हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में महज चार दिन बाकी है और प्रचार अभियान थमने में सिर्फ दो दिन रह गए हैं. कांग्रेस और बीजेपी ने अपनी-अपनी पूरी ताकत झोंक रखी है. सूबे में पिछले साढ़े तीन दशकों से हर पांच साल में सत्ता बदलने का ट्रेंड चला आ रहा है. बीजेपी सत्ता परिवर्तन के सिलसिले को तोड़ने की कवायद में है तो कांग्रेस इस ट्रेंड को बरकरार रखना चाहती है. हालांकि, यह ट्रेंड पूरे हिमाचल का नहीं है बल्कि 23 सीटें है, जिनका हर चुनाव में 'मिजाज' बदल जाता है और सत्ता परिवर्तन का 'रिवाज' बन गया है.
हिमाचल में 2003 से लेकर 2017 तक हुए चार विधानसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न को देखें तो राज्य में चार से आठ फीसदी के वोटों के अंतर से सरकारें बनती और बिगड़ती रही हैं. प्रदेश में जब-जब वोटिंग पैटर्न में इजाफा हुआ है तो सियासी दलों की सीटों में भी बढ़ा अंतर दिखा है. ऐसे में देखना है कि इस बार वोटिंग ट्रेंड किस तरह से रहता है, क्योंकि हिमाचल प्रदेश एक छोटा राज्य हैं, जहां पर कुछ वोटों के इधर से उधर होने पर सारे समीकरण बदल जाते हैं?
हिमाचल में 68 विधानसभा सीटों वाला भले ही छोटा राज्य हो, लेकिन यहां चुनावी पंडितों के लिए भविष्यवाणी करना कोई आसान काम नहीं है. प्रदेश की अधिकांश विधानसभा सीटों पर 90 हजार से कम वोटर हैं जबकि लाहौल और स्पीति जैसी कुछ सीटों पर 30 हजार से भी कम मतदाता हैं. ऐसे में चुनाव में जीत-हार का मार्जिन भी कम होता है. ऐसे में कांग्रेस और बीजेपी सत्ता पर काबिज होने के लिए चार से सात फीसदी वोटों के अंतर से बढ़त बनाने के लिए लड़ाई लड़ रही हैं.
4 से 7 फीसदी वोटों के अंतर का खेल
साल 2003 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 41 फीसदी वोटों के साथ 43 सीटें जीतने में कामयाब रही जबकि बीजेपी को 35.38 फीसदी वोटों के साथ 16 सीटें मिली थी. सात फीसदी वोटों के अंतर ने कांग्रेस की 27 सीटें बढ़ा दी थी. इसके बाद 2007 के विधानसभा चुनाव के नतीजे देखें तो बीजेपी 43.78 फीसदी वोटों के साथ 41 सीटें और कांग्रेस 38.90 फीसदी वोटों के साथ 23 सीटें जीती थी. इस चुनाव में 4.88 फीसदी वोटों के अंतर ने 18 सीटें बीजेपी की बढ़ा दी थी.
2012 के विधानसभा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 42.81 फीसदी वोटों के साथ 36 सीटें जीती तो बीजेपी को 38.47 फीसदी वोटों के साथ 26 सीटें मिली थी. इस तरह से करीब चार फीसदी वोटों के अंतर ने बीजेपी की 10 सीटें बढ़ा दी थी. इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव नतीजे को देखें तो बीजेपी 48.79 फीसदी वोटों के साथ 44 सीटें जीती जबकि कांग्रेस ने 41.68 फीसदी वोटों के साथ 21 सीटे जीतने में कामयाब रही. इस तरह सात फीसदी वोटों के अंतर के चलते बीजेपी को कांग्रेस से 23 सीटें ज्यादा मिली थी.
कांग्रेस-बीजेपी किन सीटों पर मजबूत
हिमाचल में अगर सत्ताधारी पार्टियों (सरकारों) को वोट देने के इतिहास और ट्रेंड को देखते है तो लगता है कि बीजेपी को इस बार चुनाव में कांग्रेस से हार मिल सकती है. हालांकि, आंकड़े और सियासी समीकरण को देखें तो इस बार चुनाव में बीजेपी अपनी सत्ता को बचाए रखने में सफल रह सकती है, लेकिन 21 सीटों पर उसके बागी उसकी राह में रोड़ा बन गए हैं.
हिमाचल में पिछले दो विधानसभा चुनावों के आंकड़ों के आधार पर देखें तो कांग्रेस की तुलना में बीजेपी के पास कहीं ज्यादा मजबूत सीटें हैं. हिमाचल की 18 सीटे ऐसी हैं जिन पर बीजेपी ने पिछले चुनावों से अपना कब्जा बरकरार रख रहा है जबकि कांग्रेस 12 सीटों पर अपना वर्चस्व कायम रखा है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं 18 सीटों पर बीजेपी ही या 12 सीटों पर कांग्रेस ही जीत दर्ज करेगी. इनमें से कई सीटों पर जीत हार का मार्जिन बहुत बड़ा नहीं है, ऐसे में इन सीटों पर उलटफेर भी हो सकता है.
हिमाचल की 23 सीटों पर बदलता मिजाज
हिमाचल प्रदेश की कुल 68 में से 23 सीटें ऐसी हैं, जिन्होंने सही मायने में एक ट्रेंड सेट किया है. 2012 में कांग्रेस ने जीती थी तो 2017 में बीजेपी ने कब्जा जमाया था. इससे यह पता चलता है कि हर पांच साल पर इन 23 सीटों के वोटर अपना सियासी मिजाज बदल देते हैं. 1985 के बाद से किसी पार्टी को लगातार दो बार सरकार चलाने का मौका नहीं मिला है. भाजपा और कांग्रेस को ही हरपांच साल पर शासन करने का मौका मिलता रहा है. ऐसे में इन 23 सीटों पर जीत की उम्मीद कांग्रेस लगाए हुए है. हिमाचल की हर सीट पर पांच साल में विधायक बदल जाते हैं, जिनमें ज्यादातर एससी और एसटी समुदाव वाली सुरक्षित सीटें है. लाहौल, स्पीति, भरमौर, बैजनाथ जैसी सीटें शामिल हैं.
किस जिले में किसका पलड़ा भारी रहा
हिमाचल के 12 में से आठ जिलों में बीजेपी 2017 में कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा सीटें मिलीं थीं. वहीं, चार जिलों में कांग्रेस को बीजेपी से ज्यादा सीटें मिली थी. बीजेपी को कांगड़ा, मंडी, बिलासपुर, चंबा, कुल्लू, सिरमौर, लाहौल स्पीती और ऊना में बढ़त मिली थी. वहीं, कांग्रेस को हमीरपुर, किन्नौर, शिमला और सोलन जिले में बीजेपी से ज्यादा सीटें आई थी. हिमाचल के कांगड़ा में सबसे ज्यादा 15 सीटे तो मंडी में 10 और शिमला में आठ सीटें हैं. इन तीनों बड़े जिलों में से कांगड़ा और मंडी में बीजेपी को एक तरफा जीत मिली थी जबकि शिमला में कांग्रेस आगे रही थी. इन तीन ही जिलों के सियासी समीकरण हिमाचल की सत्ता का रुख तय करते हैं?
कुबूल अहमद