विदेश में मिले इज्जत तो ना भूलें हिन्दुस्तान का योगदान: मोहन भागवत

आखिर में सरसंघचालक मोहन भागवत ने दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल के प्रति आभार व्यक्त किए कि जानवरों का डॉक्टर होते हुए भी उन्हें इंसानों के अस्पताल में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया और सम्मानित किया.

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दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल के कार्यक्रम में मोहन भागवत दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल के कार्यक्रम में मोहन भागवत

पंकज खेळकर / कौशलेन्द्र बिक्रम सिंह

  • पुणे,
  • 10 नवंबर 2017,
  • अपडेटेड 6:32 AM IST

आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत पुणे के दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल में गुरुवार की शाम एक समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आए थे. अपने भाषण में मोहन भागवत ने देश में स्वास्थ्य सेवा और शिक्षण सेवा बिना व्यापारीकरण किए सामान्य जनता तक पहुंचाना कितना जरुरी और शिक्षित लोगों का कर्तव्य है, इस विषय पर बोले. बिना किसी का नाम लिए भागवत बोले, "कोई भी भारतीय नागरिक परदेश जाता है और अगर वहां के लोग उसे सम्मानित करते हैं तो उसमें हिन्दुस्तान का 50% योगदान हरदम रहता है, और ये किसने भी नहीं भूलना चाहिए. आदमी कितना भी काबिल क्यों ना हो परदेश में सम्मानित होने में  50% योगदान अपने देश का ही होता है."

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उन्होंने आगे कहा, "इस देश में जन्म लिया  हुआ आदमी जो दुनिया के किसी भी कोने में जाकर इज्जत कमाता है, उसे कभी ये सोचना नहीं चाहिए कि मेरे देश का मेरे इस इज्जत कमाने के पीछे कोई योगदान नहीं है. ये आप गांठ बांध लो कि इस देश में जन्म लिया हुआ आदमी दुनिया में कहीं भी इज्जत कमाता है तो कहने का तात्पर्य ये है कि देश की हालत कैसी भी हो, दुनिया के किसी भी कोने में उस आदमी के इज्जत कमाने में  50% योगदान इसी देश का ही होता है. सारी दुनिया में हमें जो सम्मान मिलता है वो सिर्फ हमे हमारे काम से नहीं मिलता है, वो इज्जत हमें हमारे देश के कारण भी मिलता है."

अपनी बात का स्पष्टीकरण देते हुए आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने देश के उस समय के जानेमाने सुप्रसिद्ध साहित्यकार पुरुषोत्तम लक्ष्मण देशपांडे का 1962 का अमरीका दौरे का वाक्या बताया, वाक्या चीन के साथ युद्ध हारे भारत का था. उस समय अमरीका में प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू पर किया हुआ मजाक सहन करना पड़ा. अमरीकन मिमिक्री आर्टिस्ट रोने की नकल करते हुए स्टेज पर आया और नेहरू की नकल करते हुए कहा, "कैनेडी अंकल कैनेडी अंकल उस माओ को बताओ वो बहुत परेशान कर रहा है."

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मोहन भागवत बोले कि देशपांडे अगर चाहते तो जवाब दे सकते थे लेकिन उस समय की देश की हालत देखते हुए उन्होंने चुप रहना बेहतर समझा. अगर उस समय देशपांडे किसी और देश में गए होते तो स्वामी विवेकानंद के देश से आए हुए व्यक्ति को उनके गुण-अवगुण देखे बगैर सम्मान मिलता और मान दिया गया होता.

अभी हाल ही में मेरा एक दोस्त चीन गया था. वहां एक मंदिर था तो वो मेरा दोस्त उस मंदिर में गया. वहां मंदिर में मोमबत्तियां जलाई हुई थीं. वहां एक महिला खड़ी थी, उस महिला को डिस्टर्ब ना करते हुए मेरा दोस्त आगे जाकर खड़ा रहा, नमस्कार किया और लौटकर आने लगा तो उस महिला ने उस भारतीय से पूछा कि क्या आप हिन्दू हो, और मेरे दोस्त ने हां कहा तो- तुरंत उस महिला ने मेरे दोस्त को शीश झुकाकर, नीचे झुककर नमस्कार किया. उस महिला ने और कुछ नहीं पूछा, हिन्दू यानि हिन्दुस्तान से आया हुआ तो तुरंत नमस्कार किया. तो ये अपनी पहचान, अपने देश का नाता, सदैव हमारे साथ होती है और उस नाते का परिणाम होता ही है. तो उस पहचान से प्रामाणिक रहना चाहिए हमें.

