अमेरिका के मुकाबले डेनमार्क के पास कितनी सैन्य शक्ति, क्या पूरा यूरोप 'सेव ग्रीनलैंड' की मुहिम में जुट जाएगा?

डेनमार्क के पास लगभग पच्चीस हजार सैनिक हैं. रिजर्व और होम गार्ड्स को मिलाकर ये संख्या अस्सी हजार तक पहुंच जाती है. ग्लोबल फायरपावर इंडेक्स के अनुसार डेनिश बल दुनिया में 45वें स्थान पर है. यानी अमेरिका से बहुत-बहुत नीचे. दूसरी तरफ जिस ग्रीनलैंड की ये सुरक्षा कर रहा है, उस देश की कुल आबादी ही साठ हजार से कम है, सेना तो दूर की बात.

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रणनीतिक और व्यापारिक वजहों से अमेरिका चाहता है कि ग्रीनलैंड पर उसका हक हो. (Photo- AP) रणनीतिक और व्यापारिक वजहों से अमेरिका चाहता है कि ग्रीनलैंड पर उसका हक हो. (Photo- AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 15 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 5:45 PM IST

डोनाल्ड ट्रंप को ग्रीनलैंड चाहिए. पहले वे इसे मजाक-मजाक में कहते रहे. फिर कीमत चुकाने की बात की. अब सैन्य बल इस्तेमाल करने तक पहुंच चुके. हालात ये हैं कि डेनमार्क के तहत आते इस अर्ध स्वायत्त देश को बचाने के लिए NATO के कई सदस्य देश अपनी सेनाएं भेजने लगे. खुद डेनमार्क के पास ऐसी कोई फोर्स नहीं, जो ज्यादा समय अमेरिका के आगे टिक सके. मामला अब यूएस vs यूरोप होने जा रहा है.

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ग्रीनलैंड अमेरिका को क्यों चाहिए, ट्रंप प्रशासन इसकी कई वजहें गिना रहा है.

इसमें एक कारण सुरक्षा भी है. बकौल ट्रंप, यहां से रूस पर नजर रखना और यूरोप की रक्षा करना दोनों ही आसान हो जाएगा. लेकिन जितनी सुनाई दे रही है, बात उतनी मासूम है नहीं.

हर बात को नेशनल सिक्योरिटी का मुद्दा बनाता अमेरिका असल में रणनीतिक और व्यापारिक वजहों से इस देश को हड़पने के फेर में है. ट्रंप इशारा दे चुके कि सीधे बात न बनी तो 'हार्ड वेज' भी अपनाए जा सकते हैं. 

इसी संकेत के बाद डेनमार्क समेत यूरोप के कई देश ग्रीनलैंड की तरफ आ रहे हैं. डेनमार्क के रक्षा मंत्री ट्रोल्स पॉलसन ने कहा कि आर्कटिक इलाके की सुरक्षा डेनमार्क और उसके सहयोगी देशों के लिए बहुत जरूरी है. इसलिए दोस्त देशों के साथ मिलकर वहां की ताकत और बढ़ाई जाएगी. माना जा रहा है कि आने वाले हफ्तों में डेनिश के साथ वहां यूरोप की सेनाएं भी मौजूदगी बढ़ाएंगी. स्वीडन, नीदरलैंड, कनाडा और जर्मनी के रक्षा विभाग इसपर हामी भर चुके हैं. 

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इस सारे हो-हल्ले के बीच ग्रीनलैंड के पीएम जेन्स फ्रेडरिक नील्सन ने मंगलवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अगर  हमें अमेरिका और डेनमार्क में से किसी एक को चुनना पड़े, तो हम डेनमार्क को चुनेंगे. मतलब साफ है कि तलवारें खिंच सकती हैं अगर अमेरिका पीछे न हटे.

फ्रांस और जर्मनी सहित नाटो देशों के सैनिक ग्रीनलैंड में सुरक्षा बढ़ाने के लिए पहुंच रहे हैं. (Photo- AP)

इस बीच ये बात भी आ रही है कि बेहद छोटे इन देशों के पास कितनी सैन्य ताकत है और अगर यूरोप भी साथ आ जाए तो क्या सब मिलकर यूएस से मुकाबला कर सकेंगे, या इससे पहले भी मामला पलट जाएगा.

