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गरीबी में गुजरा बचपन, JNU में संघर्ष की मिसाल बन रहा किसान का बेटा

मानसी मिश्रा
  • 02 सितंबर 2019,
  • अपडेटेड 4:31 PM IST
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जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) कैंपस में इन दिनों चुनावी माहौल है. राजनीति की पहली पाठशाला कहे जाने वाले विश्वविद्यालय के यूनियन चुनाव छात्रों को नेतृत्व क्षमता सिखाते हैं. उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के एक गांव महुआ के बहुत छोटे स्तर के किसान के बेटे सतीश यादव भी यहां राजनीति का पाठ सीख रहे हैं. आइसा (All India Student Association) से जुड़े सतीश यादव इस बार जनरल सेक्रेटरी पद पर खड़े हैं. सतीश ने Aajtak से बातचीत में बताया कि जब वो बचपन में दूध का काम या खेती करते थे, तभी से उनका सपना था कि वो राजनीति में जाकर अपने जैसे लोगों का पक्ष रखें.

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सतीश के पिता त्रिवेणी यादव दो एकड़ जमीन के किसान हैं. इसी जमीन से उन्होंने परिवार की तीन बेटियां, पत्नी मेवाती देवी और सतीश का पालन पोषण किया है. सतीश ने बताया कि वो अपने पूरे परिवार में अपनी पीढ़ी के अकेले ऐसे शख्स है जिन्होंने यूनिवर्सिटी स्तर की पढ़ाई की है. उनके घर में न पिता और न मां, दोनों ही पढ़े लिखे नहीं हैं. सतीश ने कहा कि वो पहली पीढ़ी हैं जो पढ़ लिख रहे हैं, वरना ज्यादातर ने किसानी या दूध का काम किया है.

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अपने बारे में सतीश ने बताया कि उन्होंने कक्षा 6 से 12 तक की पढ़ाई जवाहर नवोदय विद्यालय से की है. पांचवीं कक्षा के दौरान ही उन्होंने नवोदय विद्यालय के लिए तैयारी शुरू कर दी थी. जब कक्षा 6 में एडमिशन हो गया तो वो घर से पढ़ने बाहर चले गए. लेकिन जब भी घर पर छुट्टियों में आए तो अपने पिता के साथ उनके कामकाज में हाथ बंटाया, जो सिलसिला आज भी जारी है. सतीश कहते हैं कि तीन बहनों में सबसे छोटा हूं तो पिता को मुझसे बहुत उम्मीद रहती है.

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सतीश बताते हैं कि जब बारहवीं के बाद मैंने ग्रेजुएशन में बनारस हिंदु विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया तो वहां खर्च के लिए भी मेरे पास पैसे नहीं होते थे. तब वहां मैंने होम ट्यूशन के जरिये अपनी एमए तक पढ़ाई की. इसके बाद घर में दो बहनों की शादी के लिए खर्च की जरूरत थी, पढ़ाई के लिए बिल्कुल भी पैसा नहीं था तो ऐसे में मैंने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाकर पांच छह हजार रुपये कमाकर अपना खर्च निकाला और जेएनयू में दाखिले की तैयारी जारी रखी.

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जेएनयू की इमेज को लेकर सुनी थी कई बातें
सतीश ने बताया कि एमए (भूगोल) करने के बाद जेएनयू में एंट्रेंस क्वालीफाइ किया. ये साल 2016 का वक्त था, तब जेएनयू की छवि पर कई तरह के सवाल उठे थे, इस दौर में मैंने जेएनयू के बारे में चल रहीं सभी खबरों और तथ्यों को अध्ययन किया. तब भी मुझे लगा था कि ये इस यूनिवर्सिटी की छवि को बिगाड़ने की साजिश है. लोग मुझसे यहां एडमिशन लेने को लेकर भी तमाम तरह की बातें कह रहे थे लेकिन मैंने समझा बूझा फिर जेएनयू के सपोर्ट में आया. यहां आकर मेरा हौसला और भी बढ़ा है. लेफ्ट पैनल से जनरल सेक्रेटरी का चुनाव जीतकर भी मैं यहां की छवि और जेएनयू की संस्कृति को बचाने के लिए संघर्ष करता रहूंगा.

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