न यूट्रस, न ओवरी, पुरुषों वाले क्रोमोसोम... हाई कोर्ट तक क्यों पहुंचा महिला डॉक्टर का अनोखा मामला

32 वर्षीय महिला डॉक्टर को दुर्लभ जेनेटिक बीमारी के कारण नेचुरल कंसीव नहीं कर पा रही थी. ऐसे में हेल्थ डिपोर्टमेंट ने उसे सरोगेसी का एलिजिबिलिटी सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया था. इस पर तेलंगाना हाईकोर्ट ने फैसला दिया है.

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सरोगेसी के लिए हेल्थ डिपार्टमेंट से सर्टिफिकेट लेना होता है. (Photo: ITG) सरोगेसी के लिए हेल्थ डिपार्टमेंट से सर्टिफिकेट लेना होता है. (Photo: ITG)

आजतक हेल्थ डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 09 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:35 PM IST

मां बनना हर महिला का सपना होता है लेकिन कुछ महिलाओं में फिजिकल कंडिशन के कारण ऐसा होना मुश्किल हो जाता है. कुछ समय पहले हैदराबाद की एक 32 साल की महिला डॉक्टर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. दरअसल, उन्हें दुर्लभ जेनेटिक बीमारी की वजह से उनके शरीर में न तो गर्भाशय (यूट्रस) था और न ही अंडाशय (ओवरी). इस वजह से हेल्थ डिपार्टमेंट ने उन्हें सरोगेसी की परमिशन देने से साफ मना कर दिया गया. अब तेलंगाना हाईकोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल टेक्निकल कमियों या क्रोमोसोम की स्थिति के आधार पर किसी कपल को माता-पिता बनने से नहीं रोका जा सकता.

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क्या है पूरा मामला?

हैदराबाद की महिला डॉक्टर की शादी एक बिजनेसमैन के साथ 2021 में हुई थी. शादी के बाद उन्हें पता चला कि महिला को कंपलीट एण्ड्रोजन इनसेंसेटिविटी सिंड्रोम (CAIS) नाम की एक दुर्लभ बीमारी है. इस मेडिकल कंडिशन में महिला के शरीर में यूट्रस और ओवरी विकसित नहीं होती.

महिला की टेस्ट रिपोर्ट में उनके क्रोमोसोम '46 XY' पाए गए जो आमतौर पर पुरुषों में होते हैं. इसी रिपोर्ट को आधार बनाकर हेल्थ डिपार्टमेंट ने उन्हें सरोगेसी के लिए जरूरी सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया था.

क्या है कंप्लीट एण्ड्रोजन इनसेंसेटिविटी सिंड्रोम?

कंप्लीट एण्ड्रोजन इनसेंसेटिविटी सिंड्रोम एक ऐसी जेनेटिक कंडिशन है जिसमें कोई व्यक्ति जेनेटिक तौर पर पुरुष (XY क्रोमोसोम) होता है लेकिन उसका शरीर एक महिला जैसा दिखता है. इसमें शरीर में पुरुष हार्मोन (एंड्रोजन) तो बनते हैं लेकिन शरीर की कोशिकाएं उनके प्रति कोई रिस्पॉन्स नहीं देतीं, जिससे मेल ऑर्गन विकसित नहीं हो पाते.

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जन्म के समय बच्चा बाहर से पूरी तरह लड़की जैसा दिखता है और उसकी परवरिश भी एक लड़की की तरह ही होती है. अक्सर इस स्थिति का पता प्यूबर्टी में चलता है जब लड़की को पीरियड्स शुरू नहीं होते क्योंकि शरीर के अंदर गर्भाशय (यूट्रस) और अंडाशय (ओवरीज) ही नहीं होते. यूट्रस न होने के कारण ये महिलाएं नेचुरल रूप से प्रेग्नेंट नहीं हो सकतीं लेकिन यह एक सामान्य महिला की तरह ही जीवन जीती हैं.

अधिकारियों ने क्यों लगाया अड़ंगा?

हेल्थ डिपार्टमेंट ने तर्क देते हुए कहा था कि सरोगेसी कानून के हिसाब से एक कपल का मतलब 'बायोलॉजिकल पुरुष' और 'बायोलॉजिकल महिला' होता है. लेकिन महिला के क्रोमोसोम 'XY' (पुरुषों वाले) हैं इसलिए वह सरोगेसी रूल्स के तहत फिट नहीं बैठतीं. इसी वजह से उन्हें 'एलिजिबिलिटी सर्टिफिकेट' देने से मना कर दिया गया था जिससे उनके मां बनने का रास्ता बंद हो गया था.

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस नागेश भीमापाका ने इस मामले की सुनवाई करते हुए फैसले को गलत बताया और कहा कि याचिकाकर्ता फिजिकली रूप से महिला हैं और एक नॉर्मल शादीशुदा जिंदगी बिता रही है. हर कपल को माता-पिता बनने का पूरा हक है. सिर्फ क्रोमोसोम के आधार पर किसी को एलिजिबिलिटी सर्टिफिकेट न देना गलत है. ऐसा करना कानून बनाने के मकसद को ही खत्म कर देगा.

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अब पूरा होगा मां बनने का सपना

हाईकोर्ट ने हेल्थ डिपार्टमेंट को आदेश दिया है कि वे महिला को तुरंत सरोगेसी के लिए जरूरी सर्टिफिकेट जारी करें. कोर्ट ने माना कि सरोगेसी कानून का मकसद ही उन कपल्स की मदद करना है जो किसी बीमारियों की वजह से नेचुरली कंसीव नहीं कर सकते. इस फैसले के बाद अब इस कपल को एलिजिबिलिटी सर्टिफिकेट मिल जाएगा.

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