कोरोना ने छीन ली थी गोल्फ कोर्स की रौनक, गोल्फर बोले- खत्म हुई घुटन

क्षितिज बोले- तीन महीने तो बिल्कुल गोल्फ कोर्स आना ही नहीं हुआ. गोल्फ के बगैर जिंदगी घुटते हुई गुजरी. घर में ही सिर्फ कंप्यूटर पर तकनीक की प्रैक्टिस से संतुष्टि कितनी होती ये समझा जा सकता है.

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गोल्फर क्षितिज गोल्फर क्षितिज

संजय शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 22 अगस्त 2020,
  • अपडेटेड 2:24 PM IST
  • कोरोना काल में बंद रहा गोल्फ कोर्स
  • लौटने लगी गोल्फ कोर्स की रौनक
  • प्रैक्टिस के लिए आने लगे क्लब मेंबर्स

पांच महीनों की उदासी और खामोशी के बाद देश के गोल्फ कोर्स अब गुलज़ार होने लगे हैं. कोरोना के खौफ का एहसास अब गोल्फ कोर्स में दाखिल होने के साथ ही हो जाता है जब गोल्फर और गोल्फ किट ट्रॉली धकेलते कैडी मास्क लगाए दिखते हैं. वरना तो बॉल, क्लब, गोल्फ कार्ट और शॉट लगाने की आवाज सब रह-रहकर खामोशी तोड़ते हैं. युवा गोल्फर क्षितिज नवीद कौल ने बताया कि कुछ साल पहले ही शौकिया से प्रोफेशनल गोल्फर बना और ये कमबख्त कोरोना का क्लेश शुरू हो गया. 

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सब कुछ घर की चारदीवारी में कैद! 

क्षितिज बोले- तीन महीने तो बिल्कुल गोल्फ कोर्स आना ही नहीं हुआ. गोल्फ के बगैर जिंदगी घुटते हुई गुजरी. घर में ही सिर्फ कंप्यूटर पर तकनीक की प्रैक्टिस से संतुष्टि कितनी होती ये समझा जा सकता है. ये कुछ ऐसा ही था जैसे भूखा आदमी पसंदीदा खाने की तस्वीर देखे. हमने महीनों यही किया. अब जाकर ये समय नसीब हुआ. गोल्फ कोर्स की फिजां ही अलग सुकून देती है. यहां से बहने वाली हवा जब बदन को छू कर निकलती है तो गजब की फीलिंग आती है.

फिर धीरे-धीरे घर के लॉन में और छ्त पर खुद को फिट रखने की जद्दोजहद चलती रही. फिर जिंदगी आखिर अपनी मंजिल यानी गोल्फ कोर्स तक आ ही गई. लेकिन अभी भी चुनौतियां वही हैं. अभी भी सिर्फ प्रैक्टिस के लिए बस गोल्फ क्लब मेंबर्स ही आते हैं. प्रोफेशनल टूर्नामेंट तो आयोजित ही नहीं हो रहे. अब हमारी अगली कोशिश और मंजिल टूर्नामेंट करवाना, उसमें हिस्सा लेना और खिताब जीतने की होगी. 

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खामोशी टूट रही है, जिंदगी अंगड़ाई लेने लगी

क्षितिज के पिता नौसेना के पूर्व कैप्टन संजय कौल भी गोल्फ खेलने के शौकीन हैं. अपने बेटे को गोल्फ की बारीकियां समझाते हुए हमसे बोले कि वैसे भी गोल्फ एकांत का खेल है. फिर भी कोरोना की क्रूरता का शिकार हुआ. गोल्फ तो खुद से प्रतियोगिता करने और अपनी ही चुनौतियों को खुद ही फतह करने का खेल है. ये खेल इंजरी प्रॉन तो है लेकिन इसमें संक्रमण फैलने का खतरा नहीं है. लेकिन कोरोना प्रोटोकॉल का पालन तो करना ही था. इसलिए कोई भी खिलाड़ी इधर नहीं आ पाया. खैर अब वो काल पीछे छूट चुका है. खामोशी टूट रही है, जिंदगी अंगड़ाई लेने लगी है. 

देश के अनेक गोल्फ कोर्सेज के ऑपरेशन मैनेजर प्रभाष ठाकुर कहते हैं कि कई महीने तो गोल्फ कोर्सेज की कोमल घास भी मनमानी पर उतर आई. नियमित कटिंग भी नहीं हुई. रोजाना तराशी जाने वाली घास भी दो-दो, तीन-तीन दिन में सिर उठाने लगी. लेकिन आखिर कब तक चलता ऐसा? अनुशासन के इस व्हाइट कॉलर गेम की मैदानी मनमानी भी आखिरकार काबू में आई. अब सब कुछ सुचारु होने लगा है. जल्दी ही पहले की तरह खेल जम जाएगा. 

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