प्रदूषण: 11 अक्टूबर से पराली गलाने के लिए 'बायो डिकम्पोजर' का छिड़काव होगा शुरू

पराली को खाद में बदलने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने 20 रूपए की कीमत वाली 4 कैप्सूल का एक पैकेट तैयार किया है.

Advertisement
बायो डिकम्पोजर से हटेगी पराली (फोटो- आजतक) बायो डिकम्पोजर से हटेगी पराली (फोटो- आजतक)

पंकज जैन

  • नई दिल्ली,
  • 06 अक्टूबर 2020,
  • अपडेटेड 3:43 PM IST
  • अब खेतों में नहीं जलाई जाएगी पराली
  • बायो डिकम्पोजर घोल का होगा छिड़काव
  • घोल से गल कर खाद बन जाएगा डंठल

दिल्ली में पराली जलने से फैलने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए 11 अक्टूबर से 'बायो डिकम्पोजर' घोल का छिड़काव खेतों में किया जाएगा. दिल्ली सरकार ने नजफगढ़ के खड़खड़ी नाहर के उद्यान में एक केंद्र बनाया है, पराली गलाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा द्वारा तैयार 'बायो डिकम्पोजर' का बड़े पैमाने पर घोल बनना शुरू कर दिया है. मंगलवार को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पर्यावरण मंत्री के साथ नजफगढ़ में तैयार किये गए केंद्र का जायजा भी लिया. 

Advertisement

इस दौरान अरविंद केजरीवाल ने कहा कि "किसानों के लिए एक बड़ी समस्या थी कि वह पराली से निजात कैसे पाएं. किसानों के लिए यह समस्या बनी हुई थी कि किसान पराली को खेतों में जलाता था, पराली के जलाने से खेतों में जो अच्छे बैक्टीरिया होते थे वह भी जल जाते थे, जिससे खेत की उर्वरा शक्ति को नुकसान पहुंचता था.

पराली जलाने से जो धुआं उठता था उससे किसान के परिवार और पूरे गांव वालों को परेशानी होती थी. प्रदूषण वहां से पूरे उत्तरी भारत में फैल जाता था जिससे लोगों को सांस लेने में परेशानी होती है. केजरीवाल ने कहा कि मुझे बेहद खुशी है कि पूसा इंस्टीट्यूट ने बेहद कम लागत में इस समस्या का समाधान निकाला है जिसमें उन्होंने कुछ कैप्सूल बनाए हैं जिसके जरिए एक घोल बनाया जाता है और उस घोल को अगर पराली के ऊपर डाल दिया जाए तो पराली का डंठल गल जाता है और खाद में तब्दील हो जाता है जिससे जमीन की उत्पादन क्षमता बढ़ती है.

Advertisement

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा कि "घोल का प्रयोग करने से किसानों की खेती में लागत कम होगी इसके प्रयोग से पराली के डंठल खाद के रूप में तब्दील हो जाते हैं जिससे खेत की उत्पादन क्षमता बढ़ती है. इससे किसानों को खेती में ज्यादा लाभ होगा और कम लागत में ज्यादा फसल का उत्पादन हो सकेगा. इस घोल के प्रयोग करने से किसानों को अपने खेतों में पराली भी नहीं चलानी पड़ेगी जिससे उन्हें प्रदूषण से भी राहत मिलेगी."

अरविंद केजरीवाल ने बताया कि तीन-चार साल से पूसा इंस्टीट्यूट इस पर रिसर्च कर रहा था कि आज के समय दिल्ली में लगभग 700 हेक्टेयर जमीन है जहां नॉन बासमती राइस उगाई जाती है. पूरे 700 हेक्टेयर जमीन के ऊपर दिल्ली सरकार इस बार घोल का छिड़काव कर आएगी, सिर्फ किसानों को सहमति देनी है कि आप मेरे खेत पर इस घोल का छिड़काव कर सकते हैं. इसकी प्रक्रिया आज शुरू हो गई है.

उन्होंने कहा कि घोल को तैयार करने का कार्यक्रम 7 दिन तक चलता है. गुड़ और बेसन डालकर 4 दिन तक उसे रखा जाता है. 11 अक्टूबर से दिल्ली के विभिन्न इलाकों में हमें घोल के छिड़काव की शुरुआत करेंगे. हमें पूरी उम्मीद है कि यह प्रयोग सफल होगा और अगर यह सफल हो जाता है तो यह हमारे लिए एक उपलब्धि होगी. क्योंकि यह तकनीक बहुत सस्ती है. 700 हेक्टेयर(2000 एकड़) जमीन में इस घोल के छिड़काव की कुल लागत लगभग 20 लाख रुपए तक आएगी. 

Advertisement

दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने बताया कि दिल्ली में पराली का धुआं दिल्ली का कम और पड़ोसी राज्य हरियाणा और पंजाब का ज़्यादा है. पराली खेत में ही बायो डिकम्पोज़ करके हम पड़ोसी राज्यों के सामने एक मॉडल खड़ा करना चाहते हैं. ये पड़ोसी राज्यों की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि वो इसका इस्तेमाल करेंगे या नहीं. इस 'पराली गलाने हेतु डिकम्पोज़र घोल निर्माण केंद्र' में अभी तक 1200 एकड़ ज़मीन के किसानों ने अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया है. 

क्या है ये तकनीक?
पराली को खाद में बदलने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान ने 20 रूपए की कीमत वाली 4 कैप्सूल का एक पैकेट तैयार किया है. प्रधान वैज्ञानिक युद्धवीर सिंह ने कहा कि 4 कैप्सूल से छिड़काव के लिए 25 लीटर घोल बनाया जा सकता है और एक हेक्टेयर में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं. सबसे पहले 5 लीटर पानी मे 100 ग्राम गुड़ उबालना है और ठंडा होने के बाद घोल में 50 ग्राम बेसन मिलाकर कैप्सूल घोलना है. 

इसके बाद घोल को 10 दिन तक एक अंधेरे कमरे में रखना होगा, जिसके बाद पराली पर छिड़काव के लिए पदार्थ तैयार हो जाता है. इस घोल को जब पराली पर छिड़का जाता है तो 15 से 20 दिन के अंदर पराली गलनी शुरू हो जाती है और किसान अगली फसल की बुवाई आसानी से कर सकता है. आगे चलकर यह पराली पूरी तरह गलकर खाद में बदल जाती है और खेती में फायदा देती है.

Advertisement

अनुसंधान के वैज्ञानिकों के मुताबिक किसी भी कटाई के बाद ही इस घोल का छिड़काव किया जा सकता है. इस कैप्सूल से हर तरह की फसल की पराली खाद में बदल जाती है और अगली फसल में कोई दिक्कत भी नहीं आती है. कैप्सूल बनाने वाले वैज्ञानिकों ने पर्याप्त कैप्सूल के स्टॉक का दावा किया है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक पराली जलाने से मिट्टी के पोषक तत्व भी जल जाते हैं और इसका असर फसल पर होता है. युद्धवीर सिंह ने कहा कि ये कैप्सूल भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बनाया गया है. ये कैप्सूल 5 जीवाणुओं से मिलाकर बनाया गया है जो खाद बनाने की रफ़्तार को तेज़ करता है. 

 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »