14वीं सदी में चीन के चूहों ने आधी दुनिया में फैलाई थी तबाही, मारे गए थे करोड़ों लोग

चीन के वुहान से निकला ये वायरस दुनिया में एक और तबाही की वजह बन चुका है. मगर ऐसा ना हो कि इससे मरने वालों का आंकड़ा उस आंकड़े को भी पार कर जाए जो इंसानी तारीख में सबसे ज़्यादा मौत का रिकॉर्ड बना चुका है.

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उस वक्त प्लेग की महामारी ने पूरी दुनिया को दहला दिया था (फोटो- gettyimages) उस वक्त प्लेग की महामारी ने पूरी दुनिया को दहला दिया था (फोटो- gettyimages)

शम्स ताहिर खान

  • नई दिल्ली,
  • 03 अप्रैल 2020,
  • अपडेटेड 10:29 PM IST

  • दुनिया में प्लेग ने मचाई थी भारी तबाही
  • कई देशों में फैल गई थी महामारी

इंसानी तारीख में महामारी का इतिहास बहुत स्याह और भयानक है. जिस तरह की तबाही आज कोरोना ने चीन में ढाई है, इससे कहीं ज्यादा खौफनाक तबाही 19वीं सदी में चीन में देखने को मिली थी प्लेग की शक्ल में. 1860 के दशक में प्लेग की वजह से अकेले चीन में करीब 25 लाख लोगों की मौत हो गई थी. ये वही प्लेग था, जिसने चीन के बाद भारत का रुख किया और भारत में भी भयंकर तबाही मचाई. एक आंकड़े के मुताबिक उस दौर में भारत में प्लेग से करीब एक करोड़ से ज़्यादा लोगों की जान चली गई थी.

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चीन के वुहान से निकला ये वायरस दुनिया में एक और तबाही की वजह बन चुका है. मगर ऐसा ना हो कि इससे मरने वालों का आंकड़ा उस आंकड़े को भी पार कर जाए जो इंसानी तारीख में सबसे ज़्यादा मौतों का है. ये सवाल इसलिए क्योंकि 690 साल पहले 14वीं सदी में चीन के चूहों से फैले प्लेग ने यूरोप में जिस तरह का तांडव मचाया था. उसके बारे में जानकर आज भी ही रूह कांप जाती है.

मानव इतिहास में किसी दूसरे वायरस या बग ने उतनी तेज़ी से इंसानी आबादी का सफाया नहीं किया, जितना ब्लैक डेथ ने किया. 14वीं सदी में यूरोप में प्लेग से होने वाली मौतों को ब्लैक डेथ यानी काली मौत कहा गया. चीन से यूरोप आई इस महामारी से 1347 से 1351 तक यानी चार सालों में यूरोप की करीब 2 से 3 करोड़ आबादी खत्म हो गई थी.

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दरअसल, इस दौर में प्लेग का संक्रमण इतनी तेज़ी से फैला कि लोगों को वक्त पर इलाज कराने का मौका तक नहीं मिला. और सही वक्त पर इलाज न होने की वजह से कुछ ही दिनों में लाखों मरीज़ों की मौत होनी शुरू हो गई. इसका इन्फेक्शन सीधे लोगों के लंग्स में पहुंच रहा था. उन मरीज़ों के कफ के जरिए हवा में. ठीक वैसे ही जैसे आज कोरोना वायरस का संक्रमण बेहद तेजी से फैल रहा है. मगर आज तो फिर भी लोगों को पता है कि कोरोना उन्हें मार सकता है. लेकिन तब तो लोग अनजाने में ही प्लेग का शिकार होते गए और जान गंवाते गए.

सदियों बाद ये प्लेग उस हद तक खतरनाक स्तर पर पहुंच गया था, जिसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता. 19वीं सदी में चीन और भारत में इसी प्लेग ने महामारी का रूप ले लिया था. तब भी प्लेग के फैलने की शुरुआत चीन से ही हुई थी.

