हिमाचल में लंबी खींचतान के बाद कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पद के लिए सुखविंदर सिंह सुक्खू के नाम पर मुहर लगा दी है. सुक्खू राज्य के 15वें मुख्यमंत्री होंगे. वहीं डिप्टी सीएम मुकेश अग्निहोत्री को बनाने का निर्णय लिया है. इसके साथ ही देश की सबसे पुरानी पार्टी ने राजनीति में परिवारवाद से किनारा करने का साफ संदेश भी दे दिया है. पहले पार्टी में गैर गांधी अध्यक्ष और अब क्षेत्रीय क्षत्रपों की दखलअंदाजी को भी नकार दिया गया है. कांग्रेस ने हिमाचल के छह बार मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह के परिवार की बजाय कॉमनमैन सुक्खू पर भरोसा जताया है.
इससे पहले तक वीरभद्र की पत्नी और मंडी से सांसद प्रतिभा सिंह नए सीएम की रेस में खुद को जबरदस्त तरीके से आगे किए हुए थीं. लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा के बेटे विक्रमादित्य के सीट छोड़ने की पेशकश भी काम नहीं आई.
ऐसा लगता है कि अब तक परिवारवाद के नाम पर घिरती आ रही कांग्रेस ने अब इस तमगे से दूरी बनाने की तैयारी कर ली है. यही वजह है कि हिमाचल प्रदेश में पिछले दो दिन की खींचतान और लामबंदी के बीच पार्टी ने पहाड़ और हॉली लॉज को दरकिनार कर दिया है. यहां एक ऐसे चेहरे पर दांव लगाया है, जिसकी छवि कॉमनमैन की रही है. इसके साथ ही संगठन में काम करने का लंबा अनुभव भी है. पांच बार विधायक और नगर निगम के दो बार काउंसलर भी रहे हैं. सीएम और डिप्टी सीएम रविवार (11 दिसंबर) को दोपहर 1:30 बजे रिज मैदान में शपथ लेंगे.
कांग्रेस ने सुक्खू पर क्यों खेला बड़ा दांव...
- हिमाचल में कांग्रेस की सत्ता हमेशा पहाड़ और हॉली लॉज से चलती आई है. अब पार्टी ने इस रिवाज को बदल दिया है. कांग्रेस ने अब मैदानी इलाके हमीरपुर से संबंध रखने वाले सुक्खू को राज्य के मुख्यमंत्री की कमान सौंपी है. इसके साथ ही कांग्रेस ने परिवारवाद को भी तरजीह ना देने का सीधा संदेश दिया है.
- सुक्खू की छवि कॉमनमैन की रही है. माना जा रहा है कि सुक्खू की इसी छवि ने उन्हें आसानी से सीएम की रेस में ला दिया और इसमें बड़ी जीत भी दिला दी.
- जब प्रतिभा सिंह और उनके समर्थक मुखर होकर सीएम पद की दावेदारी कर रहे थे, तब सुक्खू बेहद साइलेंट तौर पर अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटे थे. सुक्खू ने ऐसा कोई बयान नहीं दिया, जिसमें उन्होंने खुद को सीएम पद का दावेदार बताया हो. हालांकि, वे अपने योगदान को याद दिलाना नहीं भूले.
- एक दिन पहले कांग्रेस आलाकमान ने निर्वाचित विधायकों में से ही सीएम पद के लिए चेहरा चुनने का संदेश दिया, तभी साफ हो गया था कि इस रेस से प्रतिभा सिंह सीधे तौर पर बाहर हो गई हैं. पार्टी के इस फैसले से प्रतिभा सिंह की दावेदारी जहां कमजोर हुई, वहीं सुक्खू को मैदान फतह करने के लिए बड़ी लीड मिल गई.
- हालांकि, प्रतिभा सिंह के बेटे विक्रमादित्य ने हाईकमान के समक्ष ऑप्शन रखा कि अगर मां को सीएम पद दिया जाता है तो वो अपनी शिमला ग्रामीण सीट खाली कर सकते हैं.
- प्रतिभा सिंह को साधने के लिए कांग्रेस ने उनके समर्थक विधायक और नेता प्रतिपक्ष मुकेश अग्निहोत्री को डिप्टी सीएम बनाने का फैसला लिया है. प्रतिभा के बेटे विक्रमादित्य को भी कैबिनेट में महत्वूपर्ण मंत्रालय दिए जाने की चर्चा है.
प्रतिभा की शर्तें मानी गईं?
हिमाचल में दो दिन से सीएम के नाम को लेकर मंथन चल रहा था. कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने खुद को सीएम बनाने के लिए जमकर लॉबिंग की. संगठन पर दबाव बनाने की कोशिश की. बात नहीं बनी तो समर्थक सड़क पर उतर आए. दूसरे दिन जब सुक्खू का नाम लगभग फाइनल हो गया, तब प्रतिभा सिंह के सामने समझौते के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था. संगठन ने प्रतिभा कैंप को डिप्टी सीएम का ऑफर दिया. इसके साथ ही कैबिनेट में भी महत्वपूर्ण मंत्रालय देने का भरोसा दिया. इस पर प्रतिभा ने भी हामी भरी और CLP की बैठक के बाद हाईकमान के फैसले पर सहमति जताई.
