उत्तर में काराकोरम और दक्षिण में हिमालय पर्वत की चोटियों से घिरा खूबसूरत लद्दाख अपने आप में अनोखा राज्य है. इसके उत्तर में चीन और पूरब में तिब्बत की सीमाएं हैं, पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण यहां खेती योग्य जमीन बहुत कम है. अपना 2000 साल का इतिहास समेटे इस राज्य के भारत से जुड़ने की कहानी काफी रोचक है. आइए जानें- लदाख का इतिहास.
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17वीं शताब्दी के अंत में तिब्बत के साथ विवाद के चलते लद्दाख ने खुद को भूटान के साथ जोड़ा था. आपको बता दें, कि कश्मीर के डोगरा वंश के शासकों ने लद्दाख को 19वीं सदी में हासिल किया था. इसके बाद तिब्बत, भूटान, चीन, बाल्टिस्तान के संघर्ष के बावजूद ये कश्मीर का हिस्सा रहा.
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रोचक है ये इतिहास
साल 1834 में कश्मीर के महाराजा रणजीत सिंह की सेना के अभिन्न अंग रहे जोरावर सिंह ने लद्दाख को जीता था. फिर साल 1842 में तमाम अन्य विद्रोह को दबाकर लद्दाख को डोगरा वंश से जोड़ा गया. 1850 के बाद लद्दाख में अंग्रेजी हुकूमत और यूरोप ने रुचि बढ़ाई, फिर 1885 तक लेह को मोरावियन चर्च के मिशन का हेडक्वार्टर बनाया गया.
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महाराजा हरि सिंह के फैसले का भी रहा असर
साल 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद कश्मीर के महाराज हरि सिंह ने हिंदुस्तान के साथ विलय का फैसला लिया था. इस तरह लद्दाख भी जम्मू कश्मीर राज्य के हिस्से के बतौर भारत का अभिन्न अंग बना.
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दूसरे मुल्कों से यहां सैकड़ों ऊंट, घोड़े, खच्चर, रेशम और कालीन लाए जाते थे. वहीं, हिंदुस्तान से रंग, मसाले आदि बेचे जाते थे. तिब्बत से पहाड़ी बैल पर लादकर ऊन, पश्मीना वगैरह लेह लाया जाता था. फिर कश्मीर में इससे शॉलें बनती थीं.
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रहते हैं इस संस्कृति को मानने वाले लोग
लद्दाख के पूर्वी हिस्से में लेह के आसपास रहने वाले
निवासी मुख्यतः तिब्बती, बौद्ध और भारतीय हिंदू हैं. वहीं, पश्चिम में कारगिल के आसपास जनसंख्या मुख्य रूप से भारतीय शिया मुस्लिमों की है.
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पुराने समय से लद्दाख तमाम अहम व्यापारिक रास्तों का प्रमुख केंद्र था. सिंधु नदी भी लद्दाख से निकलकर पाकिस्तान के कराची तक बहती है.
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लद्दाख मध्य एशिया से कारोबार का एक बड़ा गढ़ रहा है. कभी सिल्क रूट की एक शाखा लद्दाख से होकर गुजरती थी.