असम विधानसभा चुनाव की कवरेज के दौरान एक बात बार-बार महसूस हुई, काजीरंगा को सिर्फ एक नेशनल पार्क या पर्यटन स्थल के तौर पर नहीं देखा जाता, बल्कि यह असम की पहचान, राजनीति और सरकार के प्रदर्शन का एक बड़ा प्रतीक बन चुका है. बीते कुछ सालों में बीजेपी सरकार ने काजीरंगा को अपनी उपलब्धियों के केंद्र में रखा है.
बीजेपी सरकार का सबसे बड़ा दावा रहा है गैंडों के शिकार में भारी कमी आई है. सरकार इसे अपने शासन मॉडल, सख्त कानून-व्यवस्था और संरक्षण नीति की सफलता के तौर पर पेश करती है. लेकिन चुनावी मौसम में सवाल सिर्फ इतने भर नहीं हैं.
क्या काजीरंगा में सचमुच सब बदल गया है? क्या जंगल सुरक्षित हुआ है, तो क्या जंगल के किनारे रहने वाले लोगों की जिंदगी भी आसान हुई है? क्या संरक्षण और विकास साथ-साथ चल पा रहे हैं?
गुवाहाटी से काजीरंगा: चुनावी सफर का सबसे अहम पड़ाव
गुवाहाटी से करीब चार घंटे का सफर तय करके जब हम काजीरंगा की ओर बढ़ रहे थे, तो रास्ते भर सिर्फ जंगल की कहानी नहीं, बल्कि चुनाव की राजनीति भी साथ चल रही थी. सड़क किनारे जगह-जगह पोस्टर, बैनर, पार्टी के झंडे और स्थानीय चर्चा. सब यही बता रहे थे कि यहां चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं, मुद्दों का भी है. कहीं विकास की बात थी, कहीं बाढ़ की, कहीं जंगल और जानवरों की और कहीं रोजगार की.
इसका मतलब काजीरंगा में चुनावी बहस का दायरा शहरों की तरह सिर्फ सड़क, बिजली, पानी तक सीमित नहीं है. यहां मुद्दा है जंगल बचेगा तो जिंदगी कैसे चलेगी, और जिंदगी चलेगी तो जंगल कितना बचेगा.
सुबह 5:30 बजे काजीरंगा: जब जंगल राजनीति से पहले जागता है
काजीरंगा को सचमुच महसूस करना हो, उसकी असली धड़कन सुननी हो, तो यहां भोर में पहुंचना पड़ता है. मैं सुबह करीब 5:30 बजे काजीरंगा नेशनल पार्क के गेट पर पहुंचा. सुबह की हल्की ठंड, धुंध से ढकी हवा, और दूर-दूर तक फैली नमी सब कुछ बता रहा था कि दिन की शुरुआत यहां इंसानों से पहले जंगल करता है.
गेट पर मौजूद कर्मचारियों ने जल्दी-जल्दी अंदर जाने को कहा. उन्होंने कहा 'सर, जल्दी चलिए… एलिफेंट सफारी शुरू होने वाली है.' और यहीं से शुरू हुआ मेरा वो अनुभव, जिसने काजीरंगा को मेरे लिए सिर्फ एक स्टोरी नहीं, बल्कि एक जिंदा राजनीतिक और सामाजिक भूगोल बना दिया.
हाथी की पीठ पर बैठकर दिखा काजीरंगा का असली चेहरा
एलीफेंट सफारी के लिए एक ऊंचे लकड़ी और लोहे के बने प्लेटफॉर्म से हाथी पर बैठाया जाता है. करीब 20-25 सीढ़ियां चढ़कर मैं उस प्लेटफॉर्म तक पहुंचा और फिर हाथी की पीठ पर बैठ गया. सच कहूं, जैसे ही हाथी ने कदम बढ़ाए, मन में हल्की घबराहट हुई. एक अजीब-सा सवाल बार-बार आ रहा था- क्या ये सफर उतना आसान होगा, जितना बाहर से दिखता है?
लेकिन कुछ ही मिनटों में हाथी की धीमी, स्थिर चाल ने जंगल का वो हिस्सा खोलना शुरू कर दिया, जिसे सड़क पर बैठकर कभी महसूस नहीं किया जा सकता. ऊंची-ऊंची घास, घनी झाड़ियां, गीली मिट्टी की गंध और दूर से आती पक्षियों की आवाज. ऐसा लग रहा था जैसे काजीरंगा धीरे-धीरे अपना परिचय खुद दे रहा हो और फिर सामने तीन गैंडे थे.
