ठाकरे ब्रदर्स या महायुति... कौन बनेगा मुंबई का किंग, BMC समेत 29 नगर निगमों में आज वोटिंग

महाराष्ट्र में BMC समेत 29 नगर निगमों के चुनाव में आज मतदान होना है. सबकी नजर बीएमसी पर लगी है. यहां विरासत बचाने की जंग है. BMC की कुल 227 सीटों पर कुल 1700 उम्मीदवार मैदान में हैं.

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BMC चुनाव मतलब पैसे, पावर और प्रतिष्ठा की लड़ाई (फोटो- ITG) BMC चुनाव मतलब पैसे, पावर और प्रतिष्ठा की लड़ाई (फोटो- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:09 AM IST

महाराष्ट्र में आज होने वाले नगर निकाय चुनाव केवल स्थानीय निकाय तक सीमित नहीं हैं. बीएमसी समेत 29 नगर निगमों के चुनाव को मिनी विधानसभा चुनाव माना जा रहा है. खासकर मुंबई महानगर पालिका यानी बीएमसी पर सबकी निगाहें टिकी हैं, जहां पैसे, पावर और प्रतिष्ठा की निर्णायक लड़ाई है. यह चुनाव तय करेगा कि मुंबई की सत्ता किसके हाथ में जाएगी और किसकी राजनीतिक विरासत कायम रहेगी.

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बीएमसी एशिया की सबसे अमीर सिविक बॉडी मानी जाती है, जिसका सालाना बजट करीब 75 हजार करोड़ रुपये है. यही वजह है कि इस चुनाव को बेहद अहम माना जा रहा है. यह सिर्फ एक महानगर पालिका का चुनाव नहीं है, बल्कि मुंबई शहर और उपनगरों की महाराष्ट्र विधानसभा की 36 सीटों और लोकसभा की 6 सीटों की राजनीति से भी सीधे तौर पर जुड़ा है.

बीएमसी के 227 वार्ड में जो पार्टी मजबूत होती है, वही महाराष्ट्र की सियासत में मंत्रालय तक पहुंचने की ताकत हासिल करती है.

1996 से 2017 तक ठाकरे परिवार का एकछत्र राज

यह चुनाव ठाकरे परिवार के लिए इसलिए भी अहम है क्योंकि 1996 से 2017 तक बीएमसी पर उनका एकछत्र राज रहा है. शिवसेना के विभाजन के बाद यह पहला मौका है जब पार्टी एकनाथ शिंदे के पास है, जबकि परिवार उद्धव ठाकरे के साथ है. ऐसे में यह चुनाव तय करेगा कि मुंबई की जनता ने एकनाथ शिंदे और उनकी शिवसेना को स्वीकार किया है या फिर ठाकरे परिवार के साथ उसका सियासी रिश्ता अब भी कायम है.

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बीजेपी के लिए भी यह चुनाव ऐतिहासिक साबित हो सकता है. अगर पार्टी पहली बार अपने दम पर बीएमसी जीतती है, तो यह न सिर्फ पार्टी बल्कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए भी बड़ी राजनीतिक सफलता मानी जाएगी. वहीं ठाकरे परिवार के लिए हार का मतलब होगा उनका आखिरी राजनीतिक किला भी ढह जाना.

वोटिंग से चंद घंटे पहले राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे अपने-अपने परिवार के साथ मुंबई के प्रसिद्ध मुंबा देवी मंदिर पहुंचे. उद्धव ठाकरे अपनी पत्नी और बेटे आदित्य ठाकरे के साथ मंदिर में दर्शन करने पहुंचे, जबकि राज ठाकरे अपनी पत्नी, बेटे अमित ठाकरे और बहू के साथ नजर आए. इस चुनाव में ठाकरे परिवार को सबसे ज्यादा आशीर्वाद की जरूरत भी बताई जा रही है.

शिवसेना की शुरुआत 1966 में बाल ठाकरे ने की थी और 1968 में ही पार्टी ने बीएमसी चुनाव में 140 में से 42 सीटें जीत ली थीं. इसके बाद शिवसेना लगातार मजबूत होती गई. 2006 में राज ठाकरे के अलग होकर एमएनएस बनाने के बाद भी शिवसेना बीएमसी में सबसे बड़ी ताकत बनी रही और करीब 80 सीटें जीतती रही. 2017 में हुए आखिरी बीएमसी चुनाव में भी शिवसेना ने 84 सीटें जीतकर मेयर पद अपने पास रखा.

इसबार बदल चुका है पूरा सीन

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लेकिन अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. साढ़े तीन साल की देरी और करीब 9 साल बाद हो रहे इस चुनाव में शिवसेना दो हिस्सों में बंटी हुई है. पार्टी एकनाथ शिंदे के पास चली गई है, जबकि परिवार उद्धव ठाकरे के साथ है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या ठाकरे परिवार की एकजुटता यह तय कर पाएगी कि मुंबई के वोटरों की नजर में आज भी वही असली शिवसेना हैं.

जमीनी स्तर की बात करें तो 69 सीटों पर शिवसेना (यूबीटी) और शिंदे गुट की शिवसेना के बीच सीधा मुकाबला है, जिससे शिवसेना की असली विरासत का फैसला हो सकता है. 97 सीटों पर उद्धव ठाकरे की पार्टी का मुकाबला बीजेपी से है, जिससे यह तय होगा कि मुंबई में बीजेपी ठाकरे परिवार के सामने कितनी मजबूत है. वहीं 18 सीटों पर शिंदे गुट और एमएनएस आमने-सामने हैं और करीब 35 सीटों पर बीजेपी और एमएनएस के बीच कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है.

इस चुनाव में हिंदू स्वाभिमान और मराठी मान की उस राजनीति का भी फैसला होना है, जिसकी नींव बाल ठाकरे ने रखी थी. हार्ड हिंदुत्व और कोर मराठी राजनीति के दम पर शिवसेना ने बीएमसी में लंबे वक्त तक कब्जा बनाए रखा. अब उसी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे एक साथ चुनाव प्रचार करते दिखे.

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बीएमसी चुनाव के दौरान मुसलमान मेयर, हिंदू मेयर और मराठी मेयर जैसे मुद्दों पर भी जमकर सियासत हुई. मराठी अस्मिता, हिंदुत्व और मुंबई की सत्ता को लेकर सभी दल आमने-सामने नजर आए.

जिस महाराष्ट्र में कभी शिवसेना का मतलब ही ठाकरे परिवार हुआ करता था, वहां हालिया विधानसभा चुनावों में तस्वीर बदलती दिखी. ऐसे में अब बीएमसी का यह चुनाव एक बार फिर परिवार और पार्टी दोनों के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने वाला माना जा रहा है. सवाल यही है कि क्या छह बार से बीएमसी जीतती आ रही ठाकरे परिवार की पार्टी के लिए यह सातवां दरवाजा टूटेगा या फिर ठाकरे परिवार अपना आखिरी किला बचाने में कामयाब रहेगा.

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