यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन यानी यूजीसी के कुछ नए नियमों को लेकर बवाल मचा हुआ है. जनरल वर्ग के लोग इसका विरोध कर रहे हैं और कई संगठन बड़े स्तर पर प्रदर्शन करने की तैयारी है. ऐसे में सवाल है कि आखिर ये कानून क्या है और इसका विरोध क्यों कर रहे हैं. तो जानते हैं इस बारे में अलग अलग संगठनों का क्या कहना है...
सबसे पहले जानते हैं कि आखिर विवाद क्या है... दरअसल, यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से कुछ नियम लागू किए हैं. नए रेगुलेशन में अब अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है. ऐसे में ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी अपने साथ होने वाले जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष दर्ज करा सकेंगे. इसके लिए हर यूनिवर्सिटी में एक समिति गठित की जाएगी.
अब विरोध इस बात पर किया जा रहा है कि इसमें ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधियों को सदस्य के रूप में शामिल करना जरूरी होगा, लेकिन जनरल कैटेगरी का सदस्य होने पर कुछ नहीं कहा गया है. इसके साथ ही लोगों की मांग है कि अगर आरोप गलत साबित होते हैं तो शिकायतकर्ता पर भी कार्रवाई होनी चाहिए, जिसका कोई जिक्र नहीं है.
'महाराणा प्रताप की तरह लड़ेंगे'
इस बारे में प्रदर्शन कर रही श्री राजपूत करणी सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष महिपाल सिंह मकराना ने आजतक ऑनलाइन को बताया, 'ये कानून पूरी तरह से सामान्य वर्ग का विरोधी है. हम इसे लेकर आवाज उठाएंगे और व्यापक रुप से प्रदर्शन करेंगे. सबसे पहले हम राजस्थान विधानसभा का घेराव करेंगे, इसके बाद हम भारत बंद का ऐलान करेंगे और फिर भी कुछ नहीं होता है तो हम दिल्ली में संसद का घेराव करेंगे. लेकिन, इस मामले में सरकार को पीछे हटना होगा. इस बारे में हमने परशुराम सेना, राजपूत सभाओं समेत कई संगठनों से बात की है और वो तैयार है. अब आज हम यह तय कर लेंगे कि कब भारत बंद करना है.'
साथ ही महिपाल सिंह ने कहा, 'यूजीसी के इस मामले में एक राजपूत महाराणा प्रताप, एक ब्राह्मण परशुराम और एक वैश्य भामाशाह की भूमिका में नजर आएगा. सरकार को हर तरफ से घेरने की तैयारी की जा रही है.
'कॉलेजों में भी भेदभाव शुरू कर देंगे'
वहीं, विप्र सेना के राष्ट्रीय प्रमुख सुनील तिवारी का कहना है, 'ये कानून पूरी तरह से गलत है. सबसे हैरान कर देने वाली बात ये है कि इसकी समिति में जनरल वर्ग का कोई भी व्यक्ति नहीं होगा, उसके शामिल होने को लेकर कोई प्रावधान नहीं है. पहले भी पिछड़े वर्ग के लिए कई कानून थे और उन्हें दंड भी मिलता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. उन्हें लेकर पहले से भी कानून था और अब शिक्षण संस्थानों में भी इस तरह के थाने खोले जाएंगे तो इससे जातिगत भेदभाव बढेगा.'
सुनील तिवारी ने ये भी कहा, 'पहले शिक्षण संस्थान ही ऐसी जगह हुआ करते थे, जहां सभी लोग एक साथ बैठा करते थे. एक साथ पढ़ाई करते थे और उनमें कोई भेदभाव नहीं था. अब कॉलेजों में भी पिछड़ा वर्ग को एक अदृश्य हथियार दे दिया है, जिससे कुछ लोग मनमानी कर सकेंगे. इस मुद्दे में कोई बीजेपी-कांग्रेस की बात नहीं है. ऐसा लग रहा है कि जैसे किसी ने प्लानिंग के साथ ऐसा किया है, जो देश में भेदभाव और गृहयुद्ध के हालात पैदा करना चाहते हैं. अब हम 30 तारीख तक ज्ञापन देंगे और कुछ नहीं हुआ तो फिर जगह जगह प्रदर्शन करेंगे. इस बार हमने टैक्स रिटर्न ना भरने का फैसला किया है.'
AISA ने किया है स्वागत
ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) ने UGC इक्विटी रेगुलेशंस, 2026 का स्वागत किया है. लेकिन कहा है कि ये नियम लंबे छात्र आंदोलनों, अदालतों के हस्तक्षेप और बढ़ते जातिगत भेदभाव के दबाव के बाद आए हैं. AISA ने OBC को समानता के दायरे में शामिल किए जाने, इक्विटी कमेटी, हेल्पलाइन और एंबेसडर जैसी व्यवस्थाओं को सकारात्मक कदम बताया.
हालांकि संगठन ने इसे लेकर कुछ गंभीर खामियां भी गिनाईं. Aisa के अनुसार, EOC और इक्विटी कमेटियों में संस्थान प्रमुख को अध्यक्ष बनाना हितों के टकराव को बढ़ाता है, हाशिए के समुदायों का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त है, और भेदभाव की परिभाषा बहुत अस्पष्ट है. AISA का कहना है कि बढ़ते जातिगत भेदभाव के बीच बिना ठोस सुधारों के ये नियम सिर्फ कागज़ी साबित होंगे. संगठन ने नियमों में तुरंत संशोधन कर वास्तविक जवाबदेही, प्रभावी प्रतिनिधित्व और हाशिए के समुदायों को वास्तविक सुरक्षा देने की माँग की है.
मोहित पारीक