सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को हुआ. लेकिन, उनकी मौत अभी एक पहली बनी हुई है. सुभाष चंद्र बोस की मौत और उनकी गुमनाम जिंदगी को लेकर कई दावे किए गए. इसके साथ ही इनकी जांच के लिए कई अलग-अलग कमीशन भी बैठाए गए. सभी जांच आयोग और खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट और उनके जिंदा रहने के दावों की अलग-अलग कहानियां हैं.
माना जाता है कि सुभाष चंद्र बोस की मौत 18 अगस्त 1945 को ताइपे में एक विमान दुर्घटना में हो गई थी. तब नेता जी के मौत की पुष्टि ब्रिटिश खुफिया एजेंसी की एक रिपोर्ट ने की थी. इसके बावजूद उन्हें मानने वाले लोगों ने कभी इस बात को स्वीकर नहीं किया. हमेशा से उनकी मौत के सबूत मांगे जाते रहे. कई लोगों ने तो यहां तक दावा किया कि सुभाष चंद्र बोस लंबे समय तक गुमनाम जिंदगी जीते रहे.
रूस में होने का दावा
सुभाष चंद्र बोस के बारे में ये भी दावा किया गया कि वो छुपकर सोवियत रूस में रह रहे थे. यहां तक कहा गया कि स्टालिन को उनके रूस में छुपे होने का पता है और वो उस पर नजर रख रहे थे. हालांकि, इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई भी दस्तावेज या साक्ष्य कभी सामने नहीं आया.
गुमनामी बाबा, भगवन जी या सुभाषचंद्र बोस
लंबे समय तक लोग मानते रहे कि नेता जी 'गुमनामी बाबा' के रूप में फैजाबाद में रह रहे थे. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, गुमनामी बाबा या भगवनजी 1970 के दशक में फैजाबाद आए थे. गुमनामी बाबा अपने आखिरी समय में फैजाबाद में राम भवन के पिछवाड़े में बने दो कमरों में रहते थे. वहीं 16 सितंबर 1985 को उनकी मृत्यु हो गई और 18 सितंबर को दो दिन बाद उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया.
गुमनामी बाबा की मौत के बाद उनके कमरे से जो सामान बरामद हुए उसमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिवार की तस्वीरें थी. इसके अलावा सबसे ज्यादा चिट्ठियां मिलीं जो कलकत्ता से लोग लिखते थे. इनमें आजाद हिन्द फौज की खुफिया ब्रांच के प्रमुख पवित्र मोहन रॉय, लीला रॉय और समर गुहा जैसे लोगों की चिट्ठियां शामिल थीं. सभी पत्रों में उन्हें भगवनजी कह कर संबोधित किया गया था. कुछ चिट्ठियों में ये भी लिखा था कि हम सभी आपके आज्ञाकारी शिष्यों की तरह आपके बताए निर्देशों का पालन कर रहे हैं.
डीडब्ल्यू की एक रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 1986 में नेताजी की भतीजी ललिता बोस को गुमनामी बाबा की मौत के बाद फैजाबाद स्थित उनके घर आई थीं. उन्होंने उनके कमरे में मिली वस्तुओं की पहचान की थी. वहां जो भी चीजें उन्हें मिली, उसे देखकर वह अभिभूत हो गईं. यहां तक कि उन्होंने नेताजी के परिवार की कुछ वस्तुओं की पहचान की. गुमनामी बाबा के कमरे में 25 स्टील ट्रंक में 2,000 से अधिक लेखों का संग्रह था. उनके जीवनकाल में इसे किसी ने नहीं देखा. हालांकि, जस्टिस मुखर्जी और जस्टिस सहाय की अध्यक्षता में लगातार दो आयोगों ने ये निष्कर्ष निकाला था कि 'गुमनामी बाबा' नेताजी नहीं थे.
गुमनामी बाबा का नेता जी से क्या रिश्ता था?
गुमनामी बाबा को नेताजी मानने वाले कुछ लो 2010 में अदालत पहुंचे. हाईकोर्ट ने उनका पक्ष लेते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को गुमनामी बाबा की पहचान स्थापित करने का निर्देश दिया. इसके बाद सरकार ने 28 जून 2016 को एक जांच आयोग का गठन किया. इसे सहाय कमीशन कहा गया. इसके अध्यक्ष न्यायमूर्ति विष्णु सहाय थे. इस कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि 'गुमनामी बाबा' नेताजी के अनुयायी थे लेकिन नेताजी नहीं थे.
फिगेस रिपोर्ट
सुभाष चंद्र बोस की मौत के बाद सबसे पहले जो रिपोर्ट आई वो ब्रिटिश खुफिया द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट थी. 1946 में इसे ब्रिटिश इंटेलिजेंस अधिकारी कर्नल जे.जी. फिगेस ने तैयार किया था. इसमें बताया गया था कि 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (अब ताइपे, ताइवान) एयरपोर्ट पर बोस का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ. उन्हें तुरंत नज़दीकी सैन्य अस्पताल ले जाया गया, जहाँ गंभीर चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई. उनका ही अंतिम संस्कार भी वहीं हुआ. बाद में उनकी अस्थियां टोक्यो ले जाई गईं.
