केंद्र सरकार जल्द ही 'रामसेतु' को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने जा रही है. इसकी जानकारी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को दी. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की प्रक्रिया जारी है.
केंद्र सरकार ने ये जवाब पूर्व राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी की उस याचिका पर दिया, जिसमें उन्होंने रामसेतु को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने की मांग की है. उनकी याचिका पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच सुनवाई कर रही है.
किसी जगह को अगर राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया जाता है, तो उसकी जिम्मेदारी केंद्र सरकार के पास आ जाती है और उसके आसपास कई तरह के प्रतिबंध भी लग जाते हैं. राष्ट्रीय स्मारक को संरक्षित किया जाता है.
राष्ट्रीय स्मारक कैसे घोषित किया जाता है?
किसी ऐतिहासिक जगह, इमारत या विरासत को राष्ट्रीय स्मारक को घोषित करने की सिफारिश राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण करती है.
राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण की सिफारिश अगर केंद्र सरकार मान लेती है तो उस जगह, इमारत या विरासत को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया जाता है. इसके लिए केंद्र सरकार गजट नोटिफिकेशन जारी करती है.
राष्ट्रीय स्मारक घोषित होने पर उसके आसपास किसी भी तरह के निर्माण पर रोक लग जाती है. इतना ही नहीं, स्मारक के मूल स्वरूप से भी छेड़छाड़ नहीं की जा सकती. अगर स्मारक को रेनोवेट भी किया जाता है तो भी उसका मूल स्वरूप बरकरार ही रखा जाता है.
केंद्र सरकार ने 90 से ज्यादा ऐतिहासिक धरोहरों को राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर रखा है. इनमें लाल किला और ताजमहल भी शामिल है.
इससे क्या-क्या बदल जाता है?
राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (NMA) के मुताबिक, जब किसी जगह को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया जाता है तो उसके आसपास के 100 मीटर के दायरे को निषिद्ध क्षेत्र यानी प्रोहिबिटेड एरिया होता है.
वहीं, 200 मीटर का दायरा प्रोटेक्टेड एरिया में आता है. 200 मीटर का ये दायरा 100 मीटर की सीमा के पार का होता है.
राष्ट्रीय स्मारक के मूल स्वरूप को संरक्षित किया जाता है. इसके आसपास न तो सरकारी निर्माण हो सकता है और न ही कोई निजी कंपनी या संस्थान निर्माण कर सकती है. हालांकि, मौजूदा इमारतों को मरम्मत किया जा सकता है.
अब बात रामसेतु का मामला सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा?
साल 2005 में जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी तो 'सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट' को शुरू किया गया. इसके तहत भारत और श्रीलंका के बीच दो चैनल बनाए जाने थे. इनमें से एक चैनल रामसेतु के रास्ते पर बनना था.
ये चैनल मन्नार की खाड़ी (भारत) और पाक बे (श्रीलंका) को आपस में जोड़ता. ये चैनल 12 मीटर गहरा और 300 मीटर चौड़ा बनना था. लेकिन इसके लिए रामसेतु की चट्टानों को तोड़ा जाना था.
इस प्रोजेक्ट का समर्थन करने वाले तर्क देते हैं कि रामसेतु की वजह से जहाजों को श्रीलंका के पीछे से होकर आना पड़ता है. इस वजह से उन्हें 402 समुद्री मील यानी 780 किलोमीटर की अतिरिक्त यात्रा करनी पड़ती है और इस पर 36 घंटे का समय लगता है.
ऐसा इसलिए क्योंकि रामसेतु के कारण वहां समुद्र की गहराई 10 मीटर से भी कम है और इस वजह से उसके ऊपर से जहाज गुजर नहीं सकते. लेकिन अगर सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पूरा हो जाता तो जहाज आ-जा सकते थे और इससे समय और ईंधन की बचत होती.
हालांकि, इस चैनल के कारण रामसेतु की चट्टानों को तोड़ा जाना था. इसलिए इसका जमकर विरोध हुआ. विरोध करने वालों का कहना था कि इस प्रोजेक्ट से रामसेतु को नुकसान पहुंचेगा.
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि रामसेतु के वैज्ञानिक सबूत नहीं है. कांग्रेस सरकार ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के हवाले से हलफनामा दायर कर बताया कि वो सेतु प्राकृतिक है और उसे मानव ने नहीं बनाया है.
2007 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रोजेक्ट पर रोक लगा दी. ये रोक अब तक लगी है. मार्च 2018 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि सामाजिक-आर्थिक नुकसान देखते हुए प्रस्तावित प्रोजेक्ट को लागू नहीं करना चाहती.
साल 2021 में मोदी सरकार ने फिर से रामसेतु पर रिसर्च करने का आदेश दिया. इसका मकसद ये पता करना है कि रामसेतु मानव निर्मित है या नहीं और क्या इसके बनने का वक्त रामायण काल से मिलता है.
रामसेतु क्या है?
रामायण में लिखा है कि भगवान राम ने वानर सेना की मदद से लंका की चढ़ाई करने के लिए ये सेतु बनाया था.
इस सेतु पर चलकर भगवान राम और उनकी वानर सेना ने लंका की चढ़ाई की थी और रावण का वध कर भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता को छुड़ाया था.
माना जाता है कि रामसेतु रामेश्वरम (भारत) से श्रीलंका के मन्नार द्वीप तक बना है. ये पूरा सेतु लगभग 48 किलोमीटर लंबा है.
कई रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि रामसेतु चूना पत्थर से बना है. यहां समुद्र काफी उथला-पुथला है, इसलिए यहां बड़ी नावें और जहाजें नहीं गुजर सकतीं.
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