ग्लोबल फायरपावर की 2025 रैंकिंग के मुताबिक डेनमार्क दुनिया के 145 देशों में 45वें नंबर पर है. यानी उसकी सेना न बहुत बड़ी है, न बहुत कमजोर, बल्कि बीच के स्तर की मानी जाती है. 

डेनिश सेना में करीब 80 हजार सैनिक हैं. इसमें थल सेना, नौसेना और वायुसेना शामिल हैं. देश के पास करीब 31 लड़ाकू विमान, 34 हेलिकॉप्टर और 9 युद्धपोत हैं. इसका मकसद देश की रक्षा, नाटो की जिम्मेदारियां निभाना और इंटरनेशनल मिशन्स में हिस्सा लेना है, न कि बड़ी ताकत बनना. ग्रीनलैंड में डेनमार्क की सेना की मौजूदगी जॉइंट आर्कटिक कमांड संभालती है. यह यूनिट इलाके की निगरानी करती है, लोगों को ढूंढने और बचाने का काम करती है, गश्त लगाती है और नाटो देशों के साथ मिलकर काम करती है.

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इसके अलावा डॉग स्लेज पेट्रोल जैसी खास यूनिट भी है, जो स्लेज से दूर-दराज आर्कटिक इलाकों में गश्त करती है. 

इन तमाम साजो-सामान के बाद भी अमेरिका के सामने डेनिश बल बहुत छोटा है. यूएस के सामने सब मिलाकर 20 लाख से ज्यादा फोर्स है. वायु और नौसेना बेहद मॉडर्न है और यह दुनिया के सबसे ज्यादा बजट वाली सेना है. यहां तक कि ग्रीनलैंड में अमेरिका का भी एक सैन्य ठिकाना भी है, जिसे पिटफिक स्पेस बेस कहते हैं. यहां मिसाइल चेतावनी और अंतरिक्ष निगरानी से जुड़े सिस्टम लगे हैं. 

अमेरिका ग्रीनलैंड को पाने के लिए नेशनल सिक्योरिटी का हवाला दे रहा है. (Photo- Reuters)

क्या ग्रीनलैंड को बचाने के लिए यूरोप डेनमार्क के साथ आकर अमेरिका से भिड़ सकता है? 

कई नाटो देशों के नेताओं ने साफ कहा कि अमेरिका अगर ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की बात करता है, तो इससे गठबंधन टूट सकता है. सेनाएं भेजने पर भी कई देश हामी भर चुके लेकिन यूरोप भी यूएस से सीधे मुकाबला करने की स्थिति में नहीं. ये सिर्फ सैन्य बल की बात नहीं. कानूनी तौर पर ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है. यूरोपीय देश डेनमार्क की संप्रभुता का सपोर्ट करेंगे, लेकिन यह समर्थन कूटनीतिक और राजनीतिक दबाव की तरह होगा, न कि युद्ध के रूप में.

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एक सच ये है कि अमेरिका की सैन्य शक्ति यूरोप काफी  ज्यादा है. कोई भी यूरोपीय देश अमेरिका से सीधे टकराव का जोखिम नहीं लेगा, न ही वे मिलकर ऐसा फैसला ले सकते हैं. कई यूरोपीय देशों के हित सीधे-सीधे यूएस से जुड़े हैं. वे जानते हैं कि वॉशिंगटन से दूरी का मतलब चीन या रूस जैसे किसी भी देश के सामने कमजोर पड़ जाना.

फिलहाल रूस भी उग्र रूप दिखाए हुए है. ऐसे में यूरोप चाहे भीतर-भीतर जितनी बयानबाजी कर ले, लेकिन वॉशिंगटन से टक्कर कोई नहीं लेगा. ये कुछ वैसा ही है, जैसे घर के कमाऊ मुखिया से लाख नाराजगी हो, लेकिन बाहर उसकी बुराई से सदस्य बचते हैं क्योंकि उनके फायदे उससे जुड़े होते हैं. 

एकाएक देशों की सेनाओं का वहां पहुंचना लड़ाई की तैयारी नहीं, बल्कि संतुलन दिखाना है. रूस ने आर्कटिक में अपनी सैन्य गतिविधि बढ़ाई है और चीन भी इस इलाके में दिलचस्पी दिखा रहा है. ऐसे में नाटो देश यह दिखाना चाहते हैं कि आर्कटिक खाली नहीं है कि कोई भी देश कब्जा कर ले. यह समय नाटो को एकजुट दिखाने का भी है ताकि कोई उन्हें हल्के में न ले. 

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