'मां…मेरा दम घुट रहा है...', नवजात बच्चों के फेफड़ों को खोखला कर रही हवा, लंग्स को ऐसे नुकसान पहुंचा रहा PM 2.5

दिल्ली की सर्दियों में हवा में मौजूद PM2.5 कण बच्चों के फेफड़ों में 40 प्रतिशत तक पहुंच जाते हैं जो सांस की गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं. इस बारे में एक्सपर्ट का क्या कहना है, इस बारे में जानेंगे.

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दिल्ली की हवा में PM2.5 की मात्रा अधिक है. (Photo: AI Generated) दिल्ली की हवा में PM2.5 की मात्रा अधिक है. (Photo: AI Generated)

आजतक हेल्थ डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 19 नवंबर 2025,
  • अपडेटेड 9:48 PM IST

Why PM 2.5 is more dangerous for children: दिल्ली की सर्दियों में हवा जहरीली हो जाती है और ऐसे में हवा में मौजूद प्रदूषित कण PM2.5 एक ऐसा किलर है जो सबसे ज़्यादा नुकसान बच्चों को पहुंचाता है. दरअसल, यह कण बच्चों की सांस से 40 प्रतिशत सीधे उनके फेफड़ों तक पहुंच जाता है. यह बात हाल ही में हुई एक स्टडी में भी सामने आई है कि खराब हवा के कारण सिर्फ बच्चों का आज खराब नहीं हो रहा है बल्कि इसके कारण उनको भविष्य में और भी गंभीर फेफड़ों की बीमारियां हो सकती हैं. तो आइए ये स्टडी क्या कहती है और इस पॉल्यूशन के बारे में एक्सपर्ट्स का क्या कहना है, इस बारे में जान लीजिए.

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क्या कहती है स्टडी?

स्टडी में कहा गया है कि 8–9 साल के बच्चों में PM2.5 40 प्रतिशत तक सीधा फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाती है और ये फेफड़ों का वही हिस्सा होता है जहां प्रदूषण सबसे लंबे समय तक अटका रहता है और जिसे साफ होने में भी काफी समय लगता है.

डायरेक्ट साइंस में पब्लिश हुए पीयर-रिव्यू का कहना है कि दिल्ली जैसी प्रदूषित हवा में मौजूद अत्याधिक बारीक कण यानी PM2.5 बच्चों के फेफड़ों में सीधे घुसकर उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं. ये कण सिर्फ बड़े बच्चे ही नहीं बल्कि शिशुओं के फेफड़ों में भी जा रहे हैं और PM2.5 का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा उनके लंग्स की गहराई में पहुंच जाता है.

हालांकि स्टडी में ये भी कहा गया है कि PM10 जैसे मोटे कणों का मुश्किल से 1 प्रतिशत ही लंग्स तक पहुंच रहा है यानी कि बच्चों की सांसों के लिए असली जहर PM10 नहीं बल्कि PM2.5 है.

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PM2.5 क्यों है अधिक खतरनाक?

स्टडी का कहना है कि PM10 कणों का अधिकतर हिस्सा नाक या गले में ही फंस जाता है लेकिन PM2.5 बच्चों की हवा वाली नलियों के आर-पार निकलकर फेफड़ों के सबसे गहरे हिस्से में जम जाता है और वहां जाकर ये कई महीनों तक चिपका रहता है. यही कारण है कि डॉक्टर्स का मानना है कि infancy से लेकर adolescence तक बच्चों के लिए PM2.5 सबसे बड़ा दुश्मन है.

स्टडी के मुताबिक, PM10 का 55–95 प्रतिशत हिस्सा सिर, नाक और गले में जमा होता है और 3–44 प्रतिशत हिस्सा सांस की नलियों में जमा होता है. PM2.5 का 36–63 प्रतिशत हिस्सा सिर/नाक में और 28–52.7 प्रतिशत हिस्सा फेफड़ों की गहराई में जमा होता है.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

सेंट्रल फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (CREA) के डॉ. मनोज कुमार का कहना है. 'मेरी पीयर-रिव्यू स्टडी (2019) में 8–9 साल के बच्चों में पल्मोनरी डिपोजिशन 0.40 पाया गया था यानी 40 प्रतिशत PM2.5 फेफड़ों में सबसे अंदर तक जमा होता है. PM2.5 हर लिंग और उम्र के लोगों के सभी 5 लोब में सबसे ज्यादा पाया गया था.

डॉ. मनोज का कहना है, 'बच्चों को बचाना है तो PM2.5 कम करना ही पहली प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि यही वो कण हैं जो लंग्स की गहराई में जाते हैं और सबसे अधिक समय तक लंग्स को नुकसान पहुंचाते रहते हैं.'

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स्टडी में यह भी सामने आया कि 8 साल के बच्चों के फेफड़ों में ये कण सबसे अधिक जमा होते हैं जबकि 28 महीने के शिशुओं में सबसे कम. लेकिन दोनों में PM2.5 की मात्रा PM10 से कई गुना अधिक होती है.

फेफड़ों के निचले हिस्सों में सबसे ज्यादा कण जमा पाए गए थे जहां करीब 66 प्रतिशत कण जमा थे. फेफड़े के निचले हिस्से में 66.4 प्रतिशत ऊपरी हिस्से में 27.2 प्रतिशत और बीच वाले हिस्से में 6.4 प्रतिशत प्रदूषण जमा होता है.

सबसे खतरनाक हिस्सा यह है कि फेफड़ों के गहरे हिस्से अपनी क्लीनिंग नहीं कर पाते. यानी एक बार PM2.5 वहां पहुंच गया तो आसानी से नहीं निकलता. आगे चलकर यही कण लंबे समय में टॉक्सिसिटी, सूजन और फेफड़ों की बीमारियों की कारण बन सकते हैं.

दिल्ली की हवा प्रदूषण के लिए PM2.5 जिम्मेदार

दिल्ली की सर्दियों में हवा में फैले प्रदूषण का सबसे बड़ा जिम्मेदार PM10 नहीं बल्कि PM2.5 है. यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे काफी खतरनाक बता रहे हैं. प्राप्त आंकड़े हताते हैं कि सर्दियों के दौरान दिल्ली के कुल पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण में से 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ PM2.5 का होता है और यही कण सबसे ज्यादा जहरीले हैं. इसी कारण एक्सपर्ट नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम 2.0 (NCAP 2.0) को एक मौका मानते हैं जिससे PM2.5 पर फोकस किया जा सकता है.

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क्या कहते हैं 30 दिन के आंकड़े

18 अक्टूबर से 16 नवंबर तक 30 दिनों के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली की हवा में हर दिन प्रमुख प्रदूषक के तौर पर PM2.5 ही दिखा है. विशेषज्ञों के मुताबिक जब हवा में PM2.5 अधिक होता है तो इसका मतलब है कि प्रदूषण के सोर्स सड़क की धूल या कंस्ट्रक्शन नहीं बल्कि गाड़ियां, इंडस्ट्रीज, पावर प्लांट, कचरा जलाना और सेकेंडरी प्रदूषण होते हैं. ऐसे में भी जो नियम हैं वो अभी भी सिर्फ धूल को दबाने पर काम करती हैं जिसका कोई मतलब नहीं है.

डॉ. कुमार का कहना है कि मौजूदा डस्ट-कंट्रोल तरीके असली कारण को कम नहीं कर रहे हैं. जब तक PM2.5 के वास्तविक कारणों पर काम नहीं किया जाएगा, दिल्ली की हवा में सुधार की उम्मीद नहीं की जा सकती.

इनपुट: मिलन शर्मा

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