटरन्स हैं या अभी भी सेना में सर्विस कर रहे हैं.
शेरप जैंगपो अभी 43 साल के हैं. वे 19 साल सेना की सेवा करने के बाद अब रिटायर्ड लाइफ बिता रहे हैं. शेरप के मुताबिक उन्होंने 1984 में सियाचिन ग्लेशियर पर नियंत्रण के लिए हुए ऑपरेशन मेघदूत में हिस्सा लिया था.
शेरप ने कहा, "मैंने करगिल, बटालिक, ऑपरेशन मेघदूत में हिस्सा लिया है" उनके मुताबिक तिब्बत और भारत के बीच मजबूत और गहरा बंधन है. तिब्बती चाहते हैं कि हमें चीन के खिलाफ लड़ना और जीतना चाहिए. यह हमारा नारा रहा है."
1959 में तिब्बत से भारत आए ग्यांतसो अब 85 वर्ष के हैं. उन्होंने भी शेरप जैंगपो जैसी ही भावनाएं व्यक्त कीं. चीन के साथ युद्ध के तत्काल बाद ग्यांतसो 1963 में भारतीय सेना में शामिल हो गए. उन्होंने अरुणाचल प्रदेश में 60 और 70 के दशक में चीन के साथ हुए संघर्षों में अपने हिस्सा लेने को याद किया.
ग्यांतसो ने कहा, "एक्शन होना चाहिए. चीन हमेशा हमें डराने की कोशिश करता है लेकिन भारत अब शक्तिशाली है. भारत को पीछे हटने की जरूरत नहीं है.” ग्यांतसो को गांव में एक सफेद टोपी में घूमते देखा गया, जिस पर लिखा था- 'फ्री तिब्बत'. 85 साल की उम्र में भी, उनका हौसला और जुनून बहुत ऊंचा है.
ग्यांतसो 1979 में रिटायर्ड हुए, तब से वह अपने परिवार के साथ इस गांव में रह रहे हैं. अन्य की तरह उनका दिल भी भारतीय सेना के लिए धड़कता है. तिब्बती, भारतीय सेना का हिस्सा होने के नाते संवेदनशील विषय हो सकते हैं लेकिन इस समुदाय के लिए यह बहुत गर्व की बात है. वे चाहते हैं कि ये परंपरा भविष्य की पीढ़ियों के साथ भी आगे बढ़ती रहे.
अभिषेक भल्ला