भारतीय नौसेना ने दिया था करारा जवाब... ओखा गांव के चश्मदीदों ने सुनाई 1971 के जंग की दास्तां

भारत-पाकिस्तान के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ा है. एयर स्ट्राइक और मॉक ड्रिल के बाद देश चौकन्ना है, लेकिन युद्ध का असली चेहरा क्या होता है, यह जानने के लिए आजतक की टीम पहुंची गुजरात के ओखा गांव, जो 1971 की जंग का गवाह बना था. यहां आज भी बुजुर्गों को वो दिन याद हैं. उन्होंने बताई पूरी कहानी...

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1971 की जंग के चश्मदीद. (Photo: Aajtak) 1971 की जंग के चश्मदीद. (Photo: Aajtak)

ब्रिजेश दोशी

  • अहमदाबाद,
  • 08 मई 2025,
  • अपडेटेड 3:01 PM IST

भारत की एयर स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान बौखलाया हुआ है. पूरे देश ने कल मॉक ड्रिल भी देखी, लेकिन जब युद्ध होता है, तब क्या हालात होते हैं, इसके लिए ओखा से ग्राउंड रिपोर्ट... जहां आज भी लोगों को 1971 के युद्ध की बातें याद हैं. भारत-पाकिस्तान के बढ़ते तनाव के बीच हम पश्चिमी भारत की समुद्री सीमा के ओखा गांव पहुंचे, जहां आज भी कुछ नागरिक ऐसे हैं, जो 1971 के युद्ध के साक्षी हैं. उन्होंने हमारे साथ उस वक्त की यादें साझा कीं. साल 1971 में कम्युनिकेशन के आज की तरह पावरफुल साधन या माध्यम नहीं थे.

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ओखा के रहने वाले तीन बुजुर्ग अनुपमभाई बाराई, प्रवीणभाई गोकानी और प्रभुदासभाई सोलंकी ने आजतक के साथ बातचीत में कहा कि साल 1971 में यहां यानी कि ओखा में फाइटर जेट के हमले हुए थे. हमें पहली बार जानकारी रेडियो के माध्यम से मिली थी कि दोनों देशों के बीच युद्ध की शुरुआत हो चुकी है. उस वक्त यहां बंदरगाह पर ब्रिटिश कंपनी के फ्यूल टैंक थे. 

शाम को रेडियो के माध्यम से पता चला कि युद्ध शुरू हो गया है. युद्ध के समय लोग यहां से द्वारका चले गए, जो 30 किलो मीटर की दूरी पर है. पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय नौसेना ने जवाबी कार्रवाई की थी, जिसमें कराची बंदरगाह को तबाह कर दिया था.

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भारतीय नौसेना के बडे़ जहाज तब ओखा बंदरगाह से गए थे. हमने सुना था कि कराची बंदरगाह को उड़ा दिया था. कराची बंदरगाह से 210 समुद्री मील की दूरी पर ओखा बंदरगाह है. इस गांव में लोग रहते हैं. इसी वजह से दिसंबर 1971 में पाकिस्तान ने सीजफायर किया था.

अनुपमभाई कहते हैं कि तब उनकी उम्र लगभग 17-18 साल की थी. हर रोज हवाई हमले होते थे, जो हमने आंखों से देखे हैं. हम लोग सुबह 8 बजे बाद गांव आते थे और शाम को अंधेरा होने से पहले गांव छोड़ देते थे. पूरे 14-15 दिन युद्ध चला था. भारतीय नौसेना ने करारा जवाब दिया था. गांव को और बंदरगाह को कोई नुकसान नहीं हुआ था. यहां पर भारतीय नौसेना का काफिला रहता था. प्रवीणभाई का कहना है कि तब ओखा बंदरगाह समुद्री व्यापार का बड़ा केंद्र था. ओखा से नजदीक भारतीय वायुसेना का स्टेशन नहीं था. उस वक्त लोग गांव से पलायन कर गए थे, अब ऐसी कोई स्थिति नहीं है.

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