एक कहानी ये भी: पत्नी ने बेचे गहने, पति को बनाया सरकारी टीचर, फिर खुद ने भी मेहनत से हासिल की नौकरी

'सफल आदमी के पीछे एक महिला का हाथ होता है' यह बात बिहार के जमुई जिले में रहने वाले जीतेंद्र शार्दुल पर सटीक बैठती है. बेहद गरीब परिवार में रहने वाले जीतेंद्र को उनकी पत्नी कुमारी संजना ने गहने बेचकर पढ़ाया. जब जीतेंद्र पढ़ लिखकर सरकारी टीचर बन गए तो उनकी मदद से संजना भी पढ़ने लगीं, जो खुद भी अब सरकारी नौकर हैं.

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कुमारी संजना और जीतेन्द्र शार्दुल. (फोटो:Aajtak) कुमारी संजना और जीतेन्द्र शार्दुल. (फोटो:Aajtak)

राकेश कुमार सिंह

  • जमुई ,
  • 01 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 3:45 PM IST

यूपी की एसडीएम ज्योति मौर्य और उनके पति अलोक मौर्य का विवाद इन दिनों चर्चा में है. इस विवाद के बीच बिहार के जमुई जिले से कुमारी संजना और जीतेन्द्र शार्दुल की भी एक कहानी सामने आई है. लेकिन विवादों की वजह से नहीं, बल्कि अपने संघर्ष और त्याग की वजह से. जिलेभर में पत्नी के संघर्ष के कहानी की हर कोई प्रशंसा कर रहा है.

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कहानी कुछ इस तरह से है कि साल 2002 में कुमारी संजना की शादी मैट्रिक पास बेरोजगार और गरीब युवक जीतेन्द्र शार्दुल से हुई थी. संजना के पिता बिजली विभाग में लाइन इंस्पेक्टर के पद पर मुंगेर में कार्यरत थे. कोई पुत्र न होने की वजह से संजना के पिता ने संजना की शादी जीतेन्द्र शार्दुल से घर जमाई बनाने की मंशा से तो की, लेकिन गरीब होने के बावजूद एक स्वाभिमानी व्यक्ति होने के कारण जीतेन्द्र ने अपने ससुर के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया.

लेकिन घर की आर्थिक स्थिति बेहद ही खराब होने के कारण जीतेन्द्र की पढ़ाई नहीं हो पा रही थी. लेकिन वो पढ़कर कुछ करना चाहता था. ऐसे में उसकी पत्नी संजना ने जो संघर्ष और त्याग किया वो अपने आप में काबिले-तारीफ है.  

संजना भी शादी के वक्त मैट्रिक पास ही थी. लेकिन उसकी पढ़ाई में पिता के आर्थिक रूप से संपन्न होने की वजह से कोई बाधा नहीं आई. शादी के बाद जीतेन्द्र के घरवाले उसे मजदूरी करने तक को कहा करते थे. लेकिन वो पढ़ना चाहते थे. लेकिन बाधा आ रही थी उसकी माली हालत. ऐसे में संजना ने अपने पति की पढ़ाई शुरू करवाई और किसी प्रकार की परेशानी न हो, इसके लिए संजना ने अपने सारे जेवरात बेच डाले.

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मायके से मिले जेवरात और गहने किसी भी औरत के लिए काफी प्यारे होते हैं और हर कोई उसे संभाल कर रखना चाहती है, लेकिन उसने अपने पति की खुशी के लिए संजना ने सारे जेवर बेच दिए. 

परिणाम ये हुआ कि  साल 2007 में जीतेन्द्र को सरकारी नौकरी मिल गई. जीतेन्द्र साल 2007 से वर्तमान तक से जमुई प्रखंड के कल्याणपुर मध्य विद्यालय में शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं. इस बीच संजना ने भी अपनी पढ़ाई जारी रखी और अपनी मेहनत से साल 2014 में सरकारी नौकरी पा ली. संजना अभी खैरा प्रखंड में आवास सहायिका के पद पर कार्यरत हैं.  

AajTak संवाददाता ने जब कुमारी संजना और जीतेन्द्र शार्दुल से उसके संघर्ष, त्याग, तपस्या की कहानी के बारे में बात की, तो एक समय ऐसा आया कि जब दोनों की आंखों से आंसू छलक आए.

संजना ने अपने पुराने दिनों की कुछ बातों को तो शेयर किया, लेकिन कुछ बातें इतनी पीड़ादायक थीं जिन्हें बयां कर पाना उन्होंने उचित नहीं समझा. लेकिन जीतेन्द्र ने जो कहा, सच में काफी पीड़ादायक लगा.

जीतेन्द्र ने अपनी गरीबी का एक उदाहरण देते हुए बताया,  घर में जब खाना बनाने की नौबत आती थी, तो जलावन (लकड़ी इत्यादि) नहीं होने के कारण उनकी मां सड़क पर फेंकी हुईं चप्पलों तक को चूल्हे में जलाने के लिए समेट लाती थीं. तब जाकर रोटी बनती थी. इन बातों को कहते-कहते जीतेन्द्र और संजना भावुक हो गए. अब दोनों अपने परिवार के साथ काफी खुश हैं.

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जीतेन्द्र और संजना इन दिनों अपने बनाए गए इंस्टाग्राम रील्स की वजह से काफी चर्चा में हैं. स्कूल से घर आने के बाद दोनों कभी रील भी बनाते हैं जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल होते हैं. जीतेन्द्र सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के नए-नए तरीकों की वजह से भी खूब सुर्खियां बटोर रहे हैं.  देखें इंटरव्यू का Video:-

 

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