अब न राजन रहे, न उनके 'बहाने', फिर क्यों नहीं कम हो रही EMI?

नए गवर्नर उर्जित पटेल के हित में सारे समीकरण दिख रहे हैं फिर भी ब्याज दरों में कटौती का इंतजार बढ़ता ही जा रहा है. हालांकि, 1 जुलाई से जीएसटी लागू होने और नोटबंदी के असर को देखते हुए शायद ही पटेल मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव करें.

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रघुराम राजन और उर्जित पटेल रघुराम राजन और उर्जित पटेल

राहुल मिश्र

  • मुंबई,
  • 06 जून 2017,
  • अपडेटेड 7:44 AM IST

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मौद्रिक समीक्षा बैठक जारी है. साल भर से रेपो रेट में कटौती का इंतजार है जो कि टलता रहा है. पिछले साल RBI के गवर्नर रघुराम राजन ने महंगाई, मौसम और ग्लोबल इकोनॉमी का हवाला देते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था. पर अब स्थिति उलट है. नए गवर्नर उर्जित पटेल के हित में सारे समीकरण दिख रहे हैं फिर भी ब्याज दरों में कटौती का इंतजार बढ़ता ही जा रहा है. हालांकि, 1 जुलाई से जीएसटी लागू होने और नोटबंदी के असर को देखते हुए शायद ही पटेल मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव करें.

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एक साल पहले की स्थिति का जायजा लें तो ये कारण थे कि रघुराम राजन को अंजाम नहीं दे सके-रघुराम राजन का मानना है कि आर्थिक सुधार की दिशा में देश आगे बढ़ रहा है लेकिन महंगाई के खतरा अभी बरकरार है. जानिए किन कारणों से रिजर्व बैंक ने नहीं कम किया ब्याज दर.


ग्लोबल इकोनॉमी में मामूली सुधार, अमेरिकी नीति का इंतजार
रिजर्व बैंक का मानना था कि ग्लोबल इकोनॉमी के हालात में मामूली सुधार देखने को मिला है. भारत में भी कुछ सुधार देखने को मिल रहा है. वहीं खेतों में कटाई अच्छी होती है तो ग्रामीण इलाकों की मांग बढ़ सकती है, तो शहरों में मांग बढ़ने के संकेत हैं. लेकिन रिजर्व बैंक को सितंबर 2016 या फिर इस साल के अंत तक अमेरिका में ब्याज दरों में इजाफे का डर सता रहा था जिसके कारण ब्याज दरों में कटौती नहीं की जा सकी.

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सभी बैंक ग्राहकों को दें पूर्व में हुई कटौती का फायदा
रिजर्व बैंक जहां खुद ब्याज दरों में कटौती करने में असमर्थ था वहीं उसने देश के बैंकों से अपील की कि वह पूर्व में हुई कटौतियों को ध्यान में रखते हुए ग्राहकों के लिए कम ब्याज दरों का ऐलान करें. गौरतलब है कि रिजर्व बैंक ने पूर्व में (2015) लगभग 75 बेसिस प्वाइंट की कटौती की थी जिसका फायदा अन्य बैंकों ने ग्राहकों तक नहीं पहुंचाया था.

महंगाई दर को काबू में रखना पहली प्राथमिकता
रघुराम राजन के लिए केन्द्र सरकार से महंगाई दर पर काबू करवाना और सप्लाई बढ़ाना ज्यादा बड़ी चुनौती थी. सरकारी खर्च, इकोनॉमी में बढ़ते निवेश और फेड के पॉलिसी एक्शन पर भी आगे की पॉलिसी एक्शन पर रिजर्व बैंक की नजर थी. जून 2016 में महंगाई दर ज्यादा थी जिसके चलते वह अपना कार्यकाल खत्म होते-होते भी ब्याज दरों में कटौती का ऐलान नहीं कर सके.

खाद्य वस्तुओं की महंगाई का खतरा बरकरार
को लगातार दलहन और तिलहन की कीमतों के बढ़ने से महंगाई बढ़ने का डर था. लेकिन उसे 2016 के मध्य में कच्चे तेल की घटती कीमतों के बाद और ज्यादा खरीफ बुआई की उम्मीद पर आंकलन था कि जल्द महंगाई काबू में आ जाएगी जिसके बाद ही रिजर्व बैंक ब्याज दर पर कोई फैसला कर सकता था.

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लिहाजा, इन कारणों के बाद अब देखें तो केन्द्रीय रिजर्व बैंक के सामने मजबूत आर्थिक आंकड़ें हैं. लेकिन उसे डर है कि 1 जुलाई से देश में जीएसटी लागू करने के बाद अर्थव्यवस्था पर कुछ दबाव पड़ सकता है. जिसके चलते वह ब्याज दरों में कटौती करने से कतरा रही है.

 

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