'सास-ससुर की मानसिक शांति के लिए बहू को बेघर नहीं किया जा सकता...', बॉम्बे हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

अदालत ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिक मन की शांति के साथ जीने के हकदार हैं, लेकिन वे अपने अधिकारों का इस्तेमाल इस तरह से नहीं कर सकते हैं जिससे घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत किसी महिला के अधिकार खत्म हो जाएं. 

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 बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि सास-ससुर की मानसिक शांति के लिए बहू को बेघर नहीं किया जा सकता. (प्रतीकात्मक तस्वीर) बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अहम टिप्पणी में कहा कि सास-ससुर की मानसिक शांति के लिए बहू को बेघर नहीं किया जा सकता. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

विद्या

  • मुंबई,
  • 21 मार्च 2024,
  • अपडेटेड 6:52 AM IST

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक टिप्पणी में कहा कि किसी महिला को केवल उसके बुजुर्ग ससुराल वालों की मानसिक शांति बनाए रखने के लिए उसके वैवाहिक घर से बेदखल या बेघर नहीं किया जा सकता है. न्यायमूर्ति संदीप मार्ने की पीठ एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम के तहत गठित मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (भरण-पोषण न्यायाधिकरण) द्वारा पारित एक आदेश को चुनौती दी गई थी.

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महिला ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि पति द्वारा अपने माता-पिता की मिलीभगत से उसे घर से बाहर निकालने के लिए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल का दुरुपयोग किया जा रहा है. पीठ ने स्पष्ट किया कि वरिष्ठ नागरिक मन की शांति के साथ जीने के हकदार हैं, लेकिन वे अपने अधिकारों का इस्तेमाल इस तरह से नहीं कर सकते हैं जिससे घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के तहत किसी महिला के अधिकार खत्म हो जाएं. 

अदालत ने मामले में प्रकाश डालते हुए कहा, 'इसमें कोई संदेह नहीं है कि वरिष्ठ नागरिक अपने घर में शांति के साथ, बहू और उसके पति के बीच वैवाहिक कलह के कारण बिना किसी परेशानी के रहने के हकदार हैं. लेकिन साथ ही, वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत मशीनरी का उपयोग घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 17 के तहत किसी महिला के अधिकार को पराजित करने के उद्देश्य से नहीं किया जा सकता है'. 

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जानें वह पूरा मामला जिसमें बॉम्बे HC ने की टिप्पणी

दरअसल, याचिकाकर्ता और उसके पति ने 1997 में शादी की थी और उस घर में रह रहे थे जो सास के नाम पर था. पति-पत्नी के बीच कुछ वैवाहिक कलह के बीच, मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने 2023 में एक आदेश पारित कर कपल को फ्लैट खाली करने का निर्देश दिया. हालांकि, याचिकाकर्ता के पति ने घर खाली नहीं किया और मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल के आदेश को चुनौती भी नहीं दी. उसने अपने माता-पिता के साथ रहना जारी रखा. इससे न्यायालय को यह विश्वास हो गया कि महिला के ससुराल वालों द्वारा शुरू की गई बेदखली की कार्यवाही केवल उसे घर से बाहर निकालने की एक चाल थी.

कोर्ट ने कहा, 'उसके पास रहने के लिए कोई अन्य जगह नहीं है. इसलिए, वरिष्ठ नागरिकों की मानसिक शांति सुनिश्चित करने के लिए उसे बेघर नहीं किया जा सकता है'. उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल के बेदखली आदेश को रद्द कर दिया और यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता-महिला द्वारा घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत साझा निवास में रहने के अधिकार के लिए दायर याचिका अभी भी एक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित थी. इसलिए, उच्च न्यायालय ने मजिस्ट्रेट को महिला की याचिका पर शीघ्रता से निपटारा करने का भी आदेश दिया.

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