कुछ ही देर बाद हमारी नजर उस दृश्य पर पड़ी, जो शायद काजीरंगा की सबसे बड़ी पहचान है. तीन गैंडे, एक साथ, बेहद शांत मुद्रा में बैठे हुए. वो किसी कैमरे के लिए नहीं बैठे थे. वो किसी पर्यटन पोस्टर का हिस्सा नहीं थे. वो बस अपने घर में थे और हम उनके मेहमान थे.
उन गैंडों को देखकर एक बात बहुत साफ हुई- गैंडा यहां सिर्फ वन्यजीव नहीं है, ये असम की राजनीति का भी हिस्सा है. क्योंकि पिछले कुछ सालों में बीजेपी सरकार ने काजीरंगा में गैंडा शिकार में आई गिरावट को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल किया है. चुनावी मंचों से लेकर सरकारी प्रेस रिलीज तक काजीरंगा और गैंडा, दोनों को विकास और शासन के प्रतीक की तरह पेश किया गया है और सच ये भी है कि जमीन पर लोग इस बदलाव को महसूस करते हैं. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती.
महावत और 'विष्णु': जंगल की एक और सच्चाई
हाथी पर बैठे-बैठे मैंने महावत से पूछा 'इस हाथी का नाम क्या है?' उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया 'इसका नाम विष्णु है.' फिर उन्होंने बताया कि वो और विष्णु लगभग बचपन से साथ हैं. वो उनकी हर बात समझता है, उनके साथ खाता है, चलता है, खेलता है. उस पल मुझे महसूस हुआ कि काजीरंगा सिर्फ वन्यजीव संरक्षण की सरकारी फाइल नहीं है. यहां इंसान और जानवर के बीच रोजमर्रा का रिश्ता भी है और यही रिश्ता यहां की असली कहानी है.
लेकिन चुनाव के मौसम में यही रिश्ता एक बड़ा सवाल भी बन जाता है. क्या सरकार सिर्फ जानवरों को बचा रही है, या उन लोगों को भी, जिनकी जिंदगी जंगल के साथ बंधी हुई है?
हाथी सफारी खत्म हुई, लेकिन कहानी अभी शुरू हुई थी
जब एलीफेंट सफारी खत्म हुई, तो पर्यटकों के चेहरों पर मुस्कान थी. जो लोग लौट रहे थे, उनके चेहरे पर संतोष था. जो जाने वाले थे, उनके चेहरे पर उत्सुकता थी. लेकिन मेरे लिए ये सिर्फ एक रोमांचक सफर नहीं था. अब तक इतना साफ हो चुका था कि काजीरंगा की चमकदार तस्वीर के पीछे कई अनकहे सवाल छिपे हैं और इन्हीं सवालों को लेकर अब हम निकल पड़े जीप सफारी पर.
जीप सफारी: जंगल के भीतर, राजनीति के और करीब
होटल लौटकर थोड़ी देर बाद हम जीप में सवार होकर दोबारा काजीरंगा के भीतर दाखिल हुए. इस बार अनुभव अलग था. हाथी आपको जंगल के करीब ले जाता है, लेकिन जीप आपको जंगल और उसके संघर्ष-दोनों के बीच ले जाती है. एंट्री गेट पर सख्त जांच हुई.
हमसे पूछा गया 'खाने-पीने का कुछ सामान तो नहीं?' 'कोई नशीला पदार्थ तो नहीं?' इस अनुशासन से साफ था कि काजीरंगा में पर्यटन सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि एक नियंत्रित व्यवस्था का हिस्सा है और यही वो मॉडल है, जिसे सरकार कामयाबी की मिसाल की तरह दिखाती है.
मिही झील, हिरण और दूर बैठे गैंडे
जैसे ही जीप अंदर बढ़ी, चारों तरफ हरियाली, ऊंची घास और पक्षियों की आवाजों ने स्वागत किया. थोड़ा आगे बढ़ने पर मिही झील दिखाई दी. उसके आसपास हिरणों का झुंड बैठा था. और कुछ दूर चार-पांच गैंडे भी दिखाई दिए. मेरे हाथ में बाइनॉक्युलर था. मैंने आंखों पर लगाया और कुछ देर तक उस नजारे को देखता रहा. कई बार रिपोर्टिंग में शब्द कम पड़ जाते हैं. ये भी ऐसा ही पल था.
