एक वायरल वीडियो के जरिये सोशल मीडिया पर ऐसा कहा जा रहा है कि इन दिनों कार साफ करने के बहाने फास्टैग से पैसे चुराने वाला गैंग सक्रिय है. इसे कई सारे लोग सच्ची घटना का वीडियो बता रहे हैं.
वीडियो में एक बच्चा कार का शीशा साफ करने के बहाने, उस पर लगे फास्टैग स्टिकर को अपनी घड़ी से स्कैन करता है. इसके बाद वो तुरंत वहां से जाने लगता है. कार में बैठे दो लोगों को ये बात अटपटी लगती है कि उसने कार साफ करने के पैसे क्यों नहीं मांगे. वो उसे बुलाकर पूछताछ शुरू करते हैं. अचानक बच्चा भागने लगता है और पीछा करने पर भी पकड़ में नहीं आता.
इसके बाद कार चला रहा व्यक्ति अपने साथी को बताता है कि ये दरअसल फास्टैग के जरिये ठगी करने का एक नया तरीका है.
इस करते हुए एक ट्विटर यूजर ने लिखा, @paytm, मैं आपका फास्टैग इस्तेमाल करता हूं. देखिये ये बच्चा कैसे एक स्मार्टवॉच के जरिये फास्टैग से पैसे चुरा रहा है. ऐसे ठगों से मेरे पैसे को सुरक्षित रखने के लिए आप क्या कदम उठा रहे हैं?
ऐसी ही कुछ पोस्ट्स का आर्काइव्ड और देखा जा सकता है.
हमने अपनी जांच में पाया कि ये किसी असली घटना का नहीं बल्कि एक स्क्रिप्टेड वीडियो है. इस वीडियो में काम करने वाले एक एक्टर अनुभव गोली ने 'आजतक' से बातचीत में इस बात की पुष्टि की है.
कैसे काम करता है फास्टैग?
फास्टैग एक तरह का प्रीपेड टैग है जिसके जरिये टोल टैक्स लिया जाता है. इसे वाहनों के सामने वाले शीशे पर लगाया जाता है. हर टोल प्लाजा पर लगे कैमरों से ये स्कैन होता है जिसके बाद वाहन मालिक के अकाउंट या ई-वॉलेट से टोल टैक्स के पैसे कट जाते हैं. फास्टैग में रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) का इस्तेमाल किया जाता है.
1 दिसंबर 2019 से राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले सभी चार पहिया वाहनों पर फास्टैग (FASTag) लगाना अनिवार्य कर दिया गया था.
क्या है वीडियो की कहानी?
कई फेसबुक अकाउंट्स ने इस वीडियो को शेयर करते हुए नाम के एक फेसबुक पेज को टैग किया है. इस पेज पर हमें वायरल वीडियो मिल गया. यहां वीडियो के साथ एक डिस्लेमर भी दिया गया था जिस पर लिखा था, "ये सामाजिक जागरूकता के लिए बनाया गया एक स्क्रिप्टेड वीडियो है". अब इस पेज ये वीडियो डिलीट हो चुका है.
इस वायरल को ऐसे ही कई और दूसरे स्क्रिप्टेड वीडियोज में देखा जा सकता है.
हमने इस वीडियो में दिख रहे से बात की. उन्होंने हमें बताया कि ये वीडियो सिर्फ जागरूकता फैलाने के लिए बनाया गया था. इसकी शूटिंग मेरठ में हुई थी. लेकिन जब इसे लेकर सोशल मीडिया पर बवाल हुआ और पेटीएम-फास्टैग की तरफ से आधिकारिक स्पष्टीकरण आ गया, तो उसके बाद "Baklol Video" की टीम ने इसे हटा देना ही सही समझा.
अनुभव ने हमें ये भी बताया कि उनकी टीम ने फास्टैग ठगी से जुड़ी कुछ मीडिया रिपोर्ट्स को देखने के बाद ये वीडियो बनाने का फैसला किया था. उदाहरण के तौर पर हमें के कानपुर संस्करण में 23 जून को छपी एक खबर की क्लिपिंग भेजी.
