दशकों से हावर्ड का विज्ञान जगत में दबदबा रहा है. हार्वर्ड दुनिया के लिए किसी वैज्ञानिक नॉर्थ स्टार से कम नहीं था.एक मार्गदर्शक की तरह हावर्ड ने इस क्षेत्र को गाइड किया है. हावर्ड एक ऐसी जगह है जहां प्रतिष्ठा, पेटेंट, नीति और शक्ति का संगम होता है. यह युग अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है. सबकुछ बहुत ही शांति से और धीरे-धीरे हुआ है. ऐसा लग रहा है कि विज्ञान में विशेषज्ञता का तमगा अब अमेरिका से चीन शिफ्ट होने वाला है.
चीन रिसर्च आउटपुट , एडवांस मेन्युफेक्चरिंग, एआई, बायोटेक और पेटेंट के कारोबार के मामले में अमेरिका से गैप को तेजी से कम कर रहा है. इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि अमेरिकी साइंटिफिक सुप्रीमेसी कमजोर हो रही है या नहीं, लेकिन यह निश्चित रूप से दबाव में है. ऐसे में सवाल यह है कि इसकी जगह क्या लेगा और दुनिया को कितनी जल्दी इसके अनुरूप ढलना पड़ेगा.
दूसरा सबसे अहम सवाल यह है कि क्या भारत इस नए ग्लोबल ऑर्डर के लिए तैयार है? क्योंकि इस नए युग में रिसर्च सुप्रीमेसी एकेडमिक दिखावे भर की बात नहीं, बल्कि ये जिओपॉलिटिकल पॉवर से सीधे जुड़ा है. अगर आप यह देखना चाहते हैं कि विज्ञान पर शीत युद्ध जमीनी हकीकत में कैसा दिखता है, तो इसके लिए आपको पेंटागन की ब्रीफिंग की जरूरत नहीं है. बस हावर्ड के दाखिले के आंकड़े देख लीजिए.
आंकड़े क्या कहते हैं
पूरे अमेरिका में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के मामले में भारत अब सबसे आगे है. ओपन डोर्स 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक 2024-25 में अमेरिका में 3 लाख 63 हजार से ज्यादा भारतीय छात्र पढ़ रहे हैं. इस मामले में भारत पहले और चीन दूसरे नंबर पर है, जहां से करीब 2 लाख 65 हजार छात्र अमेरिका पहुंचे हैं.
लेकिन जब नजर अमेरिका के सबसे चुनिंदा और प्रतिष्ठित संस्थानों पर जाती है—वहीं, जहां से ग्लोबल रिसर्च सिस्टम को ताकत मिलती है—तो तस्वीर पलट जाती है.हार्वर्ड के फॉल 2025 के आंकड़े बताते हैं कि वहां चीन से 1,452 छात्र हैं, जबकि भारत से सिर्फ 545. यह फर्क कोई मामूली संयोग नहीं है, बल्कि एक गंभीर संकेत है.
यह अंतर एक सामान्य जिज्ञासा नहीं है, बल्कि एक महत्वपूर्ण संकेत है. एक बात जो आपको असहज कर सकती है. हां, यह सच है कि भारत वॉल्यूम के मामले में आगे है, लेकिन प्लेसमेंट के मामले में चीन आगे हैं. चीन के स्टूडेंट उन अनुसंधान-प्रधान केंद्रों में जा रहे हैं, जो यह तय करते हैं कि भविष्य का मालिक कौन होगा. यह ऐसी दुनिया है जहां प्रयोगशालाएं शक्ति का प्रतीक हैं. उन जगहों पर प्लेसमेंट होना एक आंकड़ा नहीं बल्कि एक रणनीति है.
दो देश, दो अलग-अलग रणनीतियां
भारत की यूएस एजुकेशन स्टडी प्लान सिर्फ जॉब ओरिएंटेड है. यानी ऐसी डिग्रियां जो तुरंत नौकरी, वीजा, हाई सैलरी और मोबिलिटी दिलवा देती है. औसत भारतीय छात्र का सपना बेहद व्यावहारिक होता है. जल्दी पढ़ाई करो, उससे भी जल्दी काम शुरू करो और संभव हो तो वहीं रुक जाओ. मध्यमवर्गीय अर्थव्यवस्था लोगों को इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रशिक्षित करती है.
चीन का झुकाव टॉप और एलीट संस्थानों में गहराई से जुड़ने की ओर दिखता है, जहां लंबी अवधि की रिसर्च पोजिशनिंग अहम होती है. यह असर धीरे-धीरे बनता है, लेकिन एक बार बना तो स्थायी हो जाता है. हार्वर्ड जैसे संस्थानों में रिसर्च-ओरिएंटेड क्षेत्रों में चीन की मजबूत मौजूदगी कोई इत्तेफाक नहीं है. यह उस सोच का हिस्सा है, जिसमें ज्ञान के उपभोक्ता बनने के बजाय, ज्ञान बनने वाली जगहों तक पहुंच बनाना जरूरी माना जाता है.
इससे पहले कि हम अनुसंधान क्षेत्र में चीन के वर्चस्व की संभावना पर गहराई से विचार करें, हमें एक बड़ी चिंता पर ध्यान देने की जरूरत है. अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित ब्रांड भी अब निर्विवाद वैज्ञानिक लीडर नहीं रहे. एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन ने प्रमुख डेटाबेस में महत्वपूर्ण अनुसंधान मापदंडों पर अमेरिका के बराबर या उससे भी आगे का स्थान हासिल कर लिया है.