प्रतिभा और सुक्खू के बीच राजनीतिक अदावत भी...
रोचक बात यह भी है कि सुक्खू और प्रतिभा के परिवार के बीच पुरानी राजनीतिक अदावत भी है. ये पिछले 9 सालों से चलती आ रही है. साल 2013 में कांग्रेस ने सुखविंदर सिंह सुक्खू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था, तब से दोनों खेमे राजनीति में अंदरखाने आमने-सामने देखे जाते रहे हैं. सुक्खू ने पीसीसी चीफ बनते ही वीरभद्र सिंह कैंप के कार्यकर्ताओं और नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियों से हटा दिया था. इस बात से वीरभद्र काफी नाराज भी हो गए थे.
2017 के चुनाव में हार के बाद पार्टी ने सुक्खू से जनवरी 2019 में प्रदेश अध्यक्ष की कमान वापस ले ली थी. नाराज सुक्खू ने लोकसभा चुनाव प्रचार से दूरी बना ली थी. 8 जुलाई 2021 में वीरभद्र सिंह का निधन हो गया. उसके बाद मंडी लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुए और प्रतिभा सिंह ने जीत दर्ज की. अब विधानसभा चुनाव से 6 महीने पहले पार्टी हाईकमान ने प्रतिभा सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी थी.
गांधी परिवार का आभार, खड़गे का नाम नहीं लिया
विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद सुक्खू ने एक बार भी पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम नहीं लिया और ना ही आभार जताया. सुक्खू ने गांधी परिवार के भरोसे पर ना सिर्फ धन्यवाद जताया, बल्कि बेहद भावुक भी नजर आए. सुक्खू ने कहा- मैं सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी का व्यक्तिगत तौर पर आभारी हूं. मैंने आम परिवार से उठकर राजनीतिक जीवन की शुरुआत की है. मुझे NSUI का अध्यक्ष राजीव गांधी ने बनाया. युवा कांग्रेस का अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बनाया. प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष सोनिया गांधी ने बनाया. एक साधारण परिवार से उठकर राजनीति की जो सीढ़िया चढ़ी हैं, उसमें गांधी परिवार का एक बहुत बड़ा योगदान रहा है. इस योगदान के लिए मैं व्यक्तिगत तौर पर उनका धन्यवाद करता हूं.
सुक्खू ने कहा- कांग्रेस पार्टी की सरकार लाने वाली हिमाचल की जनता का आभार जताते हैं. जो वादे हमने किए हैं, वे अक्षरश: पूरे करने की जवाबदेही मेरी है. आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं. हम सत्ता में सत्ता के लिए नहीं आए हैं. हम सत्ता व्यवस्था परिवर्तन के लिए लाए हैं. कुछ समय दीजिए. हमें परिश्रम करना है. हमें संघर्ष करना है. एक नई सोच और नई व्यवस्था के साथ हिमाचल में सुंदर, स्वच्छ और ईमानदार प्रदेश के रूप में आगे बढ़ाएंगे. इस दौरान सुक्खू बेहद भावुक नजर आए.
उन्होंने कहा कि 18 की उम्र से मैंने अपना करियर शुरू किया. कॉलेज के सीआर से लेकर शिमला के कॉलेज में जनरल सेकेटरी बना. एनएसयूआई में डिस्ट्रिक्ट सचिव रहा. उसके बाद कांग्रेस की विचारधारा में आया और युवा कांग्रेस में जिम्मेदारी संभाली. मेरे परिवार में कोई सदस्य राजनीति में नहीं था. उसके बाद मुझे युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया. फिर संगठन का 10 साल प्रदेश अध्यक्ष रहा. पांच बार विधायक बना. शिमला नगर निगम में दो बार काउंसलर रहा. जमीनी स्तर से करियर शुरू किया, फिर विधायक बना. प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना. इसे मैं कभी भूल नहीं पाऊंगा.
सुक्खू कॉमनमैन क्यों...
सुक्खू को राजनीति विरासत में नहीं मिली है. उनके पिता रोडवेज में बस चालक थे. सुक्खू ने अपने करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से की और अपनी मेहनत की दम पर संगठन में पहचान बनाई. सुक्खू नादौन विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि सुक्खू से हर किसी की मुलाकात संभव हो जाती है. वे राजनीति में खासे सक्रिय भी रहते हैं. यही वजह है कि पहले छात्र संघ के सचिव चुने गए. बाद में अध्यक्ष भी बने. शिमला नगर निगम के काउंसलर का दो बार चुनाव लड़े और जीते. उसके बाद लगातार विधायक चुने जा रहे हैं. 2013 से 2019 तक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे हैं. इस बार चुनाव में इलेक्शन कैंपेनिंग कमेटी के चेयरमैन थे.
उदित नारायण