'बॉर्डर 2' नहीं करती भारत के जवानों संग न्याय, सनी देओल की पिक्चर ने किया निराश

मेरे पिता ने भारतीय आर्मी में सर्विस की है. तो जाहिर है कि फिल्म 'बॉर्डर' के लिए मेरे मन में सॉफ्ट स्पॉट है. लेकिन दुख की बात ये है कि फिल्म 'बॉर्डर 2' ने मुझे निराश किया है.

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'बॉर्डर 2' ने किया निराश (Photo: ITG) 'बॉर्डर 2' ने किया निराश (Photo: ITG)

शिबू त्रिपाठी

  • नई दिल्ली,
  • 31 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:14 PM IST

1997 का वो साल मुझे आज भी याद है. मैं मुश्किल से 4 साल का था, कुछ भी याद करने के लिए बहुत छोटा. लेकिन एक याद जो मेरे साथ आज भी है, वो है मेरी नानी की. वो नानी जो बिहार के छोटे-से बगहा में रहती थीं. इस इमोशनल याद में मेरी नानी, बगहा के सिंगल स्क्रीन थिएटर में बैठी हैं.

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ये उन दिनों की बात है जब एक पिक्चर देखना किसी त्योहार से कम नहीं होता था. फिल्म देखने का प्लान हम खाने के बीच या फिर मीटिंग्स के दौरान नहीं बनाते थे. फिल्मों की टिकटें कई दिनों पहले खरीद ली जाती थीं. गाड़ी का इंतजाम कर लिया जाता था. शेड्यूल क्लियर हो जाते थे. सिनेमा एक इवेंट की तरह था. मुझे इस सब में जो सबसे ज्यादा याद है, वो फिल्म देखने की तैयारी या स्क्रीन पर दिखने वाली भव्यता नहीं, बल्कि 'संदेसे आते हैं' गाने पर मेरी नानी का आंसू बहाना है.

जब थिएटर में सोनू निगम और रूप कुमार राठौड़ की आवाज गूंजी तो उनके इमोशन्स भी बांध तोड़कर उनकी आंखों से छलक ही आए थे. उनके मन में घर से दूर उस दामाद का ख्याल था, जो देश के उन कोनों में पोस्टेड था, जहां 90 के दशक के बिहार से पहुंच पाना बेहद मुश्किल रहा होगा. उस एक पल ने फिल्म 'बॉर्डर' को उसकी आत्मा दी थी. ये सिर्फ एक वॉर फिल्म नहीं थी. ये एक पुल था, भारत के जवानों और उन परिवारों के बीच, जो उनका इंतजार करते थे, उनके लिए दिन-रात परेशान होते थे और चुपचाप सबकुछ सहते थे.

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सालों से 'बॉर्डर' मेरे साथ ही बड़ी हुई है. ये मेरे रचनात्मक सालों का हिस्सा बन गई, और फिर बाद में मेरे खुद आर्मी की वर्दी पहनने के सपने की तैयारी में बदल गई. इस पिक्चर ने एक पूरी पीढ़ी को सिखाया कि देशभक्ति शोर-गुल वाली, चमक-धमक वाली या अपने सुविधा के अनुसार नहीं होती है, ये अकेली होती है, थका देने वाली और गहराई तक इंसानियत से भरी. 28 साल बाद, सनी देओल फिल्म 'बॉर्डर 2' के साथ लौट आए हैं. इससे बड़ी उम्मीदें लगाई गई थीं. इसलिए नहीं क्योंकि दर्शक बड़े धमाके देखना चाहते थे, लेकिन इसलिए क्योंकि वो वही ईमानदारी चाहते थे, जो उन्होंने सालों पहले पर्दे पर देखी थी. दुर्भाग्य से ये फिल्म वो करने में फेल हो गई.

कहानी सुनाने के नजरिए से देखा जाए तो कुछ चीजों के लिए माफी दी जा सकती है. सिनेमा में हमेशा सच्चाई और कल्पना को मिलाकर ही परोसा जाता है. लेकिन जब एक फिल्म भारत के जवानों का सम्मान करने का दावा करती है, तो लापरवाही का मार्जिन बहुत कम हो जाता है. इसे बहुत बारीकी से सोचना पड़ता है ताकि चीजें ऑथेंटिक रहे और आप इससे जुड़ भी पाएं. 'बॉर्डर 2' ये करने में नाकाम रहती है. पिक्चर को लेकर रिसर्च में कमी रह गई है, ये आप साफ देख सकते हैं. खासकर जैसे ऑपरेशंस और इंटर-सर्विस डायनेमिक को दर्शाया गया है.

