1998 के बाद पहली बार बिना सोनिया के रायबरेली में लड़ेगी कांग्रेस, प्रियंका ने भी महज झलक ही दिखाई

1998 में सोनिया ने राजनीति में क़दम रखा, खुद अपने पति की कर्मभूमि अमेठी को चुना और राजीव गांधी के करीबी सतीश शर्मा को अपनी सास इंदिरा की कर्मभूमि रायबरेली भेज दिया. बाद में 2004 में जब राहुल राजनीति में आये, तो सोनिया ने राहुल को राजीव की विरासत अमेठी सौंप दी और खुद रायबरेली को चुन लिया.

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कुमार विक्रांत

  • नई दिल्ली,
  • 21 फरवरी 2017,
  • अपडेटेड 11:16 AM IST

1998 में सोनिया ने राजनीति में क़दम रखा, खुद अपने पति की कर्मभूमि अमेठी को चुना और राजीव गांधी के करीबी सतीश शर्मा को अपनी सास इंदिरा की कर्मभूमि रायबरेली भेज दिया. बाद में 2004 में जब राहुल राजनीति में आये, तो सोनिया ने राहुल को राजीव की विरासत अमेठी सौंप दी और खुद रायबरेली को चुन लिया. यानी 1998 से अब तक गांधी परिवार के गढ़ अमेठी रायबरेली में कांग्रेस सोनिया की सरपरस्ती में चलती रही. हालांकि पिछले कुछ सालों से ख़राब सेहत के चलते सोनिया ने अमेठी- रायबरेली के साथ साथ अपनी राजनीति को भी सीमित कर दिया. अमेठी में राहुल, तो रायबरेली में प्रियंका सियासी फैसले करने लगे.

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सोनिया ने केंद्रीय राजनीति की विरासत भी राहुल के हवाले कर दी. हाल के 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों में सोनिया ने प्रचार ना करने का फैसला किया, लेकिन संसद भवन परिसर में मीडिया से कहा कि, वो बाक़ी कहीं प्रचार करें न करें लेकिन रायबरेली जरूर प्रचार करने जाएंगी. सूत्रों के मुताबिक, 20 फरवरी को सोनिया की रैली का कार्यक्रम भी तय हुआ, प्रियंका का भी कार्यक्रम बना, लेकिन सोनिया की ख़राब सेहत और प्रियंका की व्यक्तिगत व्यस्तता के चलते दोनों रायबरेली नहीं आये. उनकी जगह राहुल ने रैली को संबोधित किया. हां, राहुल के साथ 17 फरवरी को महज एक दिन प्रियंका ने दो जगह मंच साझा किया और उसमें भी सिर्फ एक जगह 5 मिनट का भाषण दिया.

वैसे सूत्र बताते हैं कि, सोनिया की बीमारी और प्रियंका के व्यक्तिगत कारणों के साथ ही अमेठी रायबरेली में 4 सीटों पर गठजोड़ के बावजूद सपा कांग्रेस का आमने सामने लड़ना भी बड़ी वजह रही, जिसके चलते दोनों ने दूरी बनाई. साथ ही रायबरेली सदर की सीट पर 5 बार के बाहुबली विधायक अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं, जबकि अखिलेश सिंह भले ही शुरुआत में कांग्रेस में रहे हों, लेकिन बाद में प्रियंका की तमाम कोशिशों के बावजूद गांधी परिवार का विरोध करके अखिलेश निर्दलीय चुनाव जीतते रहे. ऐसे में अगर अदिति जीततीं हैं तो श्रेय गांधी परिवार को नहीं मिलने वाला.

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वैसे कांग्रेस का एक तबका ये मानता है कि, सोनिया की सेहत ठीक नहीं और प्रियंका को वो 2019 के लिए सहेज कर रखना चाहते हैं. वैसे प्रियंका ने 2012 विधानसभा चुनाव में रायबरेली में 100 के करीब नुक्कड़ सभाएं और रोड शो किये थे, लेकिन पार्टी रायबरेली की सभी विधामसभा सीटें हार गई थी. हालांकि, ऐसा ही प्रचार प्रियंका ने 2007 में किया था, तब कांग्रेस ने रायबरेली की 4 सीटों पर जीत हासिल करने में सफलता पाई थी.

कुल मिलाकर सियासत में आने के 19 साल बाद पहली बार रायबरेली ने किसी चुनाव में सोनिया को नहीं देखा, साथ ही पहली बार प्रियंका ने खुद को सीमित कर लिया. आज 21 फरवरी को शाम 5 बजे रायबरेली में प्रचार थम जाएगा. ऐसे में साफ़ हो गया कि, अब बड़े पैमाने पर कांग्रेस में सब कुछ राहुल के हवाले है और प्रियंका 2019 के लिये पार्टी का तुरुप का इक़्क़ा हैं, जिसको पहले पार्टी एक्सपोज़ नहीं करना चाहती.

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