गठबंधन में गांठ: 'किराए की कोख' के चक्कर में मारी गई कांग्रेस!

समाजवादी पार्टी ने ऐसी कई सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं जहां से कांग्रेस जीत की उम्मीद कर सकती थी. ये फैसला इतनी देर ये आया है कि अब कांग्रेस के पास कोई खास विकल्प नहीं हैं. कहने को तो पार्टी अब भी ऐसी सीटों पर प्रत्याशी उतार सकती है लेकिन उनमें अब ना तो पहले जैसा जोश होगा और ना ही जनता उन्हें लेकर खास गर्मजोशी दिखाएगी.

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अखिलेश के नए दांव से कांग्रेस चित्त अखिलेश के नए दांव से कांग्रेस चित्त

पीयूष बबेले

  • लखनऊ/ दिल्ली,
  • 20 जनवरी 2017,
  • अपडेटेड 6:55 PM IST

साइकिल पर सवार होकर जीत की चाहत कांग्रेस को महंगी पड़ी. समाजवादी पार्टी ने 191 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी कर कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. सहारनपुर, गाजियाबाद, नोएडा, बुलंदशहर और मथुरा जैसे जिलों में कई सीटों पर कांग्रेस मजबूत थी. इनमें से कई सीटों पर कांग्रेस के अपने विधायक भी थे.


लेकिन अब समाजवादी पार्टी ने ऐसी कई सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं जहां से कांग्रेस जीत की उम्मीद कर सकती थी. ये फैसला इतनी देर ये आया है कि अब कांग्रेस के पास कोई खास विकल्प नहीं हैं. कहने को तो पार्टी अब भी ऐसी सीटों पर प्रत्याशी उतार सकती है लेकिन उनमें अब ना तो पहले जैसा जोश होगा और ना ही जनता उन्हें लेकर खास गर्मजोशी दिखाएगी.

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एक और जहां अखिलेश यादव ने अपने पिता की ही तरह चौंकाने वाला सियासी दांव खेलकर कांग्रेस को चित्त किया. दूसरी ओर, कांग्रेस के मौजूदा कर्णधारों ने उस एहतियात को बरतना जरुरी नहीं समझा जो सोनिया गांधी समाजवादी पार्टी को लेकर दो दशकों से दिखाती आ रही थीं. सोनिया गांधी ने ये कई मौकों पर सुनिश्चित किया है कि या तो कांग्रेस समाजवादी पार्टी से कोई रिश्ता नहीं रखेगी या फिर गठबंधन की शर्तें वो खुद तय करेंगी.

अपने हाथों गंवाई बाजी
कांग्रेस ने यूपी चुनाव के लिए मुहिम का आगाज '27 साल, यूपी बेहाल' के नारे के साथ किया था. राहुल गांधी एक महीने तक गांव-गांव घूमे और किसानों से कर्ज माफी का वायदा किया. उनकी यात्रा ने कई ऐसे स्थानीय नेताओं का ध्यान खींचा जिन्हें दूसरी पार्टियों में अहमियत नहीं मिल पा रही थी. साथ ही सुस्त पड़े कांग्रेसी कार्यकर्ता भी हरकत में आने लगे थे.

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लेकिन जैसे ही लगने लगा कि पार्टी में कुछ जान फूंकी जा सकती है, पार्टी के भीतर अखिलेश यादव के साथ गठबंधन की बात उछाली जाने लगी. पार्टी ने इस गठजोड़ के विरोधी निर्मल खत्री को प्रदेशाध्यक्ष के ओहदे से हटाकर पुराने समाजवादी राज बब्बर को कमान सौंप दी.


सियासी पंडित मानते हैं कि शुरुआती मेहनत के बाद पार्टी के चुनाव अभियान की कमान संभाल रहे प्रशांत किशोर भी गठबंधन की ओर झुकते दिखे. कुछ ऐसा ही राज बब्बर और गुलाम नबी आजाद के बारे में भी कहा जा सकता है. इन्हीं लोगों का दबाव राहुल गांधी को इस गठबंधन के लिए मनाने में अहम साबित हुआ.

जिस दिन प्रशांत किशोर लंबी कार से मुलायम सिंह के दिल्ली वाले घर से बाहर निकलते दिखे, उसी दिन से कांग्रेसियों के हौसले पस्त पडऩे लगे. जैसे चुनाव पास आता गया कांग्रेस और जनता ने यह मान लिया कि गठबंधन हो रहा है. ऐसे में तमाम कांग्रेस प्रत्याशी और कार्यकर्ता घर बैठ गए. सिर्फ वही कांग्रेसी खुश रहे जिन्हें टिकट की उम्मीद थी.

अब नहीं मिल रहे नेता
पहले हर चुनाव से पहले कांग्रेस को जनाधार वाले ऐसे कुछ लोग मिल जाते थे जो जो बाकी पार्टियों से निराश होते थे. इन्हीं लोगों की बदौलत कांग्रेस पिछले ढाई दशकों से 25-30 सीटें जीत पा रही थी. गठबंधन के कयासों का सबसे बड़ा नुकसान ये हुआ कि इस दफा कांग्रेस को ऐसे नेता नहीं मिल पा रहे.

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यह असर यहीं खत्म हो जाता तो भी गनीमत थी. लेकिन यूपी चुनाव को अगले आम चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है. प्रशांत किशोर की टीम ने जिन हजारों लोगों को टिकट की उम्मीद दिलाई वो अब 2019 में कांग्रेस का दामन थामने से पहले कई बार सोचेंगे. जमीनी लड़ाई छोडकर किराए की कोख के मोह में फंसी कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बहुत बड़ा गच्चा खा गई है.

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