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छत्तीसगढ़

हर महीने एक हफ्ते तक छोटी सी कोठरी में रहने को मजूबर पंडो जनजाति की महिलाएं, जानें क्यों?

aajtak.in
  • सूरजपुर ,
  • 02 जुलाई 2021,
  • अपडेटेड 7:05 PM IST
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छत्तीसगढ़ देश का एक ऐसा राज्य है जो अपने अंदर कई की विशेषताओं को समेटे हुए है, यहां पर रहने वाले आदिवासी जनजातियां और उनकी सभ्यता और संकृति ने हमेशा से लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया है. इन्हीं में एक है पंडो जनजाति जो अपने आपको खुद को एकलव्‍य का वंशज बताते हैं और देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का इन्हें दत्तक पुत्र भी कहा जाता है. 

(इनपुट- ओपी तिवारी)

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बताया जाता है कि आजादी की लड़ाई के समय डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को अंग्रेज पुलिस तलाश रही थी और अपने आप को बचाने के लिए पंडो आदिवासियों के गांव में छुप गए थे और यहां पर करीब दो साल रहे थे इस दौरान उन्होंने एक शिक्षक के रूप में काम किया था. तभी से वो इस सामज के करीब आ गए थे. 

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आजादी के बाद देश ने कई बदलाव आए लेकिन पंडो जनजाति के लोग आज भी अपनी पुरानी मान्यताओं और  रीति रिवाजों के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं. इस जनजाति के लोगों के घरों में दो दरवाजे होते हैं, एक की लंबाई और चौड़ाई सामान्य घरों जैसी होती है और दूसरे दरवाजे की लंबाई लगभग तीन से चार फिट और चौड़ाई लगभग दो फिट होती है.

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कोई महिला जब बच्चे को जन्म देने वाली होती है या उसके पीरियड्स चल रहे होते हैं तो उस महिला को छोटे से कमरे में रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है. इस दौरान महिला किसी चीज को हाथ नहीं लगाती. क्योंकि इस समाज के लोगों का मानना है कि अगर महिला इस दौरान किसी की चीज को हाथ लगा देगी तो वो अपवित्र हो जाएगी और उनके देवी देवता नाराज हो जाएंगे. 

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पीरियड्स को प्रकृति ने महिलाओं के साथ जोड़ा है. लेकिन पंडो समाज के पुरुषों की सोच इसके बिलकुल विपरीत है, उनका मानना है कि इस दौरान महिलएं अपवित्र रहती हैं और वो इस स्थिति में घर में प्रवेश करेंगी तो उनके देवी देवता नाराज हो जाएंगे. यही वजह है कि पीरियड्स के दौरान महिलाओं का घर में प्रवेश वर्जित रहता है. 

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पीरियड्स के समय परिवार के लोग उस महिला के हाथ से पानी तक नहीं पीते हैं. जिस कमरे में घुसना बेहद मुश्किल होता है पंडो महिलाएं हर महीने एक सप्ताह उस छोटे से कमरे में बिताती हैं. लेकिन इस समाज के पुरुषों को इसमें कुछ गलत नहीं लगता और वो इस रिवाज की पैरवी करते हैं. 

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समाज सेवी महिलाएं पंडों महिलाओं को मासिक धर्म को लेकर जागरूक करने का प्रयास करती हैं. लेकिन उन्हें अब तक कोई खास सफलता नहीं मिल सकी है. इस मामले पर जिला कलेक्टर का कहना है कि पंडों सामाज के लोग अपने परंपराओं को नहीं छोड़ते हैं पर सरकार की तरफ से जागरूक करने का अभियान चलाया जाता रहता है. 

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