वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान संस्थान के पूर्व मुख्य वैज्ञानिक गौहर रजा ने चुनाव आयोग के इस दावे को अवैज्ञानिक करार दिया है कि ईवीएम के साथ छेड़छाड़ करना कतई नामुमकिन है. रजा का कहना है, "दुनिया में ऐसी कोई मशीन नहीं बनी जिसे टेंपर ना किया जा सके. साइकिल से लेकर अंतरिक्ष यान तक और कैलकुलेटर से लेकर ईवीएम तक. हां टैंपर करने के नाम अलग-अलग जरूर हैं. वैध रूप से छेड़छाड़ करें तो उसे ऑपरेशन कहते हैं और अवैध रूप से वही काम किया जाय तो उसे टेंपर कहते हैं. मशीन को थोड़े ही मालूम है कि छेड़छाड़ वैध रूप से हो रही है या कि अवैध रूप से."
दिल्ली आईआईटी से स्नातक और अन्य ऊंची पढ़ाई कर चुके गौहर रजा का कहना है, "जब दुनिया के वैज्ञानिक धरती पर बैठे-बैठे चांद और मंगल पर पहुंचे विमान को रिमोट से कंट्रोल कर रहे हैं तो इस दावे में कोई दम नहीं कि हमारी मशीन को टेंपर नहीं किया जा सकता. तकनीकी तौर पर तो टेंपरिंग संभव है. लेकिन चुनाव आयोग इसके लिए ईवीएम को हाथ लगाने दे. उचित औजार मुहैया कराये और साथ ही सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर की जानकारी भी दावेदार को दे. समुचित समय भी दे और फिर देखते हैं कि मशीन टेंपर हो पाती है या नहीं. वरना तो दावा नहीं बकवास है."
रजा का मानना है कि इस दावे में भी कोई दम नहीं कि 16 लाख मशीनों को कौन टेंपर करेगा और कैसे. उनका कहना है, "सच्चाई ये है कि किसी भी राजनीतिक दल को अगर वो चाहे तो चुनाव जीतने के लिए सभी मशीनों के साथ छेड़छाड़ करने की ना तो जरूरत है ना ही मजबूरी. सिर्फ दस फीसदी ईवीएम जहां पार्टी दो नंबर पर रही है वहां की मशीनें टेंपर कर चुनाव आसानी से जीता जा सकता है. रही बात तकनीकी पक्ष की तो ऐसे में जहां मशीनें बन रही हैं वहां इसमें आसानी से बदलाव किया जा सकता है. क्योंकि सॉफ्टवेयर जहां से आ रहा है वहां इसमें मनचाही प्रोग्रामिंग की जा सकती है."
उनका कहना है, "सबसे पहले चुनाव आयोग को अपना स्वभाव और रवैया बदलना चाहिए. आयोग को लगता है कि ईवीएम की सुरक्षा पर उंगली उठाने वाला हर शख्स लोकतंत्र का दुश्मन है. सुननी सबकी चाहिए. सबके सवालों का संतोषजनक जवाब मिलना जरूरी है. देश की जनता लोकतंत्र की दुश्मन नहीं बल्कि लोकतंत्र की मजबूती चाहती है. आयोग उनको अपना दोस्त माने तो ज्यादा बेहतर होगा."
संजय शर्मा