कांग्रेस या बीजेपी... राजस्थान चुनाव में बेनीवाल-बसपा बिगाड़ेंगे किसका 'खेल'?

हनुमान बेनीवाल ने राजस्थान चुनाव में किसी से गठबंधन किए बगैर उतरने का ऐलान किया है. बसपा के नेशनल कन्वेनर आकाश आनंद ने साफ किया है कि पार्टी 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. बेनीवाल और बसपा राजस्थान चुनाव में किसका खेल बिगाड़ेंगे?

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हनुमान बेनीवाल और मायावती (फाइल फोटो) हनुमान बेनीवाल और मायावती (फाइल फोटो)

बिकेश तिवारी

  • नई दिल्ली,
  • 30 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 1:47 PM IST

राजस्थान विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल बढ़ गई है. सत्ताधारी कांग्रेस ने उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है. विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) परिवर्तन यात्रा निकालने जा रही है तो वहीं अब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और हनुमान बेनीवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (आरएलपी) भी एक्टिव मोड में आ गई है. बसपा ने राजस्थान चुनाव में 200 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का ऐलान कर दिया है.

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बसपा के नेशनल कन्वेनर आकाश आनंद ने 16 अगस्त को धौलपुर से शुरू हुई संकल्प यात्रा के समापन अवसर पर ऐलान किया कि पार्टी 200 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. उन्होंने ये भी कहा कि हमने पूरी ताकत के साथ राजस्थान चुनाव में जाने का मन बना लिया है. पांच सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम का ऐलान पहले ही किया जा चुका है. आकाश आनंद ने कांग्रेस सरकार पर महंगाई और बेरोजगारी को लेकर जमकर हमला बोला तो साथ ही बीजेपी को भी निशाने पर लिया.

दूसरी तरफ, हनुमान बेनीवाल ने भी साफ किया है कि हम न तो कांग्रेस और ना ही बीजेपी, दोनों में से किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगे. आरएलपी अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी. बसपा के 200 सौ सीटों पर उम्मीदवार उतारने के ऐलान और बेनीवाल के एकला चलो के नारे से किसे नफा होगा और किसे नुकसान? अब ये सवाल उठने लगे हैं. इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले इन पार्टियों का वोट बेस क्या है और किस इलाके में ये मजबूत हैं?

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पूर्वी राजस्थान में बसपा मजबूत

उत्तर प्रदेश की पार्टी मानी जाने वाली मायावती की बसपा की जड़ें राजस्थान में भी गहरी हैं. दलित वोट बेस वाली बसपा ने 1998 के राजस्थान चुनाव में पहली बार दो सीटें जीतकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी. तब बसपा का वोट शेयर भी 2.2 फीसदी रहा था. तब से लेकर अब तक हर विधानसभा चुनाव में बसपा दो या दो से अधिक सीटें जीतती रही है. पूर्वी राजस्थान में बसपा मजबूत रही है. भरतपुर, धौलपुर, अलवर, सवाई माधोपुर और करौली जिलों में बसपा की जड़ें गहरी हैं तो झुंझुनू और चूरु से भी पार्टी के विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचते रहे हैं. 

बसपा को 2018 चुनाव में चार फीसदी वोट शेयर के साथ छह सीटों पर जीत मिली थी. हालांकि, सभी विधायक पार्टी छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए थे. 2013 चुनाव में बसपा ने 3.4 फीसदी वोट शेयर के साथ तीन, 2008 में 7.6 फीसदी वोट शेयर के साथ छह और 2003 में चार फीसदी वोट शेयर के साथ दो सीटें जीती थीं. 2003 के बाद का चुनावी इतिहास देखें तो बसपा ने जब-जब छह सीटें जीती हैं, राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनी है.

बेनीवाल की पार्टी का बेस जाट वोट

हनुमान बेनीवाल की पार्टी आरएलपी का बेस वोटर जाट है. राजस्थान के जाटलैंड यानी मेवाड़ इलाके की 60 सीटों पर आरएलपी बीजेपी और कांग्रेस का खेल खराब कर सकती है. नागौर, सीकर, झुंझुनू, भरतपुर और जोधपुर में जाट मतदाताओं की अच्छी तादाद है. बाड़मेर, राजसमंद, जालौर, पाली और अजमेर की कुछ सीटों पर भी आरएलपी का अच्छा प्रभाव माना जाता है.

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राजस्थान के पिछले चुनाव यानी 2018 की बात करें तो बेनीवाल की पार्टी ने 58 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. विधानसभा चुनाव कार्यक्रम का ऐलान होने के बाद अस्तित्व में आई नई नवेली पार्टी ने 2.4 फीसदी वोट शेयर के साथ तीन सीटों पर जीत हासिल की थी. बेनीवाल की पार्टी दो सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी जबकि 24 सीटें ऐसी थीं जहां आरएलपी उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे थे. पार्टी को कुल मिलाकर 8 लाख 56 हजार 38 वोट मिले थे.

किसका खेल बिगाड़ेंगे बेनीवाल-बसपा?

वरिष्ठ पत्रकार विनय कुमार कहते हैं कि दलित में जाटव वोट बसपा के साथ रहा है. बसपा 1998 के बाद से ही अपना वोट शेयर एक हद तक मेंटेन रखने में सफल रही है. आरएलपी की बात है तो उसके चुनाव मैदान में आने से बीजेपी और कांग्रेस, दोनों ही दलों के लिए अगर-मगर की स्थिति बन गई है. जाट वोटर कांग्रेस के साथ रहे हैं जिनके छिटकने का खतरा है.

पिछले चुनाव की बात करें तो पिछले चुनाव में कांग्रेस बहुमत के करीब पहुंचकर ठिठक गई तो इसके लिए बेनीवाल की पार्टी को ही वजह बताया गया. जाट परंपरागत रूप से कांग्रेस के वोटर रहे हैं. बेनीवाल के आ जाने से जाट वोट बैंक में सेंध लग गई. अब दूसरा पहलू ये भी है कि सरकार के कामकाज से असंतुष्ट वोटों का बिखराव हो सकता है. अगर ऐसा हुआ तो इसका सीधा लाभ सत्ताधारी पार्टी को मिल सकता है. लेकिन कांग्रेस के लिए अंतर्कलह अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है.

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कांग्रेस की अंतर्कलह स्क्रीनिंग कमेटी की वन-टू-वन बैठक के दौरान भी खुलकर सामने आई. स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख गौरव गोगोई ने अजमेर, बीकानेर, सीकर और जयपुर डिवीजन की विधानसभा सीटों से टिकट मांग रहे नेताओं को बुलाया था. स्क्रीनिंग कमेटी एक-एक नेता से इसे लेकर बात कर रही थी कि उन्हें टिकट क्यों दिया जाए. इसी दौरान बाहर चाकसू विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ता विधायक विनोद सोलंकी को टिकट नहीं दिए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन करने लगे. इसकी खबर पाकर सोलंकी समर्थक भी पहुंच गए और दोनों गुटों में भिड़ंत हो गई.

अब बेनीवाल की पार्टी आरएलपी और बसपा अंतर्कलह में उलझी कांग्रेस के लिए जीत की राह बनाएंगे या बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाएंगे? ये चुनाव परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा.

 

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