बांग्लादेश में एक वोट PM के लिए, फिर दूसरा किसके लिए था? उसके नतीजों से क्या होगा

बांग्लादेश में आम चुनाव खत्म हो चुका है और परिणाम भी सामने आ गए हैं. दुनियाभर से तारिक रहमान को जीत की बधाईयां मिल रही है. इस चुनाव में वहां के वोटरों ने एक नहीं दो-दो वोट डाले. ऐसे में जानते हैं कि लोगों ने दो वोट किनके लिए डाले और इसके मायने क्या हैं?

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बांग्लादेश के चुनाव परिणाम में 'जुलाई चार्टर' के पक्ष में आए हैं रुझान (Photo - PTI) बांग्लादेश के चुनाव परिणाम में 'जुलाई चार्टर' के पक्ष में आए हैं रुझान (Photo - PTI)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:34 PM IST

बांग्लादेश में 13वां आम चुनाव संपन्न हो चुका है और इसके परिणाम भी सामने हैं. इस चुनाव में तारिक रहमान वाली बीएनपी (बांग्लादेश राष्ट्रवादी पार्टी) को जनादेश मिला है.  यह चुनाव कई मायनों में बांग्लादेश के पहले हुए आम चुनावों से अलग और खास है. इस चुनाव में बांग्लादेश के नागरिकों ने एक साथ दो वोट देने पड़े. ऐसे में समझते हैं कि ये एक वोटर को दो अलग-अलग बैलेट क्यों मिले थे और इन पर उनकी दो वोटिंग का मतलब क्या है?

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बांग्लादेश में एक बड़े जनआंदोलन के बाद शेख हसीना के नेतृत्व वाली सरकार को वहां की जनता ने उखाड़ फेंका. इसके बाद मोहम्मद युनुस के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी. करीब डेढ़ साल बाद देश में चुनाव करवाने का फैसला लिया गया. इसमें शेख हसीना की पार्टी को चुनाव में हिस्सा लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया. वहीं करीब 17 साल देश से बाहर रहने के बाद खालीदा जिया के बेटे और बीएनपी लीडर तारिक रहमान बांग्लादेश लौटे और चुनाव में हिस्सा लिया. अब जनादेश उनके पक्ष में है. 

बांग्लादेश का यह चुनाव सिर्फ प्रधानमंत्री चुनने और एक नई सरकार बनाने के लिए नहीं हुआ. इस बार वहां के लोगों ने 'जुलाई चार्टर' को लागू करने के लिए हुए जनमत संग्रह के लिए भी वोट किया. इसलिए वोटरों को दो बैलेट पेपर दिए गए थे. एक बैलेट पेपर के जरिए सरकार चुनने के लिए अपना वोट देना था और दूसरे बैलेट पेपर के माध्यम से 'जुलाई चार्टर' को लेकर जनमत संग्रह में अपनी सहमति या असहमति जतानी थी. 

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जब 'जुलाई चार्टर' पर जनमत संग्रह की बात आती है, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ये है  क्या? 2024 जुलाई में जब शेख हसीना की सरकार के विरोध में छात्र आंदोलन शुरू हुआ और देखते-देखते ये एक राजनीतिक जनआंदोलन में बदल गया, जिसके परिणाम स्वरूप वहां बड़े पैमाने पर हिंसा हुई और शेख हसीना को देश छोड़कर भागना पड़ा. उस वक्त अस्थिरता के दौर में मोहम्मद युनुस की अगुआई में आंदोलनकारियों और छात्रनेताओं ने  देश की शासन व्यवस्था में सुधार को लेकर कुछ बड़े बदलाव की मांग की. इसमें संविधान में बदलाव तक की डिमांड शामिल थी. 

क्या है 'जुलाई चार्टर'
आंदोलनकारियों और बांग्लादेश के कई राजनीतिक दलों ने मिलकर शासन व्यवस्था और कई नियम कानूनों में बदलाव सहित नए सिरे से संविधान के कई प्रावधानों को भी बदलने की मांग रखी. इसके लिए 28 पेज का एक मसौदा तैयार किया गया, जिसे 'जुलाई चार्टर' कहा गया. इस 'जुलाई चार्टर' पर अंतरिम सरकार और सभी राजनीतिक दलों ने हस्ताक्षर किया है. इसमें जो मूल बदलाव की मांग की गई है, उसके तरह ऐसे कानून बनाने के प्रस्ताव दिए गए हैं, जिससे भविष्य में तानाशाही को रोका जा सके. साथ ही एक सही मायने में रिपब्लिक स्टेट बनाया जा सके. 

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इसलिए वहां हुए आम चुनाव में इस बार लोगों ने दो बार वोट किया. एक पीएम के लिए और दूसरा 'जुलाई चार्टर' के लिए. चुनाव परिणाम आने बाद जहां तारिक अनवर को जनादेश मिला और नई सरकार बनाने के लिए शुभकामनाएं भी मिलने लगी है. वहीं दूसरी तरफ ऐसे रुझान हैं कि 'जुलाई चार्टर' जनमत संग्रह के पक्ष में 63 प्रतिशत मत मिले हैं. 

क्या बदल जाएगा बांग्लादेश का संविधान 
अब सवाल उठता है कि जब 'जुलाई चार्टर' के पक्ष में बहुमत मिल चुका है तो अब क्या बदलाव होंगे. जुलाई चार्टर लागू होने पर वहां से संविधान में भी सुधार करना होगा. इसमें कई ऐसे पॉइंट्स है, जिन्हें सिर्फ संविधान में सुधार के जरिए ही लागू किया जा सकता है. वहीं कुछ डिमांड के सिर्फ नए नियम या अधिनियम बनाने से पूरे हो जाएंगे. ऐसे में संविधान में जो भी सुधार होंगे या जो नए नियम-कानून बनेंगे, उन्हें जल्द से जल्द पूरा करना होगा. यानी नई सरकार को एक निश्चित अवधि में जुलाई चार्टर लागू कर देना होगा. चाहे इसके लिए वहां के संविधान में बदलाव ही क्यों न करना पड़े.  

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