मुंबई: प्रवासी मजदूर का दर्द, मैं यहां भूखा मर रहा हूं, गांव में मेरा परिवार...

बिहार से नाता रखने वाले और मुंबई में बढ़ई का काम करने वाले एक शख्स ने अपना दर्द इस तरह बयान किया- मैं घर पर पैसे भेजता हूं तो मेरे तीन बच्चों, पत्नी और मां का गुजारा चलता है. मैं पैसे न भेजूं तो उन्हें खाना भी नसीब नहीं होता.

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मुंबई में परेशान प्रवासी मजदूर मुंबई में परेशान प्रवासी मजदूर

तनुश्री पांडे

  • मुंबई,
  • 15 अप्रैल 2020,
  • अपडेटेड 6:11 PM IST

  • कोरोना के चलते देश में 3 मई तक बढ़ा लॉकडाउन
  • लॉकडाउन की वजह से प्रवासी मजदूर हो रहे परेशान

उद्योग कारखाने बंद... पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद... मुंबई जैसे महानगर में दूर-दराज के राज्यों से आए मजदूर करीब तीन हफ्ते से इंतजार कर रहे थे कि 14 अप्रैल को लॉकडाउन खत्म होगा तो शायद उनकी दुश्वारियों का अंत होगा. उन्हें अपने घर जाने के लिए कोई साधन मिल जाएगा. लेकिन कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए मंगलवार को देशभर में लॉकडाउन 3 मई तक बढ़ा दिया गया है.

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मुंबई के शास्त्री नगर स्लम में सैकड़ों प्रवासी रहते हैं, जिनका गुजारा दिहाड़ी मजदूरी से होता आया है. ये इलाका मुंबई के रेड जोन्स में से एक है. मंगलवार को बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों ने बांद्रा वेस्ट स्टेशन पर शाम 4 बजे से इकट्ठा होना शुरू कर दिया.

स्थानीय लोगों के मुताबिक एक ही वक्त में वहां करीब 3,000 प्रवासी इकट्ठा हो गए. ये सब उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए ट्रेन चलाने की मांग कर रहे थे, जिससे कि वे अपने मूल स्थानों को लौट सकें.

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रिपोर्टर के मौके पर पहुंचने पर करीब 300 लोग वहां मौजूद थे. बाकी को पुलिस ने लाठी चार्ज कर वहां से खदेड़ दिया था. नाम नहीं बताने की शर्त पर कुछ मजदूरों ने बात करना मंजूर किया. इनमें से एक मजदूर ने कहा, “हम यहां बहुत ही संकरी जगह पर कई लोग एक साथ रहे हैं. मार्च से हमने एक पैसे की कमाई नहीं की. हमारे पास खाना नहीं है. जो कुछ भी दानी लोगों या एनजीओ से मिलता है, उसी की वजह से हम जिंदा हैं.”

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एक और मजदूर बोला, “जब पहली बार लॉकडाउन का ऐलान हुआ था तो हमने सुना कि दिल्ली में हमारे कई मजदूर पैदल ही घरों को लौटने के लिए सैकड़ों किलोमीटर चले. हम भी तब अपने घर लौटना चाहते थे लेकिन स्थानीय प्रशासन की ओर से हमें सारी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का वादा देकर रोक लिया गया. लेकिन 25 मार्च से राज्य सरकार हमारे लिए तीन वक्त का खाना भी मुहैया नहीं करा सकी.”

बिहार से नाता रखने वाले और मुंबई में बढ़ई का काम करने वाले एक शख्स ने अपना दर्द इस तरह बयान किया- मैं घर पर पैसे भेजता हूं तो मेरे तीन बच्चों, पत्नी और मां का गुजारा चलता है. मैं पैसे न भेजूं तो उन्हें खाना भी नसीब नहीं होता. अब मैं खाली बैठा हूं, मेरे पास ही खाना नहीं है. घर पर क्या भेजूं? वहां मेरा परिवार भूखा मर रहा है या मैं. यहां मैं 10 वर्ग फीट के कमरे में 12 लोग रहते हैं. सोशल डिस्टेंसिंग के हमारे लिए कोई मायने नहीं है. हम यहीं झुग्गियों में मर जाएंगे. कम से कम हमें एक आखिरी बार अपने परिवारों के पास जाने दिया जाए.

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पश्चिम बंगाल के मूल निवासी एक और दिहाड़ी मजदूर ने कहा, “कोई हमारी परवाह नहीं करता. हम वो लोग हैं जो अमीरों के घरों पर सारा काम करते रहे हैं. और अब हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया गया है. कमरों के मालिक किराया मांग रहे हैं. एक आदमी का खाना हम 5-6 लोग बांट कर खा रहे हैं. हम अपना दर्द बयान करते रहे लेकिन किसी ने नहीं सुनी. आज जब हम सड़कों पर आ गए तो हम पर लाठियां बरसाईं गईं. हमारे पास मरने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.”

ये मजदूर बेहाल हैं, उधर राजनेता आरोपों-प्रत्यारोपों में उलझे हैं. महाराष्ट्र सरकार के कैबिनेट मंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी शिवसेना के नेता आदित्य ठाकरे केंद्र सरकार को इस हालत के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं तो वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्थिति को सही तरह से हैंडल न कर पाने का ठीकरा राज्य सरकार पर फोड़ा है.

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मंगलवार को मुंब्रा में भी प्रवासी मजूदर सड़क पर आ गए. मुंब्रा पुलिस स्टेशन के सीनियर इंस्पेक्टर के थोराट ने बताया, “ ये लोग अपने गांव लौटना चाहते हैं. उनके पास जो भी जमा पैसा था, उससे अभी तक गुजारा करते रहे. वो कमरों के किराए से राहत चाहते हैं क्योंकि उनके मालिक दबाव डाल रहे हैं. इसलिए वो सड़कों पर आ गए. हमने उन्हें लौटने के लिए समझाया. हमने मकान मालिकों से भी कहा है कि वो इनसे दो-तीन महीने तक किराया न लें. ऐसी मुश्किल घड़ी में हम सभी को एक दूसरे की मदद करनी चाहिए.”

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