लेकिन फिर वही सवाल लौट आया कि अगर गैंडे अब सुरक्षित हैं, तो क्या काजीरंगा का पूरा इकोसिस्टम भी उतना ही सुरक्षित है?
जंगल के भीतर सबसे बड़ा सवाल: बाघ नहीं, बाढ़
जीप चालक विनोद पिछले 15 सालों से काजीरंगा के अंदर गाड़ी चला रहे हैं. उनसे बातचीत शुरू हुई तो जंगल की असली राजनीति खुलने लगी. मैंने पूछा 'यहां सबसे बड़ी चुनौती क्या है?' उन्होंने बिना देर किए कहा 'सर, सबसे बड़ी दिक्कत बाढ़ है.' उन्होंने बताया कि जब पार्क के भीतर पानी भर जाता है, तो जानवरों को बाहर निकलना पड़ता है. वो हाईलैंड्स की ओर भागते हैं और कई बार मुख्य सड़क तक आ जाते हैं.
इससे साफ है कि काजीरंगा में बाढ़ सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं है, ये मानव-वन्यजीव संघर्ष, सड़क सुरक्षा, आजीविका और प्रशासनिक तैयारी- सबका सवाल है. और यहीं चुनावी राजनीति फिर सामने आती है. क्योंकि सरकार ने हाल के सालों में हाईलैंड्स, संरक्षण ढांचे, और एंटी-पोचिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश किया है. लेकिन स्थानीय लोग पूछते हैं-क्या बाढ़ की असली समस्या कम हुई है?
बीजेपी के काम की तारीफ… लेकिन अधूरी
विनोद ने बातचीत के दौरान कहा 'इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजेपी सरकार आने के बाद बहुत कुछ बदला है.' ये बात काजीरंगा में कई लोगों से सुनने को मिली. खासतौर पर गैंडा शिकार में आई गिरावट को लेकर सरकार को क्रेडिट दिया जाता है. ये बदलाव सिर्फ दावे तक सीमित नहीं है. जमीन पर एंटी-पोचिंग कैंप, कड़ी निगरानी, फोर्स की तैनाती, और सुरक्षा व्यवस्था साफ दिखती है.
लेकिन विनोद ने उसी सांस में एक और बात भी जोड़ दी 'अंदर की सड़कें और बेहतर होनी चाहिए.' यानी सरकार के काम को लेकर सराहना है, लेकिन पूरी तरह संतोष नहीं. यही चुनावी राजनीति का सबसे दिलचस्प हिस्सा है- वोटर पूरी तरह नाराज भी नहीं है और पूरी तरह संतुष्ट भी नहीं.
आगे पानी भरा था… और वहीं दिख गया काजीरंगा का भविष्य
कुछ दूर आगे जाकर विनोद ने कहा कि अब हमें यू-टर्न लेना होगा, क्योंकि आगे का रास्ता पानी से भरा हुआ है. पिछले कुछ दिनों की बारिश ने पार्क के कई हिस्सों को फिर पानी से भर दिया था. ये वही मंजर था, जो काजीरंगा की असली चुनौती को सामने रखता है.
यू-टर्न के बाद कुछ ही दूर हमें हाथियों का एक परिवार दिखा-दो बड़े हाथी और उनके साथ एक छोटा बच्चा. वो पेड़ों की छांव में खड़े थे, बिल्कुल शांत. नजारा खूबसूरत था, लेकिन उसके भीतर एक बेचैन सच्चाई छिपी थी. जब पानी बढ़ता है, तो यही जानवर इंसानी बस्तियों के और करीब आ जाते हैं.
जंगल के बाहर: जहां काजीरंगा लोगों की रोजी-रोटी बन जाता है
पार्क से बाहर निकलने के बाद हमने आसपास रहने वाले लोगों से बात करने का फैसला किया. हाईवे के किनारे एक दुकान दिखी, जहां लकड़ी से बने गैंडे, हाथी, हिरण और पक्षियों के शोपीस रखे थे. अंदर पहुंचे तो देखा कारीगर लकड़ी तराश रहे थे. हथौड़ा, छेनी, लकड़ी का ढेर, और उनके बीच बैठा एक आदमी जो अपने हाथों से काजीरंगा को आकार दे रहा था.
