फैक्ट चेक: जामिया यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में 'सिर्फ' मुस्लिम छात्रों को फ्री में सिविल सर्विस कोचिंग पढ़ाए जाने की बात है भ्रामक, जानें इसकी असलियत

सोशल मीडिया पर एक तस्वीर को शेयर करते हुए कुछ लोग कह रहे हैं कि ये जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय का एक हॉस्टल है जहां सिर्फ मुस्लिम छात्रों को ही फ्री में सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी कराई जाती है. यह दावा भ्रामक है. जानें सच्चाई...

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आजतक फैक्ट चेक

दावा
ये जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के एक हॉस्टल की फोटो है जहां सिर्फ मुस्लिम छात्रों के लिए फ्री सिविल सर्विस कोचिंग की सुविधा है.
सच्चाई
ये जामिया के जम्मू-कश्मीर हॉस्टल की फोटो है. स्टूडेंट्स को इसकी सुविधा धर्म के आधार पर दिए जाने की बात पूरी तरह गलत है. जामिया में निशुल्क सिविल सर्विस कोचिंग भी पढ़ाई जाती है, लेकिन इसके लिए भी सभी धर्मों के छात्र आवेदन कर सकते हैं.

विकास भदौरिया

  • नई दिल्ली,
  • 25 मई 2023,
  • अपडेटेड 1:03 PM IST

बहुमंजिला इमारत की एक तस्वीर को शेयर करते हुए कुछ लोग कह रहे हैं कि ये जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय का एक हॉस्टल है जहां सिर्फ मुस्लिम छात्रों को ही फ्री में सिविल सर्विस परीक्षा की तैयारी कराई जाती है.

फोटो में दिख रही इमारत के मुख्य द्वार पर लिखा है, "J&K Hostel".

इस फोटो को पोस्ट करते हुए एक व्यक्ति ने , 'ये जामिया मिल्लिया का होस्टल है जहां 400 बिस्तर की सुविधा है, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि यहां पर सिर्फ अल्पसंख्यक ही आईएएस बनने के लिए मुफ्त पढाई कर सकते हैं, वो भी हमारे टैक्स के पैसों पर, खैर हमें क्या सबका साथ सबका विकास का उदाहरण कल हम कर्नाटक और मणिपुर में देख ही चुके हैं.'

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ऐसे ही एक पोस्ट का देखा जा सकता है.

इंडिया टुडे फैक्ट चेक ने पाया कि ये जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के दिल्ली स्थित जम्मू-कश्मीर हॉस्टल की तस्वीर है. इस हॉस्टल की सुविधा छात्रों को धर्म के आधार पर दिए जाने की बात पूरी तरह गलत है.  

यहां ये बताना जरूरी है कि जामिया मिल्लिया का एक ऐसा कोचिंग सेंटर है जहां छात्रों को सिविल सर्विस की निशुल्क कोचिंग दी जाती है. लेकिन ये सुविधा सिर्फ अल्पसंख्यकों को ही नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला उम्मीदवारों को भी दी जाती है.

कैसे पता लगाई सच्चाई?

हमने सबसे पहले वायरल फोटो को रिवर्स सर्च किया. ऐसा करने से हमें ये तस्वीर जम्मू-कश्मीर पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के युवा अध्यक्ष वहीद पारा के  में मिली जिसे 30 अप्रैल, 2018 को पोस्ट किया गया था. वायरल तस्वीर के अलावा J&K छात्रावास की और भी तस्वीरों को शेयर करते हुए उन्होंने अंग्रेजी में लिखा था, "एक लंबे इंतजार के बाद दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में जम्मू-कश्मीर छात्रावास बनकर तैयार हो गया है. इसके लिए महबूबा मुफ्ती और भारत के गृह मंत्रालय का शुक्रिया.'

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कौन कर सकता है इस हॉस्टल में रहने के लिए आवेदन?  

इसके बाद हमने जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर दिए गए  को पढ़ा. उसमें दी गई जानकारी के मुताबिक 700 बिस्तर वाले इस हॉस्टल का उद्घाटन साल 2017 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने किया था.

इस हॉस्टल में दाखिला मेरिट और पॉइंट-बेस्ड सिस्टम के आधार पर होता है जिसकी जानकारी विस्तार से इस मैनुअल में दी गई है. इसके मुताबिक विश्वविद्यालय जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व की छात्राओं को तरजीह देता है. लेकिन दूसरे राज्य के छात्र भी इसके लिए आवेदन कर सकते हैं. उनके चयन के लिए उनके स्थानीय आवास की दिल्ली-एनसीआर से दूरी के आधार पर उन्हें 7 से 10 के बीच में पॉइंट दिए जाते हैं.

इस हॉस्टल में एनआरआई और शारीरिक रूप से विकलांग छात्रों को छोड़ कर किसी भी धर्म या पहचान के आधार पर सीटें आरक्षित नहीं हैं. 

जामिया की फ्री सिविल सर्विस कोचिंग सुविधा के नियम

अगर जामिया की आवासीय कोचिंग अकादमी (Jamia Millia Islamia Residential Coaching Academy) की बात करें, जहां छात्रों को सिविल सर्विस की निशुल्क कोचिंग दी जाती है, तो वहां भी धर्म के आधार पर ऐसा कोई आरक्षण नहीं है. लेकिन  अल्पसंख्यक, एससी, एसटी और महिला छात्रों के लिए है.  

यहां केवल वही छात्र आवेदन कर सकते हैं जिन्होंने सिविल सर्विस की प्रारम्भिक परीक्षा (प्रीलिम्स) को क्लियर किया है. उनका चयन परीक्षा और इंटरव्यू के आधार पर बने मेरिट से होता है. 2016, 2017 और 2018 में इस फ्री कोचिंग के लिए चुने गए छात्रों की लिस्ट ,   और  देख सकते हैं.

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इस स्टोरी के लिखे जाने से कुछ घंटों पहले ही यूपीएससी ने 2022 सिविल सर्विस के फाइनल रिजल्ट की घोषणा की. हॉस्टल के एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर हमें इस साल जामिया की कोचिंग अकादमी से चयनित हुए 23 छात्रों के नामों की लिस्ट भेजी. इस लिस्ट में कम से कम 11 गैर-मुस्लिम छात्र हैं.

साल 2011 में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग (NCMEI) ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय को  का दर्जा दिया था. 1920 में शुरू हुए इस विश्वविद्यालय को 1988 में संसद के एक अधिनियम द्वारा एक केंद्रीय विश्वविद्यालय घोषित किया गया था, जिसके चलते अब वहां मुस्लिम छात्रों के लिए 50 प्रतिशत तक सीटें आरक्षित रखने का प्रावधान है. इस दर्जे के खिलाफ 2018 में, भाजपा शासित केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक हलफनामा दायर कर उसे चुनौती दी थी.

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