चीन की 'मैजिक वैंड' रणनीति: थाउजेंड टैलेंट्स प्लान (TTP)
चीन का थाउजेंड टैलेंट्स प्लान और उससे जुड़े दूसरे टैलेंट प्रोग्राम्स विदेशों से वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञता को अपने देश में खींचने के लिए बनाए गए थे. लंबे समय से यह योजना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का विषय रही है, क्योंकि इसके जरिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और बौद्धिक संपदा (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी) हासिल करने की आशंका जताई जाती रही है.
यह साफ कर देना जरूरी है कि हम यह नहीं कह रहे कि हर चीनी छात्र किसी गुप्त मिशन का हिस्सा है. ऐसा सोचना न सिर्फ गलत है, बल्कि गंभीर विश्लेषण को भी बेवजह की शंका में बदल देता है. लेकिन यह मान लेना भी भोलेपन से कम नहीं होगा कि जो शैक्षणिक बदलाव हम आज देख रहे हैं, उसके पीछे कोई रणनीतिक सोच नहीं है.
हकीकत यह है कि आधुनिक दौर में वर्चस्व हासिल करने के लिए हर बार सीधी टकराहट जरूरी नहीं होती. कई बार एक मजबूत ‘पाइपलाइन’ ही काफी होती है. और ऐसी पाइपलाइन तीन काम बेहद असरदार तरीके से करती है—टैलेंट को एक जगह इकट्ठा करना, रिसर्च के लिए समय और मेंटरशिप जुटाना, और फिर धीरे-धीरे बढ़त को मजबूत करना. एक के बाद एक रिसर्च पेपर, एक के बाद एक पेटेंट—यही वह तरीका है जिससे वैज्ञानिक ताकत बनती है. चुपचाप, धीरे-धीरे और फिर निर्णायक रूप से.
साइंस कोल्ड वॉर भारत को सिर्फ मोहरा बना देगा
अमेरिका और चीन के बीच उभरती ‘साइंस कोल्ड वॉर’ सिर्फ वॉशिंगटन की बैठकों तक सीमित नहीं रहेगी. इसका असर दुनियाभर के छात्रों और शोधकर्ताओं की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ेगा. बाहर से देखने में यह प्रशासनिक फैसले लगेंगे, लेकिन इनके पीछे गहरी रणनीति छिपी होगी.
भारतीय छात्रों और शोधकर्ताओं को आने वाले समय में इन चुनौतियों के लिए तैयार रहना होगा—
भारतीय छात्रों के वीज़ा पर ज्यादा सख्त जांच
रिसर्च लैब्स पर कंप्लायंस और निगरानी
संवेदनशील रिसर्च तक पहुंच पर पाबंदियां
अंतरराष्ट्रीय सहयोग का अचानक ‘राजनीतिक रूप से जोखिम भरा’ हो जाना
यूनिवर्सिटियों का भू-राजनीतिक संघर्ष का मैदान बन जाना
हम पहले भी देख चुके हैं कि राजनीति कितनी तेजी से शिक्षा व्यवस्था को हथियार बना सकती है. अमेरिका में हार्वर्ड जैसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी तक राजनीतिक बहस और जांच के घेरे में आ चुकी है. ऐसे माहौल में भारतीय रिसर्चर्स को कोई खास छूट नहीं मिलने वाली. वे एक ऐसी कॉरिडोर में फंस जाएंगे, जहां एक तरफ सुरक्षा की चिंताएं होंगी और दूसरी तरफ टैलेंट की जंग.
भारत की असली कमजोरी क्या है
सबसे बड़ा खतरा यह है कि भारत उस इकोसिस्टम को खुद कंट्रोल नहीं करता, जिस पर उसकी प्रतिभा निर्भर है. अगर अमेरिका रिसर्च सहयोग सीमित करता है, या चीन फ्रंटियर इनोवेशन का मुख्य केंद्र बन जाता है, तो भारत उसी डरावने भविष्य की ओर बढ़ सकता है, जिससे वह पहले से आशंकित है—एक टेक्नोलॉजी कंज्यूमर इकॉनमी.
ऐसी अर्थव्यवस्था, जो खुद तकनीक बनाने के बजाय उसे खरीदती है. जो मानक तय करने के बजाय दूसरों के बनाए नियमों का पालन करती है. जहां देश के सबसे तेज दिमाग दूसरे देशों की लैब्स में काम करते हैं, लेकिन बौद्धिक संपदा, प्लेटफॉर्म और ताकत कहीं और जमा होती है.
भारत की असली समस्या है आराम
यहीं असली संकट सामने आता है. न चीन, न हार्वर्ड और न ही अमेरिका. भारत का सबसे बड़ा खतरा है—आराम. यह मान लेने का आराम कि हम हमेशा ‘टैलेंट सप्लायर’ बने रह सकते हैं, जबकि इनोवेशन का मालिक कोई और होगा. क्योंकि हमें प्रवासी शोधकर्ताओं की सफलता का जश्न मनाने में सुकून मिलता है, जबकि घरेलू अनुसंधान प्रणालियां कमजोर बनी रहती हैं. क्योंकि भविष्य उस देश के हाथ में नहीं होगा, जिसके पास सबसे ज्यादा इंजीनियर हों. भविष्य उस देश का होगा, जिसके पास सबसे ज्यादा इंजन रूम होंगे—जहां विचार जन्म लेते हैं, तकनीक बनती है और दुनिया की दिशा तय होती है.
दीबाश्री मोहंती