अंग्रेजों के फरमान के खिलाफ झांसी में आज भी नहीं मनाई जाती होली

कैसा हो कि पूरा देश होली का जश्न मना रहा हो और कोई शहर खुद को उससे दूर रखने की कोशिश कर रहा हो, मगर यह बात सच के नजदीक है और यह कहानी है वीरता की गाथा सुनाने वाले झांसी की...

Holi
स्नेहा
  • नई दिल्ली,
  • 21 मार्च 2016,
  • अपडेटेड 12:06 PM IST

यूं तो लोग मानते हैं कि होली पर रंग खेलने की शुरुआत झांसी के एरच में हुई थी लेकिन अजब बात यह है कि इस त्योहार को ही यहां के लोग शुभ नहीं मानते. कहते हैं कि होली के दिन ही झांसी में अंग्रेजों का फरमान पहुंचा था कि वे लक्ष्मीबाई के बेटे दामोदर राव को उनका उत्तराधिकारी नहीं मानते. इस फरमान से नाराज झांसी की रानी और वहां की जनता ने होली नहीं मनाई थी. आज भी झांसी में ऐसे लोग रहते हैं, जो होली वाले दिन नहीं, बल्क‍ि इसके अगले दिन इस पर्व को मनाते हैं.

अंग्रजों ने भेजा था तुगलकी फरमान...ज्ञात हो कि 21 नवंबर, 1853 को झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु के बाद वहां के राज की कमान रानी लक्ष्मीबाई के हाथों में आ गई थी. गंगाधर राव ने उनकी मृत्यु से पहले ही एक बालक (दामोदर राव) को गोद लेकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. अंग्रेजों ने इस सत्ता के हस्तांतरण को मानने से इनकार कर दिया. जिस दिन झांसी में यह फरमान जारी किया गया, वह होली का ही दिन था.

ओम शंकर 'असर' की किताब में है जिक्र...ओम शंकर 'असर' नामक लेखक ने उन दिनों एक किताब लिखी थी. इस किताब का नाम 'महारानी लक्ष्मीबाई और उनकी झांसी' है. इस फरमान के तहत डलहौजी ने लेटर लिखा था - भारत सरकार की 7 मार्च 1854 की आज्ञा के अनुसार झांसी का राज्य ब्रिटिश इलाके में मिलाया जाता है. इस इश्तहार के जरिए सब लोगों को सूचना दी जाती है कि झांसी प्रदेश का शासन मेजर एलिस के अधीन किया जाता है प्रदेश की प्रजा अपने को ब्रिटिश सरकार के अधीन समझे और मेजर एलिस को 'कर' दिया करे सुख, शांति और संतोष के साथ जीवन निर्वाह करे.

खुशी गम में बदल गई...झांसी गजेटियर में दर्ज इतिहास के मुताबिक यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना ठीक होली के दिन घटी थी. होली के जश्न की तैयारियां जारी थीं. इसी बीच अंग्रेजों का तुगलकी फरमान सुनाया गया. लोग शोक में डूब गए और होली नहीं मनाई गई. रानी ने किला छोड़ा और दूसरे महल में चली गईं. इसी गम में आज भी झांसी के कई लोग होली के दिन होली नहीं मनाते. इसके बजाय वे अगले दिन रंग खेलते हैं.

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