1860 के दशक में प्लेग ने सबसे पहले चीन के अंदरूनी इलाकों में हमला बोला और फिर हांगकांग में दाखिल हुआ. उस दौर में इस महामारी को मॉडर्न प्लेग का नाम दिया गया. चीन के सिल्क रूट के रास्ते ये दुनिया के बाकी हिस्सों में फैल गई थी. संक्रमित चूहे प्लेग की बीमारी लेकर शिप तक पहुंचे और जहां-जहां भी शिप गए और डॉक्स पर रुके. ये बीमारी भी वहां चली गई. चीन से ही ये बीमारी भारत में फैली. भारत में इसकी शुरुआत 1889 में हुई. यहां इसने चीन से भी ज्यादा कहर बरपाया था.

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उस खौफनाक महामारी के दौरान प्लेग से चीन और भारत में मिलाकर सवा करोड़ से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी. यूके की डिफेंस इवेल्युएशन एंड रिसर्च एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक अकेले भारत में ही प्लेग से 1 करोड़ लोगों की मौत हुई थी. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक, प्लेग के वायरस 1959 तक एक्टिव रहे थे. हालांकि, इसके चलते होने वाली मौत के आंकड़े में लगातार गिरावट जारी रही. आखिरी के साल में गिरकर मौतों का आंकड़ा प्रति वर्ष 200 हो गया था. भारत में प्लेग की एंट्री पोर्ट सिटी हांगकांग के जरिए ब्रिटिश इंडिया में हुई थी. तब इसका असर सबसे ज्यादा मुंबई, पुणे, कोलकाता और कराची जैसी पोर्ट सिटी में ही दिखा था. यहां कई समुदाय तो पूरी तरह खत्म हो गए थे.

क्या है महामारी अधिनियम, 1897?

इस महामारी से पूरी तरह उबरने के बाद ऐसी महामारियों से निपटने के लिए तब के ब्रिटिश इंडिया में Epidemic Diseases Act, 1897 यानि महामारी अधिनियम, 1897 बनाया गया था. इस एक्ट के तहत सार्वजनिक सूचना के ज़रिए महामारी के प्रसार की रोकथाम के उपाय किए गए थे. सरकार को से ग्रस्त व्यक्ति को किसी अस्पताल या अस्थायी आवास में रखने का अधिकार दिया गया. सरकारी आदेशों का पालन ना करना अपराध माना गया. जुर्माने के साथ साथ सज़ा का भी प्रावधान रखा गया. सरकारी अधिकारियों को कानूनी सुरक्षा का प्रावधान है. अनहोनी होने पर सरकारी अधिकारी की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी.

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अब आते हैं उस सवाल पर जो आपमें से कई लोगों के मन में कौंध रहा है कि आखिर महामारी कहते किसे हैं. और Epidemic या Pandemic में फर्क क्या है. दरअसल. महामारी उस बीमारी को कहते हैं.. जो एक ही वक्त में दुनिया के अलग-अलग देशों के लोगों को नुकसान पहुंचाती है. यानी महामारी का वास्ता किसी बीमारी के भयानक शक्ल लेने से ज्यादा अधिक से अधिक जगहों पर फैलने से जुड़ा है. अगर कोई बीमारी दुनिया के एक से ज्यादा देशों में फैल जाए तो आम तौर पर WHO इसे महामारी घोषित कर देता है COVID-19 चार महाद्वीपों में फैल चुकी है.

अभी तक कोरोना वायरस का कोई इलाज या टीका नहीं बन सका है. वायरस को बढ़ने से रोकने के लिए अहम है कि WHO यानी वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन इस बीमारी के इलाज के लिए दुनिया भर के देशों की सरकारों के साथ काम करे. मगर सवाल ये है कि दुनियाभर में फैल रहे इस वायरस को WHO ने महामारी यानी एपिडेमिक के बजाए पैनडेमिक क्यों कहा.

दरअसल, एपिडेमिक उस बीमारी को कहा जाता है जो कि एक ही देश, एक समुदाय या इलाके तक फैली हो. मगर जब कोई बीमारी किसी एक देश या सीमा तक महदूद नहीं रह जाती है और दुनिया के कई देशों में बड़े पैमाने पर फैलने लगती तो उसे पैनडेमिक कहा जाता है. जैसा आज कोरोना वायरस किसी एक देश की समस्या नहीं बल्कि ग्लोबल महामारी बन चुका है. और इसी लिए इसे पैनडेमिक घोषित किया गया है.

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