केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने लोकसभा में एक नया कानून पेश किया, जिसका नाम है ‘विकसित भारत शिक्षा बिल 2025'. इस कानून का मकसद यह है कि एक तीन लोग वाली टीम बनाई जाए, जो सभी कॉलेज और विश्वविद्यालयों को देखेगी. यह टीम तय करेगी कि कौन-से कॉलेज में अच्छी पढ़ाई हो रही है, कौन से कॉलेज में नहीं. टीम यह भी तय करेगी कि कॉलेजों को कितनी आज़ादी मिले और उन्हें कैसे नियम मानने होंगे.
इसके साथ ही, यह टीम कॉलेजों को अच्छे-अच्छे नंबर देगी और बताएगी कि वे कितने अच्छे काम कर रहे हैं. आयोग पूरे देश की उच्च शिक्षा की निगरानी करेगा. इसे हम 'मुख्य आयोग' कह सकते हैं. यह आयोग सरकार को सलाह देगा और भारत को दुनिया में शिक्षा का बड़ा केंद्र बनाने में मदद करेगा. इसमें एक अध्यक्ष, एक वरिष्ठ शिक्षक या विशेषज्ञ, केंद्र सरकार का प्रतिनिधि और एक सचिव होंगे. इस आयोग के अंदर तीन अलग-अलग परिषदें होंगी, ताकि काम में कोई झगड़ा या टकराव न हो.
यहां जानते हैं तीन परिषदों का काम
2. मान्यता परिषद (Accreditation Council)
3. मानक परिषद (Standards Council)
कानून किन संस्थानों पर लागू होगा
यह कानून सभी केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों, डीम्ड यूनिवर्सिटी, IIT, NIT, कॉलेजों, ऑनलाइन और दूरस्थ शिक्षा संस्थानों पर लागू होगा. मेडिकल, कानून, फार्मेसी, नर्सिंग जैसे कोर्स सीधे इस कानून में नहीं आएंगे, लेकिन उन्हें भी नए मानकों का पालन करना होगा.
केंद्र सरकार का क्या रोल होगा
इससे क्या फायदा होगा और भविष्य पर क्या असर होगा?
इस बिल से क्या बदलाव होंगे?
अब सभी कॉलेज और यूनिवर्सिटी एक जैसे नियमों और तरीकों से काम करेंगे. नए कॉलेज खोलना और नए कोर्स शुरू करना आसान होगा. पढ़ाई अच्छी हो रही है या नहीं, इस पर ज्यादा ध्यान दिया जाएगा. पढ़ाई में वो चीजें सिखाई जाएंगी जो नौकरी और स्किल्स में मदद करें. कॉलेज की मान्यता और उनका काम समय-समय पर देखा जाएगा.
इस बिल को लेकर विवाद क्या है?
इस बिल को लेकर विवाद इसलिए है क्योंकि कुछ लोगों को लगता है कि इससे कॉलेज और यूनिवर्सिटी की आज़ादी कम हो सकती है. उनको डर है कि सरकार शिक्षा पर ज्यादा काबू पा लेगी और शिक्षक और छात्रों के फैसलों में हिस्सा कम हो जाएगा. इसके अलावा, छोटे और गांव के कॉलेज नए नियम नहीं निभा पाएंगे और बंद हो सकते हैं. लोग यह भी कहते हैं कि यह बिल पढ़ाई को सिर्फ नौकरी और कौशल तक सीमित कर देगा, जिससे असली ज्ञान और रिसर्च की अहमियत कम हो सकती है. इसलिए इस बिल को लेकर बहस हो रही है-सरकार इसे सुधार बता रही है, लेकिन शिक्षक और शिक्षा विशेषज्ञ इसे शिक्षा की आज़ादी पर खतरा मानते हैं.
क्या है विपक्ष की आपत्ति?
कांग्रेस और बाकी विपक्षी पार्टियों ने इस बिल का विरोध किया. उनका कहना है कि इतने बड़े शिक्षा सुधार वाले बिल को समझने और पढ़ने के लिए सांसदों को पर्याप्त समय नहीं मिला.टीएमसी के सांसद सौगत राय, कांग्रेस के मनीष तिवारी और CPI(M) के जॉन ब्रिटास ने कहा कि सरकार बहुत ज्यादा कंट्रोल चाहती है और शिक्षा पर केंद्र का ज्यादा दबदबा बनेगा. उन्होंने याद दिलाया कि शिक्षा एक ऐसा मामला है जिसमें राज्य और केंद्र दोनों की हिस्सेदारी होती है. कई पार्टियों ने कहा कि इस बिल को JPC (Joint Parliamentary Committee) में भेजा जाए ताकि इसे अच्छी तरह देखा और समझा जा सके. सरकार ने भी इसे JPC में भेजने की मंजूरी दे दी.
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