फ्रांस सीक्रेट सर्विस रिपोर्ट (1947)
कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पेरिस के राष्ट्रीय अभिलेखागार में मिला एक फ्रांसीसी सीक्रेट सर्विस डॉक्यूमेंट ने रिपोर्ट में 1947 तक बोस की मौत का उल्लेख नहीं है और कहा गया कि उनकी स्थिति अज्ञात थी और उनका अस्तित्व 1947 में भी ज्ञात नहीं था. इसके बाद से यह तर्क दिया जाता है कि बोस 1945 के दुर्घटना में नहीं मरे थे.
शाह नवाज खान कमीशन
सुभाष चंद्र बोस की मौत की जांच के लिए 1956 में पहली बार भारत सरकार ने एक आयोग का गठन किया था. यह जांच आईएनए के अधिकारी शाह नवाज खाने की अध्यक्षता में हुई थी. इसमें नेता जी के भाई सुरेश चंद्र बोस और एसएन मैत्रा भी शामिल थे. कमीशन ने यह निष्कर्ष निकाला कि बोस की मृत्यु 1945 में ताइवान में एक विमान दुर्घटना में हुई थी, और उनकी राख टोक्यो के रेनकोजी मंदिर में रखी है. हालांकि, सुरेश बोस ने इस निष्कर्ष से असहमति जताई और गवाही में कमियां पाईं.
खोसला आयोग
1970 में एक बार फिर से नेता जी के अनुयायी जब उनकी मौत के सबूत मांगने लगे और विमान दुर्घटना की कहानी को झूठा बताया जाने लगा. तब न्यायमूर्ति जी. डी. खोसला की अध्यक्षता में एक बार फिर से एक जांच आयोग का गठन हुआ. इस आयोग ने Figgess तथा Shah Nawaz रिपोर्ट की मुख्य बातों से सहमति जताई था और यह निष्कर्ष दिया कि बोस दुर्घटना में घायल हुए तथा बाद में उनकी मृत्यु हो गई.
जस्टिस मुखर्जी कमीशन
सुभाष चंद्र बोस की मौत की जांच के लिए 1999 में एक बार फिर जस्टिस मुखर्जी की अध्यक्षता में एक जांच आयोग गठित किया गया. इस आयोग का लब्बोलुआब यही था कि ताइपे में विमान दुर्घटना होने का कोई सबूत नहीं है. यह कहानी नकली है. रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ बातें जो नेताजी की प्लेन क्रैश में मौत की सच्चाई पर गंभीर शक पैदा करती है, उसमें से एक है आईएनए के मेंबर हबीबुर रहमान का अजीब व्यवहार. आयोग ने बताया कि अगर नेताजी वास्तव में 18 अगस्त 1945 को दुर्घटना में मारे गए थे, तो उनके साथी हबीबुर को तुरंत इसकी सूचना आर्मी में अपने सीनियर्स और बैंकॉक, सिंगापुर, साइगॉन और टोक्यो में अपने साथियों को देनी चाहिए थी. उनकी इस साफ चुप्पी को किसी भी तरह से समझाया नहीं जा सकता, सिवाय इसके कि वह जापानी सेना के अधिकारियों के साथ मिलकर नेताजी के भागने के प्लान को बनाने और उसे लागू करने में बहुत अहम भूमिका निभा रहे थे.
जब कमीशन के चेयरमैन ने ताइपे सिटी गवर्नमेंट के संबंधित अधिकारियों से वे रिकॉर्ड देने को कहा जिनके आधार पर उन्होंने कहा था कि 18 अगस्त, 1945 को कोई प्लेन क्रैश नहीं हुआ था, तो उन्होंने बताया कि यह जानकारी सिर्फ़ उनके आर्काइव्ज में रखे उस समय के अखबारों की खबरों पर आधारित थी.
दुर्घटना की अपुष्ट कहानी
ताइवानी इतिहास संस्थान के चेयरमैन और माइक्रोफिल्म किए गए रोजाना के अखबारों की जांच से यह कन्फर्म हुआ कि 18 अगस्त, 1945 को किसी विमान दुर्घटना की कोई रिपोर्ट नहीं थी.ऊपर बताई गई बातों से यह सही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अगर सच में कोई विमान दुर्घटना हुई होती जिसमें नेताजी सहित जापानी सेना के जनरल रैंक के एक सैन्य अधिकारी शिदेई भी शामिल थे. इस बारे में खबर स्थानीय दैनिक 'सेंट्रल डेली न्यूज़' में जरूर छपी होती.
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