इस खबर के मुताबिक कानपुर में सक्रिय एक गिरोह कुछ गैजेट्स की मदद से वाहनों के फास्टैग को स्कैन करता है और उससे लिंक खाते से पैसे चुरा लेता है. इस काम के लिए वो रेड लाइट पर शीशा साफ करने वाले बच्चों का इस्तेमाल करता है.
इस रिपोर्ट में ऐसी तीन घटनाओं का जिक्र है जिनमें लोग फास्टैग ठगी का शिकार हुए.
साल 2020 में भी एक सामने आई थी जब मानेसर टोल प्लाजा पर एक व्यक्ति के फास्टैग से जुड़े अकाउंट से पैसे कट गए थे, जबकि उसकी कार चंडीगढ़ में खड़ी थी.
हालांकि हम इन खबरों की प्रामाणिकता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करते.
क्या कहना है कानपुर पुलिस का?
दैनिक जागरण आईनेस्स्ट में छपी खबर में फास्टैग ठगी की जिन घटनाओं का जिक्र है, उनके बारे में और जानकारी पाने के लिए हमने यूपी पुलिस के कुछ अधिकारियों से संपर्क किया. यूपी साइबर क्राइम के एडिशनल एसपी सच्चिदानंद ने कहा, 'हमें ऐसे वीडियो मिले हैं कि कैसे फास्टैग खातों से धोखाधड़ी करके पैसे काटे गए. हालांकि, ये सभी फर्जी हैं.'
वहीं इस बारे में साइबर क्राइम एसपी त्रिवेणी सिंह का कहना था कि फास्टैग को हैक करना तकनीकी रूप से असंभव है. उन्होंने 'आजतक' को बताया, 'ये निराधार है और इस संबंध में अभी तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई है. हम इस अफवाह की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं.'
सरकार ने भी दिया स्पष्टीकरण
एनपीसीआई (भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम ) के मुताबिक, फास्टैग को इस तरह बनाया गया है कि इसमें पैसा वाहन चालक के खाते से मर्चेंट के खाते में ही जा सकता है. किसी व्यक्ति के खाते से किसी दूसरे शख्स के खाते में पैसा जाना संभव नहीं है.
पीआईबी फैक्ट चेक ने भी अपने ट्वीट में इस वीडियो को फर्जी बताया है.
पेटीएम ने कहा है कि फास्टैग के जरिये सिर्फ अधिकृत मर्चेंट्स ही पैसे काट सकते हैं.
टेक एक्सपर्ट्स की राय
इस बारे में हमने कई एथिकल हैकर्स और टेक्नोलॉजी के विशेषज्ञों से भी बात की. एथिकल हैकर सनी नेहरा ने हमें बताया, 'इस वीडियो में दिख रहा है कि एक बच्चा स्मार्टवॉच के साथ किसी अंजान जगह पर घूम रहा है जो कि टोल प्लाजा नहीं है. पर गाड़ी में बैठा व्यक्ति कहता है कि उसके पैसे कट गए हैं. ऐसा फास्टैग से होना असंभव है.'
सनी के मुताबिक हर टोल प्लाजा की एक अलग आईडी होती है. हर भुगतान से पहले सिस्टम इस आईडी को चेक करता है और अगर ये सरकार के पास दर्ज न हो तो भुगतान नहीं हो सकता.
हमने इंडिपेंडेंट सिक्योरिटी रिसर्चर करण सैनी से भी संपर्क किया. उन्होंने ‘आजतक’ को बताया, 'आरएफआईडी कार्ड को इस तरह बनाया जाता है कि उसकी क्लोनिंग बहुत ज्यादा मुश्किल हो. लेकिन जब तक ये बात किसी शोध में साबित नहीं हो जाती कि फास्टैग की क्लोनिंग नहीं हो सकती, ये एकदम पक्के तौर पर कहना थोड़ा मुश्किल है.'
हम स्वतंत्र रूप से इस बात की पुष्टि नहीं कर सकते कि इस तरह की हैकिंग असल में हो सकती है नहीं. लेकिन, इतनी बात पक्की है कि एक स्क्रिप्टेड वीडियो को असली घटना बताते हुए शेयर किया जा रहा है जिससे लोगों में भ्रम फैल रहा है.
(रिपोर्ट: बेच्चू एस. और ऋद्धीश दत्ता)
(इनपुट: संजना सक्सेना)
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