दीपावली के दूसरे दिन देश भर में गोवर्धन पूजा होती है. इस दिन महिलाएं गौ माता का पूजन करती हैं, लेकिन एक गांव ऐसा भी है जहां बैलों को आतिशबाजी कर भड़काने की अनोखी परंपरा है. जोखिम भरी इस परंपरा को साकार करने के दौरान दर्जनों लोग चोटिल भी होते हैं.
दरअसल, उपखण्ड क्षेत्र के कानूजा गांव में 60 से भी अधिक वर्षों से परंपरा चली आ रही है. इस बार भी सोमवार को इस परंपरा का उत्साहपूर्वक निर्वहन किया गया जिसमें बड़ी संख्या में स्थानीय और आस-पास के गांवों के लोगों ने हिस्सा लिया.
गांव की चौपाल पर सुबह सात बजे से ही पशुपालक अपने बैलों को लेकर पहुंचने लगते हैं. कानूजा सहित आस-पास के गांवों से दर्जनों बैलों को यहां लाया जाता है. बैलों का शृंगार किया जाता है. मेहंदी और लाल रंग लगाकर उन्हें निखारा जाता है. इसके बाद लाल और केसरिया रंग के कपड़े में नारियल, रुपये, मिठाई डालकर उस कपड़े की पोटली को बैलों के सींग पर बांध दिया जाता है.
इसके बाद आतिशबाजी कर बैलों को भड़काया जाता है. आतिशबाजी से बैल भड़क जाते हैं. वे चौपाल और गली मोहल्ले में दौड़ते हैं. युवाओं की टोली उन भड़के बैलों को पकड़कर सींगों पर बंधी पोटली हासिल करने का प्रयास करती है.
इस बीच भगदड़ में कई युवा चोटिल हो जाते हैं. इसके बावजूद वे खड़े होकर फिर से बैलों के पीछे दौड़ लगाते हैं. आयोजन में रावत समाज सहित सर्वजाति के लोग हिस्सा लेते हैं. इस भगदड़ में चोट लगने के डर से युवतियां और महिलाएं मकानों की छतों पर चढ़कर इस परंपरा को निहारती हैं.