एक कारीगर किरण ने बताया कि एक छोटा लकड़ी का गैंडा बनाने में करीब आधा घंटा लगता है. बड़े शोपीस में डेढ़ से दो घंटे लगते हैं. ये सिर्फ कला नहीं थी, ये काजीरंगा से जुड़ी स्थानीय अर्थव्यवस्था थी. यानी जंगल सिर्फ जानवरों का घर नहीं, ये आसपास रहने वालों की रोजी-रोटी भी है.
दुकानदार कृष्णा की बातों में चुनाव का असली मूड था
दुकान के मालिक कृष्णा से बातचीत हुई तो लगा कि काजीरंगा की सबसे ईमानदार चुनावी राय शायद राजनीतिक मंचों पर नहीं, बल्कि ऐसी दुकानों में मिलती है. उन्होंने कहा 'बिजनेस अच्छा चल रहा है… सीजन में कमाई ठीक हो जाती है.' लेकिन जब राजनीति की बात आई, तो उन्होंने बहुत सीधी बात कही 'कांग्रेस और बीजेपी सरकार में बहुत बड़ा फर्क मुझे नहीं दिखता… बाढ़ की समस्या आज भी बनी हुई है.'
फिर थोड़ी देर रुककर उन्होंने जोड़ा 'हां, यह जरूर है कि बीजेपी के आने के बाद गैंडों के शिकार में काफी कमी आई है.' यानी एक ही वाक्य में सरकार की तारीफ भी थी और उसकी सीमा भी. यही शायद काजीरंगा का असली चुनावी मूड है. यहां लोग सरकार के काम को पूरी तरह खारिज नहीं करते, लेकिन आंख बंद करके स्वीकार भी नहीं करते.
कृष्णा ने एक और बेहद अहम बात कही,'कई बार हमारे घर के सामने से ही चार-पाँच हाथी निकल जाते हैं और जब पार्क में पानी भर जाता है, तो गैंडे भी बाहर तक आ जाते हैं.' यानी काजीरंगा के आसपास रहने वाले लोगों के लिए जंगल कोई दूर की चीज़ नहीं है. वो उनके दरवाजे तक आता है-कभी खूबसूरती बनकर, कभी खतरा बनकर.
काजीरंगा: बीजेपी की उपलब्धि भी, पर्यावरण की परीक्षा भी
आज काजीरंगा एक साथ कई कहानियों का केंद्र है. ये बीजेपी सरकार की कंजर्वेशन सक्सेस स्टोरी भी है. ये बाढ़ और विस्थापन की पुरानी चुनौती भी है. ये स्थानीय रोजगार का आधार भी है और ये विकास बनाम पर्यावरण की सबसे बड़ी बहसों में से एक भी है.
हाल के समय में यहां प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है. उनका कहना है कि विकास के नाम पर अगर वन्यजीव कॉरिडोर प्रभावित हुए, तो काजीरंगा की पूरी पारिस्थिति पर असर पड़ सकता है. एक तरफ सरकार कहती है 'हमने काजीरंगा को सुरक्षित किया.' दूसरी तरफ सवाल उठता है-'क्या विकास के नाम पर वही काजीरंगा कहीं और तरह के खतरे में तो नहीं डाला जा रहा?' और यही सवाल चुनाव में भी गूंजता है.
अंतिम भाव: काजीरंगा सिर्फ जंगल नहीं, एक चुनावी आईना है
काजीरंगा का ये सफर मेरे लिए सिर्फ एक जंगल यात्रा नहीं था. ये एक ऐसी जमीन को समझने की कोशिश थी, जहां गैंडे भी वोट की भाषा में शामिल हैं, जहां बाढ़ सिर्फ मौसम नहीं, राजनीतिक मुद्दा है, जहां जंगल संरक्षण सरकार की उपलब्धि है. लेकिन स्थानीय संघर्ष अब भी खत्म नहीं हुए.
यहां एक तरफ दुनिया भर से आने वाले पर्यटक हैं, तो दूसरी तरफ वे लोग भी हैं जिनकी जिंदगी हर साल बाढ़, जंगली जानवरों की आवाजाही और रोजगार की अनिश्चितता के बीच गुजरती है. चुनाव के इस मौसम में काजीरंगा सिर्फ असम की शान नहीं, बल्कि एक बड़ा सवाल भी है- क्या विकास, संरक्षण और इंसानी जिंदगी, तीनों साथ-साथ चल सकते हैं?
पीयूष मिश्रा