जम्मू कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने बैसरन घाटी की वादियों का लुत्फ उठाने पहुंचे सैलानियों पर 22 अप्रैल को हमला कर दिया था. इस हमले में 26 सैलानियों की जान गई थी. आतंकी हमले के बाद सुरक्षाबलों को मौका-ए-वारदात तक पहुंचने में करीब एक घंटे का समय लग गया था. जब तक सुरक्षाबलों के जवान बैसरन घाटी तक पहुंचे, आतंकी वारदात को अंजाम देकर आराम से जा चुके थे. सुरक्षाबलों के मौके पर पहुंचने में हुई देरी के पीछे रोड न होने की वजह सामने आई थी. बैसरन घाटी तक रोड के लिए सरकार की ओर से पहले प्रयास भी हुए, लेकिन वोटबैंक की राजनीति आड़े आ गई.
जम्मू कश्मीर की सरकार ने पहले जब भी बैसरन घाटी तक रोड बनवाने की कोशिश की, घोड़े वाले लोग विरोध में खड़े हो गए. इस इलाके में घोड़े चलाकर परिवार चलाने वालों की तादाद करीब 20 फीसदी बताई जा रही है. अब पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले के बाद सड़क निर्माण की डिमांड फिर से जोर पकड़ रही है. पहलगाम के विधायक अल्ताफ कालू ने कहा है कि बैसरन घाटी तक सड़क बनेगी. सड़क निर्माण सरकार की प्राथमिकता है. जम्मू कश्मीर सरकार के सूत्रों ने भी सड़क निर्माण की योजना की पुष्टि की है.
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सरकार के सूत्रों ने बताया कि पहलगाम आतंकी हमले के बाद सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कई फैसले लिए गए हैं. बैसरन को पहलगाम से जोड़ने के लिए पक्की सड़क का निर्माण भी इनमें से एक है. इसे जल्द से जल्द पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है. जानकारी के मुताबिक सरकार के स्तर पर बैसरन को पहलगाम से पक्की सड़क के जरिये जोड़ने की कोशिशें पहले भी हुई हैं, लेकिन हर बार यह महज शुरुआती फाइलों में ही रह गई. सवाल है कि सड़क निर्माण को किसने रोका? यह जानने के लिए आजतक की टीम बैसरन पहुंची.
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सियासत के लिए सड़क किसने रोकी?
बैसरन को पहलगाम से जोड़ने वाली सड़क पोनी ट्रैक है. बैसरन घाटी तक पहुंचने के लिए घोड़े ही एकमात्र जरिया हैं. वहां तक सड़क निर्माण का मतलब होगा कि बैसरन घाटी तक वाहनों की आवाजाही शुरू हो जाएगी. ऐसा हुआ तो घोड़े के सहारे आजीविका चलाने वाले इलाकाई लोगों के सामने रोजी-रोजगार का संकट खड़ा हो जाएगा. इसी आशंका में घोड़े वाले लोग सड़क निर्माण की सरकार की योजना का विरोध करते रहे हैं.
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घोड़ेवालों को वोटबैंक की राजनीति के चक्कर में लोकल नेताओं का भी समर्थन मिलता रहा है. विरोध इतना मुखर हो जाता रहा कि सरकारें पहलगाम से बैसरन को सड़क मार्ग के जरिये जोड़ने की योजना शुरुआती दौर में ही ठंडे बस्ते में डाल देती रहीं. इलाके में करीब 20 फीसदी आबादी घोड़े के सहारे आजीविका चलाती है.
मीर फरीद