पूरे देश में शारदीय नवरात्रि की धूम है. देश भर में जगह-जगह देवी पंडाल लगाए गए हैं. मां दुर्गा की विभिन्न-विभिन्न प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं. हर जगह देवी मां की पूजा विधि भी अलग होती है. झारखंड की राजधानी रांची में झारखंड आर्मड पुलिस 1 (JAP) के जवान मां दुर्गा की पूजा नेपाली परंपरा से करते हैं. इस दौरान फायरिंग करके JAP के जवान देवी मां को सलामी देते हैं. इसमें भी खास बात यह है कि नेपाली परंपरा में देवी की प्रतिमा की पूजा नहीं की जाती है. यहां पर कलश को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है. फायरिंग के बाद ही देवी की पूजा की जाती है.
देवी मां करती है हमारी रक्षा: JAP
दरअसल, गोरखा जवानों के हथियारों की पूजा के पीछे ऐसी मान्यता रही है कि गोरखा और नेपाली संस्कृति पुरातन समय से ही शक्ति के उपासक रहे हैं. ऐसे में बलि की प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है जो अब इनकी संस्कृति का हिस्सा बन गई है. जवानों के मन में विश्वास है कि शक्ति की देवी मां दुर्गा की पूजा करने से वे हर जगह जवानों की रक्षा करती है. इसलिए वे हर पूजा में मां दुर्गा को बलि अर्पित करते है और उनके सम्मान में गोलियां चलाते है. षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी और नवमी को भी आसमान में फायरिंग की जाती है.
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24 अक्टूबर को प्रतिमाओं का विसर्जन
महाशक्ति के उपासना का महापर्व शारदीय नवरात्र इस बार आश्विन शुक्ल प्रतिपदा अर्थात, 15 अक्टूबर से शुरू हुआ है जो 23 अक्टूबर, महानवमी तक चलेगा. इस बार नवरात्र पूरे नौ दिनों का है. 23 अक्टूबर को नवमी का होम आदि और चंडा देवी की पूजा करना चाहिए. वहीं, इस बार 23 अक्टूबर को ही दशमी तिथि भी लग जाएगी. नवरात्र व्रत की पारन उदयाकालिक दशमी में अर्थात, 24 अक्टूबर को प्रात: में होगा. 24 अक्टूबर को ही देवी की पूजन प्रतिमाओं का विसर्जन भी होगा.
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शारदीय नवरात्र का महात्म्य
शारदीय नवरात्र का महात्म्य सतयुग से चला आ रहा है. मारकण्डेय पुराण में जो देवी का महात्म्य दुर्गा सप्तशती के द्वारा प्रकट किया गया है. वहां पर वर्णित है कि शुंभ-निशुंभ और महिषासुर तामसिक वृत्ति वाले असुरों के जन्म होने से देवगण दुखी हो गये. सभी ने मिलकर चित्त शक्ति से महामाया की स्तुति की. तब देवी ने वरदान दिया और देवताओं से कहा, 'डरो मत, मैं अचिर काल में प्रकट होकर अतुल्य पराक्रमी असुरों का संहार करूंगी और तुम्हारे मैं दुख को दूर करूंगी. मेरी प्रसन्नता के लिए तुम लोगों को आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से घट स्थापन पूर्वक नवमी तक मेरी आराधना करनी चाहिए. इसी आधार पर यह देवी नवरात्र का महोत्सव अनादि काल से चला आ रहा है. चूंकि यह व्रत नवरात्रि तक होता है, इसलिए इस व्रत का नाम नवरात्र पड़ा.
सत्यजीत कुमार