भागवत के मुताबिक हिन्दुस्तान का नागरिक शिक्षण और स्वास्थ्य को सबसे ज्यादा महत्त्व देता है

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आज सरकारी अस्पताल में ऑपेरशन की सुविधा होने के बावजूद सामान्य आदमी को सरकारी अस्पताल और वहां के स्वास्थ्य सेवा पर विश्वास नहीं है और शायद इसीलिए सामान्य आदमी उसका घर-द्वार बेचकर एक प्राइवेट हॉस्पिटल में ऑपरेशन की जिद लगाता है. तो देश में स्वास्थ्य सेवा और शिक्षण सबसे सस्ता होना चाहिए जो सामान्य व्यक्ति को भारी नहीं पड़ना चाहिए. लेकिन सामान्य आदमी इस दौड़ में उलझता ही चला जा रहा है और अगर सामान्य आदमी को इस दुविधा से छुटकारा करना है तो कोई और विकल्प खोज निकालना चाहिए. मोहन भागवत बोले कि आज की दौड़ भरी दुनिया में आदमी के इलनेस का सोचने के बजाय, आदमी बीमार पड़े ही ना ऐसा कुछ इंतजाम करना है. आदमी का स्वास्थ्य ही अच्छा हो वो बीमार ही ना पड़े इसलिए उस दिशा में काम करना होगा, खाना विषमुक्त कैसे किया जाय इस पर किसी को खोज छानबीन करना पड़ेगा.

योग्य व्यायाम कैसा होगा इस पर सोच-विचार करना पड़ेगा. अगर जरूरत के मुताबिक व्यायाम होता नहीं है और मानसिक तनाव होगा तब खाना कैसे इस पर सोचना चाहिए. क्या हैं वो छोटी-छोटी चीजें जो करने से रोग से लड़ने के लिए प्रतिकार शक्ति सदैव रहता है ये सोचना चाहिए.

आदमी खुद को बीमारी से दूर रखने के लिए स्वयं पूर्ण हो सकता है कि नहीं. अगर मुझसे पूछोगे तो हां ऐसा हो सकता है. भले ही मैं जानवरों का डॉक्टर हूं लेकिन आदमियों के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी है. मोहन भागवत ने अनुरोध किया कि आने वाले समय में सामान्य आदमी खुद के स्वास्थ्य के बारे में, छोटी-मोटी बीमारियों के बारे में उसके घर के आसपास की सुविधाओं से ही ध्यान दे सके ऐसा प्रबंधन करना होगा, लेकिन वो काम ऐसे हॉस्पिटल का नहीं, लेकिन अगर ऐसे हॉस्पिटल ने मन बना लिया तो दीनानाथ मंगेशकर जैसे बड़े हॉस्पिटल कर सकते हैं.

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सरसंघचालक ने व्यापारीकरण करने वाले अस्पतालों के कान खींचे

मोहन भागवत विशिष्ट वर्ग के लोगों और दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल में ट्रस्टी, और डॉक्टर्स से बातचीत में बोले, "जो भी उन्हें दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर्स द्वारा बताया गया तो उन्हें ये समझ आया कि दीनानाथ अस्पताल गरीबों को सेवा देने में तत्परता दिखा रहा है." मोहन भागवत ने आगे कहा कि भारत देश बहुत बड़ा है. दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल जैसी अच्छी स्वास्थ्य सेवा लोगों तक पहुंचाने के लिए ऐसे अस्पताल देश भर में उपलब्ध कराने होंगे. स्वास्थ्य और शिक्षा के लिए व्यापारिक सोच लेकर अगर काम किया गया तो वो गलत होगा, आज देश में बड़े पैमाने में स्वास्थ्य सेवा की जरूरत है इसलिए लोग डॉक्टर्स बन रहे हैं लेकिन डॉक्टर्स ने व्यापारीकरण के मद्देनजर स्वास्थ्य सेवा नहीं देनी चाहिए. स्वास्थ्य सेवा देना डॉक्टर्स का कर्तव्य है और वो उन्हें करना चाहिए बिना व्यापारीकरण किए.

उन्होंने आगे कहा, "समाज का मैं एक हिस्सा हूं, समाज का आत्मीय हूं, समाज के आत्मा का एक अंश हूं, समाज के प्रति मुझे आत्मीयता है. इसीलिए डॉक्टर को समाज के लिए स्वास्थ्य सेवा बहाल करनी है. ये विचार से समाज के हर एक व्यक्ति को स्वास्थ्य सेवा देनी होगी."

आखिर में सरसंघचालक मोहन भागवत ने दीनानाथ मंगेशकर अस्पताल के प्रति आभार व्यक्त किए कि जानवरों का डॉक्टर होते हुए भी उन्हें इंसानों के अस्पताल में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया और सम्मानित किया. 

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