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Lt Col. Fateh Singh Kaler reporting for duty! 🇮🇳

Hope you’re all enjoying watching #Border2 as much as I did.
Would love to hear your thoughts, share your experience watching the film in the comments 🤗
Jai Hind! 🫡🇮🇳 pic.twitter.com/wIsHSmmLMP

— Sunny Deol (@iamsunnydeol) January 23, 2026

एरियल सीक्वेंस पर ध्यान दिया जाए तो पिछले कुछ सालों में मेनस्ट्रीम सिनेमा में दिखा सबसे खराब सीजीआई इसी पिक्चर में है. ये सीन में चल रही टेंशन को बढ़ाकर दिखाने की बजाए आपका ध्यान भंग करता है. नेवी को जिस तरह दिखाया गया है, वो जल्दबाजी भरा और आर्टिफिशियल लगता है. ये बस कुछ विजुअल शॉर्टकट्स में सिमट गई है, जबकि इसे एक जटिल, प्रोफेशनल फोर्स के रूप में दिखाना चाहिए था. ऐसे वक्त में जब एआई बहुत आसानी से उपलब्ध है और किसी भी चीज को परफेक्ट तरीके से तैयार किया जा सकता है, 'बॉर्डर 2' में नौसेना के शिप और पनडुब्बी को खराब सीजीआई में देखना काफी दुखद था.

ये सिर्फ एक टेक्निकल शिकायत नहीं है. विजुअल ऑथेंटिसिटी मायने रखती हैं क्योंकि इसी से फिल्म देखने वाली जनता चीजों को समझती है. आज के समय में जब फिल्ममेकर्स के पास वेटरन्स, मिलिट्री हिस्टोरियन्स, ओपन-सोर्स डिफेंस एनालिसिस और यहां तक कि ऑफिशियल आर्काइवल मटेरियल तक पहुंच है, तो ऐसे शॉर्टकट्स बिल्कुल माफ नहीं किए जा सकते. सभी चीजों को ठीक से करने के साधन आपके सामने हैं. उन्हें नजरअंदाज किया जाएगा तो इसका रिजल्ट सिर्फ खराब सिनेमा ही नहीं, बल्कि एक तरह की बाइंसाफी होती है.

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Meri, aapki , Hamari #Border2 ko itna pyaar dene ke liye , aap sab ko bohot ❤️❤️❤️🤗🤗🤗

🫡🫡🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳 pic.twitter.com/0WrTk6gL2A

— Sunny Deol (@iamsunnydeol) January 29, 2026

हॉलीवुड के जाने माने एक्शन हीरो टॉम क्रूज ने 'टॉप गन: मेवरिक' को थिएटर लाने के लिए 36 सालों तक इंतजार किया था. उनका वो धैर्य, फिल्म को लेकर की गई रिसर्च की गहराईयों से लेकर होश उड़ाने वाले विजुअल्स और इसे बनाने की गंभीरता तक, हर एक फ्रेम में दिखता है. हां, इस फ्रेंचाइजी के पास बहुत बड़ा बजट था, और कोई भी इसकी तुलना 'बॉर्डर 2' से नहीं कर रहा है. लेकिन जब तैयारी, रिसर्च और चीजों पर अमल करने की बात आती है तो सनी देओल, अनुराग सिंह और 'बॉर्डर 2' की टीम के पास 28 सालों का फासला और मौका था. और ये पिक्चर स्क्रीन पर इस फायदे को बिल्कुल नहीं दिखाती है.

'बॉर्डर 2', जिस चीज को अंत में मिस कर देती है वो है ओरिजिनल 'बॉर्डर' की गरिमा. ओरिजिनल फिल्म अपने खतों, चुप्पी, डर और वफादारी के जरिए कहीं न कहीं आपके साथ रहती है. मगर सीक्वल को ज्यादा दिलचस्पी भव्यता दिखाने और शोर मचाने में है. ऐसा करने के चक्कर में ये उस इमोशनल बंधन को तोड़ देती है, जिसने पूरे थिएटर को एक वक्त पर साथ रुलाया था.

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'बॉर्डर' कभी भी युद्ध के मैदान के बारे में नहीं थी. ये वर्दी पहने हुए उन लोगों और उनके पीछे छूट गए परिवारों के बारे में थी. 'बॉर्डर 2' में और काम की जरूरत थी, ओरिजिनल फिल्म को पीछे छोड़ने की नहीं, लेकिन ये समझने की कि पहली फिल्म का इतना गहरा असर देखने वालों पर आखिर हुआ क्यों था. उस आत्मा के बिना स्क्रीन पर दिखने वाली यूनिफॉर्म एक कॉस्टयूम जैसी लगती है.

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